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टैक्स हैवन देशों पर लगाम कसेगा ग्लोबल मिनिमम कार्पोरेट टैक्स

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हाल में ही आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ( ओईसीडी) के 136 देशों ने हस्ताक्षर कर ग्लोबल मिनिमम कार्पोरेट टैक्स दर लगाने का रास्ता साफ कर दिया है.

इसका सबसे बड़ा फायदा टैक्स हैवन देशों पर लगाम कसने का होगा जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को टैक्स की कम दरों के कारण अपने देश में आफिस खुलवाते है और टैक्स चोरी करने में मदद करते हैं.

आज का समय वैश्वीकरण और डिजिटाइजेशन का है जिसमें देश की सीमाओं का कोई महत्व नहीं रहा, ऐसे में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना लाभ टैक्स हैवन देशों में ट्रांसफर कर अन्य देशों की आय पर डाका डालते हैं.

उदाहरण के लिए अमेरिका में उत्पादन करने वाली कंपनी अपनी लागत पर ही टैक्स हैवन देश में स्थित अपनी मुखौटा कंपनी को बिल कर देती है और फिर टैक्स हैवन स्थित कंपनी अन्य देशों में उत्पाद को बिक्री कीमत पर बेच देती है ताकि बेचने वाले देश में भी ज्यादा लाभ न अर्जित हो सकें.

ऐसे में लाभ न उत्पादन करने वाले देश में होता है और न ही बेचने वाले देश में. सारा लाभ टैक्स हैवन स्थित मुखौटा कंपनी को होता है जहाँ कोई टैक्स नहीं देना होता और सिर्फ मनी लॉन्ड्रिंग की जाती है.

इसी तरह सेवा क्षेत्र की आय भी बहुराष्ट्रीय कंपनियां टैक्स हैवन देश में ट्रांसफर कर देती है और जिन देशों से आय अर्जित होती है, उनके हाथ कोई राजस्व नहीं लगता.

गूगल, फेसबुक, अमेज़न, आदि कंपनियां द्वारा अमेरिका और अन्य देशों को राजस्व का भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है. इसलिए अमेरिका के नेतृत्व में 136 देशों ने ग्लोबल मिनिमम कार्पोरेट टैक्स की 15% दर पर सहमति प्रदान करीं.

टैक्स हैवन देशों पर लगाम कसेगा ग्लोबल मिनिमम कार्पोरेट टैक्स

*टैक्स हेवन देश उन्हें कहा जाता है जहाँ अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम कर लगता है या बिलकुल कर नहीं लगता।*

ये ऐसे देश होते हैं जो विदेशी नागरिकों, निवेशकों एवं उद्यमियों को यह सुविधा प्रदान करते हैं कि वे उस देश में रहकर जो व्यवसाय या निवेश करेंगे या वहाँ किसी उद्यम की स्थापना करेंगे तो उस पर उनको कर नहीं देना होगा या कर की दरें बहुत ही कम होंगी।

ऐसे देश टैक्स में किसी प्रकार की पारदर्शिता नहीं रखते न ही किसी प्रकार की वित्तीय जानकारी को साझा करते हैं।

ये देश उन लोगों के लिये स्वर्ग (हैवन) के समान हैं, जो टैक्स चोरी करके पैसे इन देशों में जमा कर देते हैं।

ऐसे देशों में पैसे जमा करने पर वे पैसे जमा करने वाले व्यक्ति या संस्था के बारे में कुछ भी नहीं पूछते।

यही कारण है कि टैक्स चोरों के लिये ऐसे देश स्वर्ग जैसे होते हैं, जो अपने देश से पैसे लाकर इन देशों में काले धन के रूप में जमा कर देते हैं।

1. टैक्स हैवन से वैश्विक स्तर पर कर चोरी को बढ़ावा मिलता है जिससे वैश्विक स्तर पर काले धन की समस्या में लगातार वृद्धि होती है।

2.  टैक्स हैवन के कारण घरेलू टैक्स संग्रहण पर प्रभाव पड़ता है, अर्थात् कर अपवंचन में वृद्धि होती है जिससे संबंधित देश के राजस्व संग्रह में कमी आती है।

3.  वित्त का देश से बाहर की ओर प्रवाह बढ़ता है जिससे देश में वित्तीय अस्थिरता एवं वित्तीय नियंत्रण में कमी जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं और उस देश की अर्थव्यवस्था नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

4. टैक्स हैवन में टैक्स की दरों के कम या नगण्य होने के कारण शेल कंपनियों को बढ़ावा मिलता है जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

5. वैश्विक स्तर पर मनी लॉड्रिंग, राउंड ट्रिपिंग जैसे आर्थिक अपराधों को बढ़ावा मिलता है। साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता की कमी देखी जाती है।

शीर्ष 10 टैक्स हेवन इस प्रकार है:

1 – ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स

2- केमैन आइलैंड्स

3- बरमूडा

4- नीदरलैंड्स

5- स्विटजरलैंड

6- लग्जम्बर्ग

7- हॉन्ग कॉन्ग

8- जर्सी

9- सिंगापुर

10- संयुक्त अरब अमीरात

*बहुत सालों की मशक्कत के बाद आखिरकार जी-7 देश और ओईसीडी देश इस बार पर राजी हो गई हैं कि ग्लोबल मिनिमम टैक्स को न्यूनतम 15 फीसदी रखा जाएगा।*

इसके तहत ग्लोबल कॉरपोरेट टैक्स कम से कम 15 फीसदी होगा, जिसका भुगतान उसी देश में करना होगा, जहां पर व्यापार किया जा रहा है।

अभी कराधान प्रक्रिया नहीं होने की वजह से कई देशों के नुकसान होता था।

ग्लोबल मिनिमम टैक्स के लागू होने बाद उन पर भारत को 15 फीसदी तक का टैक्स लगाने की ताकत मिल जाएगी।

दवाओं के पेटेंट, सॉफ्टवेयर और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पर रॉयल्टी आदि से हुई कमाई पर कंपनियां अधिक टैक्स देने से बचते हुए उसे कम टैक्स वाले देश में डायवर्ट कर देती हैं।

इससे अपनी कमाई को बचाने के लिए ग्लोबल मिनिमम टैक्स की जरूरत पड़ी है।

ओईसीडी यानी आर्थिक सहयोग और विकास संगठन सालों से 140 देशों के साथ टैक्स को लेकर बातचीत कर रहा है और अक्टूबर 21 में सभी की सहमति से इसकी प्रक्रिया और नियम बनाने का रास्ता साफ हो गया है और 2023 से ग्लोबल टैक्स लागू हो जाएगा.

इसके बाद कम टैक्स वाले देश एग्रीमेंट का विरोध नहीं कर पाएंगे।

ओईसीडी का अनुमान है कि इसके बाद कंपनियों को दुनिया भर में 50-80 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त टैक्स चुकाना पड़ सकता है।

*ग्लोबल मिनिमम टैक्स की दरें ओवरसीज प्रॉफिट पर लागू होंगी।*

सरकारें इसके बाद भी अपनी मर्जी से लोकल कॉरपोरेट टैक्स लगा सकेंगी, लेकिन अगर कंपनियां किसी देश में कम टैक्स चुकाती हैं तो उस कंपनी के देश की सरकार टैक्स को न्यूनतम रेट तक बढ़ा सकती है, जिससे कि प्रॉफिट को दूसरे देश में शिफ्ट कर के टैक्स बचाने को रोका जा सके।

अब सबसे बड़ा और अहम सवाल ये है कि आखिर ग्लोबल मिनिमम टैक्स की दर 15 फीसदी न्यूनतम तय करने का भारत पर क्या असर होगा?

अगर भारत में कोई ऐसी कंपनी है जो किसी कम टैक्स वाले देश को कमाई का भुगतान कर रही है तो भारत को अधिकार होगा कि वह इस कमाई पर टैक्स लगा सके, बशर्ते वह कमाई डिजिटल इनकम से जुड़ी हो।

यह एक बड़ा क्रांतिकारी कदम साबित होगा क्योंकि टैक्स हेवन देश जो मनी लॉन्ड्रिंग, कर चोरी, मुखोटा कंपनी का गढ़ बन गए थे, उन पर न केवल लगाम कसेगी बल्कि काला धन रोकने में मदद मिलेगी.

आपको जानकर हैरानी होगी की अमेरिका की आधी से ज्यादा आय कंपनियां टैक्स हेवन देश में बताती है और इससे अमेरिका के राजस्व में लगभग 100 बिलियन डॉलर का नुकसान होता है.

फिलहाल ग्लोबल मिनिमम कार्पोरेट टैक्स उन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर लागू होगा जिनका सालाना टर्नओवर 750 बिलियन यूरो या 864 बिलियन डॉलर होगा.

टैक्स हेवन देशों के औचित्य को समाप्त करने के उद्देश्य से लागू ग्लोबल मिनिमम कार्पोरेट टैक्स लागू होने के बाद सभी देशों को अपने यहाँ लगाए जा रहे आनलाइन विदेशी लेनदेन पर इक्यूलाईजेशन लिवाई, सर्विस टैक्स, आदि समाप्त करने होंगे.

*साधारण सा सिद्धांत यह है कि यदि भारत में किए गए लेनदेन पर अर्जित आय पर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने किसी देश में टैक्स नहीं दिया या कम दिया तो भारत उस आय पर 15% की दर से ग्लोबल मिनिमम कार्पोरेट टैक्स लगा सकता है और कंपनियों द्वारा टैक्स अपवंचन की प्रक्रिया को रोका जा सकता है एवं राजस्व का फायदा होगा सो अलग.

*लेखक एवं विचारक: सीए अनिल अग्रवाल जबलपुर 9826144965*

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