जीएसटी अधिनियम की धारा 143 जॉब वर्क से जुड़े लेन–देन के लिए एक प्रक्रियात्मक सुविधा प्रदान करती है, न कि कर-छूट। इसके तहत प्रिंसिपल बिना जीएसटी चुकाए इनपुट या पूंजीगत वस्तुएँ जॉब वर्कर को भेज सकता है और तय समय-सीमा में उन्हें वापस मंगा सकता है या आपूर्ति कर सकता है, जबकि इनपुट टैक्स क्रेडिट सुरक्षित रहता है। जॉब वर्क के दौरान उत्पन्न स्क्रैप का स्वामित्व हमेशा प्रिंसिपल का होता है, भले ही स्क्रैप की बिक्री जॉब वर्कर द्वारा की जाए। यदि जॉब वर्कर रजिस्टर्ड है तो वह सुविधा के तौर पर स्क्रैप बेच सकता है और जीएसटी चुका सकता है, जबकि अनरजिस्टर्ड जॉब वर्कर ऐसा नहीं कर सकता। स्क्रैप की वापसी पर जीएसटी नहीं लगता और आईटीसी रिवर्सल की आवश्यकता नहीं होती। सही डॉक्यूमेंटेशन, ITC-04 फाइलिंग और बिजनेस प्लेस नियमों का पालन न करने पर विवाद और दंड का जोखिम बढ़ जाता है। यह लेख टैक्स प्रोफेशनल के लिए लाभप्रद है जिसमें बताया गया है कि जीएसटी अधिनियम की धारा 143 जिसमें जॉब वर्क और जॉब वर्क से संबंधित प्रावधानों को साधारण भाषा में प्रस्तुत किया गया है-
1. जीएसटी के अंतर्गत जॉब वर्क क्या है ?
जॉब वर्क का अर्थ है किसी अन्य व्यक्ति (मुख्य व्यक्तिके अतिरिक्त) द्वारा माल पर कोई प्रक्रिया या उपचार करना। माल का स्वामित्व जॉब वर्कर को हस्तांतरित नहीं होता है।
(जीएसटी एक्ट धारा 2(68) और धारा 143, )
2. धारा 143 की मूल संरचना क्या है-
यह जीएसटी की धारा 143 एक प्रक्रियात्मक रियायत है। लेकिन छूट नहीं है।
यह मूल करदाता को निम्नलिखित की अनुमति देता है-
जीएसटी के बिना जॉब वर्कर को इनपुट/पूंजीगत सामान भेजना।
जॉब वर्कर के परिसर से उन्हें वापस लेना या आपूर्ति करना।
कठोर शर्तों के अधीन पूर्ण आईटीसी रखना।
प्रक्रिया का पालन न करने पर कर और ब्याज सहित आपूर्ति मानी जाएगी।
3. जॉब वर्क में शामिल सामान-
यह कि जॉब वर्क में इनपुट (मध्यवर्ती सामान सहित),पूंजीगत सामान (मोल्ड, डाई, जिग्स, फिक्स्चर और औजारों को छोड़कर, कोई समय सीमा नहीं),तैयार माल वर्जित नहीं हैं, लेकिन उन्हें जॉब वर्क की परिभाषा को पूरा करना होगा (संपत्ति का कोई हस्तांतरण नहीं, जॉब वर्कर द्वारा कोई महत्वपूर्ण सामग्री का अतिरिक्त निर्माण नहीं)।
4. समय सीमा
इनपुट: 1 वर्ष
पूंजीगत सामान: 3 वर्ष
यदि समय सीमा के भीतर वापस नहीं किया जाता/आपूर्ति नहीं की जाती है, तो मूल प्रेषण तिथि पर आपूर्ति मानी जाएगी (धारा 143(3) और 143(4))।
5. गुड्स मूवमेंट और डॉक्यूमेंटेशन-
5.1 जॉब वर्क के लिए सामान भेजना है तो प्रिंसिपल से जॉब वर्करहमेशा डिलीवरी चालान के तहत
(नियम 55)सामान भेजा जा सकता है,सप्लायर से जॉब वर्कर (प्रिंसिपल के निर्देश पर)
जॉब वर्कर से दूसरे जॉब वर्कर को
5.2 जीएसटी फॉर्म ITC-04 –
भेजे गए, वापस मिले, सप्लाई किए गए सामान और जेनरेट हुए स्क्रैप का स्टेटमेंट
फाइलिंग फ्रीक्वेंसी-
25 करोड़ टर्नओवर: छमाही(25 अक्टूबर/25 अप्रैल) तक
5 करोड़ टर्नओवर: सालाना(25 अप्रैल) तक
ITC-04 एक रिकॉन्सिलिएशन स्टेटमेंट है, टैक्स पेमेंट रिटर्न नहीं।
FORM GST ITC-04 को संबंधित छमाही या वित्तीय वर्ष के बाद के महीने की 25 तारीख तक फाइल करना होता है, जैसा भी लागू हो।
6. वेस्ट और स्क्रैप –
मूल सिद्धांत-
यह कि जॉब वर्क के दौरान जेनरेट हुआ स्क्रैप हमेशा प्रिंसिपल का होता है।सेक्शन 143(5) सिर्फ यह तय करता है कि जीएसटी कौन देगा , न कि स्क्रैप का मालिक कौन है।
7. स्क्रैप कौन बेच सकता है और जीएसटी कौन देगा ?
उदाहरण A-
यदि जॉबवर्कर रजिस्टर्ड है-
जीएसटी एक्ट जॉब वर्कर को स्क्रैप बेचने की अनुमति देता है ।लेकिन अनिवार्य नहीं करता है।
जॉबवर्कर क्या कर सकता है:
टैक्स इनवॉइस जारी कर सकता है। स्क्रैप वैल्यू पर जीएसटी जमा करना होगा।यह सुविधा के लिए है।एक कानूनी सुविधा है। लेकिन स्वामित्व का ट्रांसफर नहीं होगा।
उदाहरण B-
यदि जॉब वर्कर अनरजिस्टर्ड है-
यह कि जॉब वर्कर स्क्रैप नहीं बेच सकता।स्क्रैप प्रिंसिपल को ही बेचना होगा।जीएसटी भी प्रिंसिपल द्वारा दिया जाएगा।
जीएसटी में मुख्य शब्द: “हो सकता है”,(May be”होगा” (Shall be)नहीं है।
8. बहुत ज़रूरी
यह कि भले ही जॉब वर्कर रजिस्टर्ड हो, प्रिंसिपल फिर भी खुद स्क्रैप बेचने का विकल्प चुन सकता है।
यह कि जॉब वर्कर का रजिस्ट्रेशन प्रिंसिपल के अपने स्क्रैप बेचने के अधिकार को खत्म नहीं करता है।
9. स्क्रैप की वापसी (बिक्री के बजाय)-
यह कि स्क्रैप बेचना ज़रूरी नहीं है। इसे प्रिंसिपल को वापस किया जा सकता है।अगर स्क्रैप वापस किया जाता है-
कोई जीएसटी नहीं/कोई टैक्स इनवॉइस नहीं/प्रिंसिपल द्वारा जारी किए गए डिलीवरी चालान के तहत
मूवमेंटई-वे बिल, यदि लागू हो ,यह जॉब वर्कर के रजिस्ट्रेशन स्टेटस की परवाह किए बिना लागू होता है।
यह कि स्क्रैप वापसी 1-साल/3-साल की सीमाओं के तहत कवर नहीं होती है।
10. जॉबवर्कर के परिसर से स्क्रैप बेचना – बिजनेस प्लेस का जाल
मुख्य नियम-
टैक्सेबल सप्लाई केवल रजिस्टर्ड बिजनेस प्लेस से ही की जा सकती है।
इसलिए प्रिंसिपल जॉब वर्कर के परिसर से स्क्रैप नहीं बेच सकताI
जब तक कि-
उस परिसर को प्रिंसिपल के एडिशनल प्लेस ऑफ बिजनेस (APOB) के रूप में घोषित न किया जाए।
जॉब वर्कर का रजिस्टर्ड होना इस समस्या का समाधान नहीं करता है।
विधिक आधार-
धारा 2(85) बिजनेस प्लेस
धारा 25-रजिस्ट्रेशन लोकेशन-आधारित है।
धारा 143(1)(b) का प्रोविज़ो जॉब वर्कर के स्थान से सप्लाई करने के लिए स्पष्ट अनुमति आवश्यक है
11. प्रिंसिपल के लिए सुझाव
A. यह कि स्क्रैप को प्रिंसिपल के परिसर में वापस लाएं और वहीं से बेचें जो कि सबसे सुरक्षित उपाय हैं।/
B. जॉब वर्कर के परिसर को APOB घोषित करें , वहीं से स्क्रैप बेचेंI/
C. रजिस्टर्ड जॉब वर्कर को स्क्रैप बेचने और GST का भुगतान करने की अनुमति देंI
इनके अलावा कुछ भी करने पर मुकदमे का जोखिम है।
12. स्क्रैप पर ITC का प्रभाव-
यह कि स्क्रैप बनने पर ITC रिवर्सल की आवश्यकता नहीं होती है।
यह कि स्क्रैप बिक्री पर GST आउटपुट टैक्स है, रिवर्सल नहीं है।
यह कि ITC पर सवाल तभी उठाया जाता है जब:
सामान वापस नहीं किया जाता है/
समय सीमा का उल्लंघन किया जाता है।
13. ऑडिट और डिटेंशन मामलों में देखे गए ज़्यादा जोखिम वाले विषय-
यह कि ITC-04 डिस्क्लोजर के बिना बेचा गया स्क्रैप।/
या
प्रिंसिपल द्वारा नॉन-APOB लोकेशन से स्क्रैप बेचना।/
या
जॉब वर्कर द्वारा बिना किसी स्पष्टता के स्क्रैप के लिए इनवॉइस जारी करना/
या
ई-वे बिल में गलत “भेजने की जगह” दिखाना।
यह कि ज़्यादातर सेक्शन 129 के मामले कानून की वजह से नहीं, बल्कि डॉक्यूमेंटेशन की वजह से फेल होते हैं।
14. एक-लाइन में मुख्य विषय व्यस्त व्यवसायों और मालिकों के लिए-
यह शर्तों के अनुसार जॉब वर्क पर छूट हैं।स्क्रैप हमेशा प्रिंसिपल का होता है।
निष्कर्ष –
यह कि सेक्शन 143 फायदेमंद है लेकिन इसमें कोई रियायत नहीं है। जब इसे सही ढंग से समझा जाता है, तो यह ITC और कैश फ्लो की रक्षा करता है। जब इसे लापरवाही से संभाला जाता है। तो यह विवाद का कारण बन जाता है।
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डिस्क्लेमर- यह लेखक के निजी विचार हैं।


