नाटक शीर्षक: वसीयत से विरासत तक – एक समझदार परिवार की कहानी
“वसीयत से विरासत तक” एक समझदार परिवार की कहानी है जो बताती है कि वसीयत बनाते समय पूर्ण स्पष्टता और विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक होती है। सेठ जगदीश की अधूरी वसीयत से विवाद के कई बिंदु सामने आए—मकानों का बंटवारा, सोने पर स्वामित्व, बिजनेस में हिस्सेदारी, FD का नॉमिनी विवाद, और नौकरानी को राशि देना। परंतु परिवार ने आपसी समझदारी, संवाद और संवेदनशीलता से सभी मुद्दे सुलझाए। वकील ग्रोवर की मार्गदर्शक भूमिका वसीयत की अहमियत समझाती है। नाटक का संदेश है—विरासत से बड़ा रिश्तों का सम्मान है, और समझदारी ही सबसे बड़ी संपत्ति- सुधीर हालाखंडी
मुख्य पात्र:
1. सेठ जगदीश (दिवंगत)
2. चंद्रा देवी (पत्नी)
3. अमित (बड़ा बेटा)
4. अनिल (छोटा बेटा)
5. ममता देवी (सेठ की बहन)
6. वकील अनिल ग्रोवर
7. दो बहुए
(स्टेज पर एक टेबल, कुछ कुर्सियाँ, और पीछे सेठ जगदीश की बड़ी तस्वीर। फूलों से सजी हुई। हल्का प्रकाश। धीमी-सी पृष्ठभूमि में शोक गीत बज रहा है।)
(वॉयस ओवर):
“जयपुर के जाने-माने व्यापारी, सेठ जगदीश अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनके परिवार में पत्नी चंद्रा देवी, दो बेटे अमित और अनिल, तथा एक बहन ममता देवी हैं और उनका एक भांजा है गोविन्द जो शुरू से सेठ जी के बिजनेस में साथ है. अब सवाल उठता है उनकी वसीयत का… और उस वसीयत में क्या लिखा है, यही बनेगा हमारे आज के इस प्रहसन का आधार।” देखें कैसे वसीयत बनाते समय क्या गलतियां होती है , क्या विवाद हो सकते हैं , जिन बातों का वसीयत में जिक्र नहीं है उस मसले को कैसे निपटाया जाता है और नाराज रिश्तेदारों की प्रतिक्रिया कैसे झेली जाती है . आइये देखें समझदार परिवार इन हालात से कैसे निपटते है.”
दृश्य 1: (वकील के कार्यालय में) (स्टेज पर कुर्सियों पर चंद्रा देवी, अमित, अनिल और ममता देवी बैठे हैं। सामने टेबल पर वकील अनिल ग्रोवर दस्तावेजों के साथ बैठा है।)
वकील: (गंभीरता से) “मैं सेठ जगदीश जी की वसीयत पढ़ रहा हूँ। मकान नंबर एक जिसमें वे रहते थे उनकी पत्नी चंद्रा देवी के नाम किया गया है। दो अन्य मकानों में से एक बड़े बेटे अमित को और एक छोटे बेटे अनिल को…”
चंद्रा देवी – ये तो बहुत अच्छा किया सेठ जी ने …. सबको एक – एक मकान दे दिया . चलो यह मकानों का मुद्दा तो शांति पूर्वक निपट गया. वकील साब आप आगे बढ़ें .
अमित: (आश्चर्य से) अरे नहीं मम्मी ! आप मुझे वकील साब से बात करने दो …. वकील साब, यह तो नहीं लिखा कि कौन सा मकान किसे मिलेगा?” मां का तो ठीक है कि उनका मकान तो तय है लेकिन हम दोनों भाइयों में से किसको कौनसा मकान मिलेगा यह कैसे तय होगा.
अनिल: (थोड़ा तुनक कर) “सही कह रहे हो भैया, कहीं हम दोनों एक ही मकान न मांग बैठें!” अरे पिताजी ने वसीयत में स्पष्ट क्यों नहीं किया . मैंने सुना है की आधी अधूरी वसीयते रिश्तों में विवाद और दरार पैदा करती है . अभी तो वसीयत खुली ही है और विवाद शुरू…. अजीब झंझट है .
(थोड़ा तनाव भरा संगीत)
चंद्रा देवी: (संयम से) ” देखो बेटा, लड़ाई मत करना। जो ठीक हो, वही तय करो।” वकील साब आप मदद करो. सब यहीं रह जाना है मुझे सिर्फ शांति चाहिए . अरे तुम आपस में मत लड़ना …. मेरा मकान भी तुम दोनों ले लो … मेरा क्या है मैं तो बनारस चली जाउंगी वहां कि एक धर्मशाला में सेठ जी के नाम का कमरा अभी 5 साल पहले ही उन्होंने बनाया है . लेकिन लड़ना मत तुम दोनों …. हे भगवान !!!!!
वकील: (हँसते हुए) अरे ! माताजी आप क्यों चिंता करती हैं … आपके बेटों को मैं भी बरसों से जानता हूँ और मुझे भरोसा है कि ये लोग समझदारी से तय कर लेंगे।” अब वसीयत तो सेठ जी ने खुद ही बनाई है जैसा उन्हें समझ आया बना दिया. वैसे उन्हें अलग -अलग चिन्हित करना चाहिए यही वसीयत का बनाने का नियम है .
अनिल – अरे मम्मी ! शांति ! शांति ! अभी सब ठीक हो जाता है . वकील साब ! दो मिनिट दीजिये अभी हम बात करते हैं .
अमित – हाँ मम्मी ! आप हम टेंशन मत लो …. अभी हम बात करते हैं.
(मंच पर थोड़ी देर बाद दोनों भाई आपस में चर्चा करते है और फिर सब कुछ हँसते हुए तय करते हैं)
अमित: “भाई, तुझे स्कूल के पास वाला मकान पसंद है, ले ले। मुझे अस्पताल के पास वाला अच्छा लगता है।” वैसे तू ही बता दे क्या करना है
अनिल: “बिलकुल भैया! तय रहा जैसा आपने कहा । क्या पडा है इन सब बातों में … आपका साथ चाहिए मुझे तो हमेशा …. ( और अमित और अनिल मम्मी के पैर छू लेता है )
वकील साब :- ये तो अच्छी बात है आपने यह विवाद समझदारी से सुलझा लिया … वरना वसीयत की यह कमी एक विवाद खड़ा कर सकती थी. वसीयत तो एकदम स्पष्ट होनी चाहिए .
(तालियाँ। मंच पर आपसी सहमति का उत्सव दृश्य)
दृश्य 3: (सोने का सवाल)
वकील साब:
वसीयत का दूसरा हिस्सा है जिसमें सेठ जी ने लिखा है कि मेरी पत्नी के पास 50 तोला करीब सोना है जो मैं अपनी दोनों बहुओं को देता हूँ।
चंद्रा देवी:
(थोड़ी नाराजगी से) वकील साब, वसीयत में लिखा है कि मेरा 50 तोला सोना बहुओं में बाँटा जाए! क्या ये ठीक है? मेरे रहते हुए ये निर्णय…? ये मेरे गहने हैं।
(इतना सुनते ही दोनों बहुएं भड़क जाती हैं)
बड़ी बहू:
मम्मीजी! जब पापा हमें जेवर दे गए हैं तो आपको क्या ऐतराज है?
चंद्रा देवी:
अरे! बड़ी बहू सुनो, जो मेरा है, वो मेरा है। ये मेरे स्वाभिमान का सवाल है .
छोटी बहू:
आप अब गहनों का क्या करेंगी? पापा तो रहे नहीं… आप अभी भी गहने रखना चाहती है . वाह !
अमित:
(गुस्से में) शट अप शोभा! स्टॉप इट। अपनी ज़ुबान पर लगाम दो।
चंद्रा देवी:
(आंसुओं के साथ) अरे बेटा, इस बात के लिए आपस में मत लड़ो… अभी तुम्हारे पिताजी को गए थोड़े ही दिन हुए हैं और अभी से ये हाल है? आगे क्या होगा .. हे भगवान् रक्षा करो … सेठ जी आप तो चले गए ….
(सब थोड़ी देर स्तब्ध हो जाते हैं)
छोटी बहू:
मम्मी, हमें माफ़ कर दो, वो तो मैंने ऐसे ही गलती से बोल दिया। आग लगे ऐसी जबान को…..
बड़ी बहू:
अरे मम्मी, आपने हमें वैसे ही इतना दिया है… अब हमें माफ़ भी कर दीजिए।
अनिल:
अरे! ख़त्म करो यार ये सब… क्यों तुम लोग मम्मी को दुखी कर रहे हो. शर्म आनी चाहिए तुम दोनों को …
चंद्रा देवी :- अरे ! मत डांट इन दोनों को … हो जाता है कभी कभी.. गृहस्थी है ऊंच नीच चलती रहती है .. ये भी मेरी बच्चियां ही है .
अमित:
(हँसते हुए) वैसे मम्मी, बता दो ना कि आप इन गहनों का क्या करोगी?
चंद्रा देवी:
(हँसते हुए) अपने साथ ऊपर ले जाऊँगी… तुम सबको इससे क्या?
(सभी ज़ोर से हँसते हैं)
दोनों बहुएं (हँसते हुए ) :- माताजी ! अभी तो आपको कई साल बने रहना है … हमें तो सिर्फ आपका आशीर्वाद चाहिए.
चंद्रा देवी:
भाई, मैं भी इन्हीं को दे जाऊँगी, पर थोड़ा इंतज़ार तो कर लो… आखिर मेरे हक का मामला है।
(चंद्रा देवी मुस्कुराती हैं और दोनों बहुओं के सिर पर हाथ रख देती है । हल्की हास्य की पृष्ठभूमि धुन)
दृश्य 4: (बिज़नेस का सवाल)
अनिल: (विचारपूर्वक) “पिताजी की फैक्ट्री – राजश्री टेक्सटाइल्स – का कोई जिक्र नहीं है वसीयत में। वकील साब इसका क्या होगा?” यही तो उनका बिजनेस था …
वकील :- सेठ जी की वसीयत में इसका कोई जिक्र नहीं है भाई !
अमित : अरे वकील साब हैं … ख़ास तो यह बिज़नेस ही है उसे ही पिताजी ने छोड़ दिया है वसीयत में … इसका जिक्र तो वसीयत में होना ही चाहिए .
वकील : होना तो चाहिए लेकिन वसीयत करने वाले की वसीयत करते समय मानसिकता क्या है ये सब इस पर निर्भर करता है … मैं तो हमेशा कहता हूँ वसीयत लिखते समय किसी विशेषग्य की मदद लेनी चाहिए लेकिन सेठजी ने तो अपनी वसीयत खुद ही लिखी और एक सील्ड लिफ़ाफ़े में मुझे दे दी और कहा कि इसे उनकी मृत्यु के 30 दिन बाद खोला जाए.
अनिल : पिताजी ने किसी विशेषग्य की मदद क्यों नहीं ली …. वकील साब क्या कारण होगा ?
वकील : मुझे लगता है कि अक्सर ऐसा गोपनीयता बनाये रखने के लिए लोग करते हैं लेकिन इससे मुसीबते ही खडी होती है और आधी अधूरी वसीयते विवाद ही उत्पन्न करती है . लोगों को अपने वकील या CA पर विशवास रखना चाहिए .
अमित :- अब क्या होगा वकील साब !
वकील:
जब वसीयत में किसी संपत्ति का ज़िक्र नहीं हो, तो उस पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होता है — पत्नी और दोनों बेटों को बराबर हिस्सा मिलेगा यानी अब इस बिजनेस में आप तीनों बराबर के हिस्सेदार होंगे . अब आप इसे पार्टनरशिप में कन्वर्ट कर लेना .
(तभी सेठ जी की बहिन ममता देवी जो अब तक चुप बैठी थी बोलती हैं)
ममता देवी :- भाई साहब ने मुझसे कई बार कहा — ‘ममता, चिंता मत कर, मैं तेरे बेटे का इंतज़ाम कर दूँगा।’ अब आप सब आपस में उनके बिजनेस को बाँट रहे हैं और मेरे भाई भी नहीं रहे — हम कहां जाएं?
वकील:
बहनजी, जो होना होता है वो वसीयत में ही लिखा जाता है। अब उसके अलावा कोई रास्ता नहीं होता है।
ममता देवी: (गुस्से में )
भाभी… आप कुछ भी कहो…. आप तो जानती है मेरा बेटा गोविन्द शुरू से भैया के बिजनेस में है . एक बात बताओ वकील साब — क्या मेरे भाई के वचन की कोई कीमत नहीं है .
वकील :- कानून में तो नहीं है .
ममता देवी (चिल्लाते हुए :
मैं समझ गई !!!!! तुम सब मिले हुए हो। मेरे बेटे का हक मार रहे हो। वकील साब , आप भी इनसे मिल गए हो . हे राम ! भैया तुम हमको अनाथ कर गए.
(अनिल बाहर जाकर बुआ के बेटे गोविंद को बुला लाता है जो उनके बिजनेस में मैनेजर भी है )
अनिल:
देखो गोविंद भैया… बुआ क्या कह रही हैं।
ममता देवी:
देख गोविंद! ये सब मिलकर तेरे मामा का वचन तोड़ रहे हैं।
कहते हैं कि तुझे बिजनेस में कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, जबकि तेरे मामा ने कहा था कि वो तुझे सेट करके जाएंगे।
तू उनके साथ बीस साल से है। ये बच्चे तो तुझसे बाद में आए हैं। ये सब मिलकर हमारे साथ धोखा कर रहे हैं।
गोविंद:
अरे यार ! क्या मुसीबत है . अनिल! मैंने तुझे मना किया था ना — मम्मी को इस मीटिंग में मत बुलाना। अब तुम सब ही भुगतो इनको।
अनिल:
गोविंद भैया! आप ही बताओ क्या करना है… हम दोनों भाई तो खुद ही चाहते हैं कि तुम हमारे साथ इस बिजनेस में पार्टनर बनो… क्यों अमित ..
अमित :- और क्या … गोविन्द भैया मान जाओ अब आप भी . वसीयत में नहीं है तो क्या हम सब मिलकर तय कर लेंगे . मम्मी आप क्या कहती हो ..
चंद्रा देवी – अरे ! क्या दिक्कत है … गोविन्द बाबू को मेरी जगह पार्टनर बना दो .. कहाँ लिख कर देना है वकील साब … मैं तो तैयार हूँ ..
गोविंद:
अनिल, मुझे इन सब में मत घसीटो। मामाजी जो मेरे लिए करना चाहते थे, वो पहले ही कर चुके हैं। मुझे और कुछ नहीं चाहिए .. मामाजी तो मेरे लिए भगवान् सामान थे. मैं उनकी अमानत में खयानत नहीं कर सकता . मेरे अपने भी कुछ उसूल है .. मेरी मम्मी क्या कहती है इसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूँ भाई कम से कम इस मामले में !
(गोविन्द फिर अपनी मम्मी की तरफ देखता है और बोलता है )
गोविंद:
मम्मी! मामाजी ने जो कर दिया, वह पहले ही बहुत अधिक है।
मुझे सैलरी के अलावा प्रॉफिट का 5% मिलता है, और फ्लैट की किश्तें भी मामाजी ने ही चुकाई थीं . कंपनी ने मुझे कार दे रखी है और क्या चाहिए , मामाजी के बिजनेस पर मेरा हक़ बनता भी नहीं है ।
पापा तो मेरे बचपन में ही गुजर गए , सब कुछ मामाजी ने किया। मम्मी, लालच की भी कोई हद होती है।
अमित:
गोविंद भैया… बुआ हमारे लिए पापा की निशानी हैं।
गोविंद:
अरे छोड़ो यार तुम ये सब ! मैंने मम्मी को कल भी समझाया था। मुझे मालिकाना हक नहीं चाहिए तो नहीं चाहिए …
ममता देवी:
अरे भाई, चलो छोड़ो ये सब… अब इसे कुछ नहीं चाहिए तो फिर चलो इस मामले को बंद करो। मेरे कहे को सब भूल जाओ … माफ़ करो और आगे बढ़ो … भाई .. अरे बहु तुम देखो … रामू को चाय लाने के लिए बोलो. चलो वकील साब अब आगे क्या है … माफ़ करो और ख़त्म करो यह किस्सा ..
सब राहत की सांस लेते हैं …
चंद्रा देवी – अरे ! दीदी आपकी चिंता वाजिब है … आप माफ़ी मत मांगिये … अब इस घर की सबसे बड़ी है … बहु अब चाय के लिए बोल ही दो रामू को .
दोनों बेटे एक साथ: “बुआ जी, आप हमेशा हमारे दिलों में रहेंगी और गोविन्द भैया तो हमारे बड़े भाई है पिताजी की जगह ।”
वकील:
चलो भाई ! सब बच गए ….. गोविंद भैया… अब आप यहीं बैठिए। कोई और विवाद भी आ सकता है — आपको ही देखना है सब कुछ आपके ही बस का है .
दृश्य 5: (एफडीआर विवाद)
चंद्रा देवी – एक मिनिट वकील साब अभी दोनों बच्चे बैठे ही है इसलिए एक बात और है जिसका जिक्र होना जरुरी है ! सेठ जी की एक नेशनल बैंक में 50 लाख की FDR थी जिसका वो अक्सर जिक्र करते रहते थे. उनकी मृत्यु के कुछ दिन पहले भी उन्होंने मुझे इसका जिक्र किया था कि वह ऑफिस की उनकी अलमारी में रखी है.
वकील – अच्छा ! लेकिन माताजी FDR का कोई जिक्र वसीयत में नहीं है .
अमित: (थोड़ा आत्मविश्वास के साथ) अरे मम्मी ! इसकी कोई जरुरत नहीं थी क्यों कि पिताजी की 50 लाख की एफडीआर में मैं नॉमिनी हूँ इसलिए इसका वसीयत में जिक्र करने की जरुरत ही नहीं है यह तो उन्होंने मुझे ही दी है . उन्होंने ही मुझे नॉमिनी बनाया था .
वकील: (हँसते हुए) “भाई साहब, नॉमिनी का मतलब मालिक नहीं होता है , वह तो केवल ट्रस्टी ही होता है। ये भी कानून के अनुसार बाँटी जाएगी — सेठ जी की पत्नी और बेटों का हिस्सा बराबर होगा.
अनिल: (चुटकी लेते हुए) “भैया को तो लगा था, वो अकेले मालामाल हो जाएंगे।”
अमित :- भाई ! क्यों मेरी टांग खींच रहा है . मैं कोई वकील साब की तरह कानून थोड़े ही समझता हूँ … जो मुझे समझ आया वह बता दिया. वकील साब यह बताइए कि मैं तो नॉमिनी था ही लेकिन यदि पिताजी इसे वसीयत मेरे भाई अनिल के नाम लिख जाते तो क्या होता वकील साब !
वकील :- तो फिर पैसे तो आप निकालते लेकिन ये पूरे पैसे आपको अपने भाई को देने पड़ते .
वकील साब :- यह भी इस वसीयत की गलती है . सेठ जी को इस वसीयत में इस FDR का जिक्र करते हुए अपनी इच्छा व्यक्त कर देनी चाहिए.
चंद्रा देवी :- जो हुआ अच्छा ही हुआ नहीं तो यह नया बखेड़ा खडा हो जाता .
(सभी हँसते हैं)
वकील (वसीयत पढ़ते हुए):
“और अन्त में —
सेठ जगदीश प्रसाद अपनी नौकरानी श्यामा को, जिसने उनके अंतिम समय में उनकी सेवा की, रुपये 2,50,000 (दो लाख पचास हजार) देने की इच्छा जताते हैं। यह राशि उनके बैंक खाते से दी जाएगी।”
(सन्नाटा। सब एक-दूसरे को देखने लगते हैं। फिर अचानक झल्लाहट भड़क उठती है)
अमित (क्रोध में):
“क्या? श्यामा को ढाई लाख? यह क्या मज़ाक है वकील साब ?”
अनिल (कड़वाहट से):
“हम बेटों को छोड़, एक नौकरानी को भी सेठ जी ने हिस्सा दे दिया? अब नौकर-चाकर भी वसीयत के हक़दार हो गए?”
अमित (वकील से):
“वकील साब, इसे आप ही दबा दीजिए।
वकील (शांति से, लेकिन दृढ़ स्वर में):
“मुझे क्षमा करें, लेकिन मैं सेठ जी की अंतिम इच्छा से छेड़छाड़ नहीं कर सकता।
यह मेरे पेशे की मर्यादा के विरुद्ध है।” उन्होंने मुझ पर विशवास कर ही यह जिम्मेदारी सौंपी है .
(तभी बीच में चंद्रा देवी धीरे से बोलती हैं, लेकिन शब्दों में गहराई है)
चंद्रा देवी (धीरे लेकिन स्पष्टता से):
उसने सेवा की है, तो यदि सेठ जी ने उसे कुछ देने की बात लिखी है,तो हमें उसका सम्मान करना चाहिए। हो सकता है जब हम सब अपने कामों में व्यस्त थे तब वही उनके पास थी और उनकी सेवा की था । इसमें गलत क्या है ?
(दोनों बेटे चौंकते हैं, थोड़ी देर चुप्पी। फिर अनिल सवाल करता है)
अनिल:
“लेकिन वकील साब, क्या कोई गैर-रिश्तेदार को भी वसीयत की जा सकती है?” मेरे हिसाब से तो पापा केवल रिश्तेदारों को ही वसीयत कर सकते थे.
वकील ग्रोवर (संयत आवाज़ में):
“हाँ, बिल्कुल। कानून साफ़ कहता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मेहनत और कमाई से जिसे चाहे वसीयत कर सकता है – चाहे वह रिश्तेदार हो या कोई और।”
अमित (संदेह से):
“पर ऐसा कोई उदाहरण है क्या? या यह पहला ही उदाहरण होगा !!!!
वकील (मुस्कराते हुए):
अरे ऐसा नहीं है कई बार ऐसा हुआ है . चलिए आपको एक बड़ा और एतिहासिक केस याद दिलाता हूँ प्रियम्वदा बिड़ला जी ने अपनी 5000 करोड़ की संपत्ति अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट और सलाहकार राजेंद्र लोढ़ा के नाम कर दी थी। पूरा देश चकित रह गया था। पर कोर्ट ने माना कि वसीयत वैध थी — क्योंकि संपत्ति उनकी थी।”
अंतिम दृश्य: (परिवार की एकता) (सभी पात्र मंच पर एक साथ। हल्की रौशनी, दिल को छू लेने वाला संगीत।)
चंद्रा देवी: “सेठ जी ने जाते-जाते एक बात जरूर सिखा दी — परिवार वही, जो मिलकर चले।”
वकील: “संपत्ति बाँटने से परिवार नहीं टूटते, मन बाँटने से टूटते हैं। और आप सबने तो मिसाल कायम कर दी।”
(सभी हाथ पकड़कर मंच के सामने आते हैं।)
एक साथ: “हमारा परिवार, हमारी शक्ति!”
(तभी मंच पर सेठ जगदीश की तस्वीर की ओर सभी नज़र घुमाते हैं। एक हल्की रोशनी उस तस्वीर पर पड़ती है। सभी थोड़ी देर चुप रहते हैं। फिर वकील हाथ जोड़कर उनके चित्र के सामने खड़े होकर बोलता है:)
वकील: “सेठ जी, आपने वसीयत में चाहे जो लिखा, लेकिन आपने ऐसा परिवार बनाया जो किसी भी संकट में एकजुट रहता है।” लेकिन फिर भी मैं आप सभी को यह सलाह देता हूँ कि वसीयत बनाते समय किसी विशेषग्य की मदद जरुर लें .
(अमित आगे आता है) अमित: “पिताजी, हम वादा करते हैं कि आपका नाम, आपकी प्रतिष्ठा और आपके संस्कार कभी मिटने नहीं देंगे।”
(अनिल हाथ में वसीयत की फाइल बंद करता है और बुआ जी के हाथ में देता है) अनिल: “बुआ जी, यह कागज़ की फाइल नहीं, यह हमारे रिश्तों की नींव है।”
(ममता देवी भावुक होकर बोलती हैं) ममता: “मेरे भाई ने जो बीज बोया, वो आज एक सुंदर वृक्ष बन चुका है — ये परिवार।”
(चंद्रा देवी सभी को पास बुलाकर कहती हैं) चंद्रा देवी: “चलो बेटा, अब सब मिलकर प्रसाद बाँटते हैं। आज से कोई बँटवारा नहीं — न भावनाओं का, न रिश्तों का।”
(सभी मिलकर मंच के आगे आते हैं, हाथ थामते हैं और कहते हैं) एक साथ: “हमारा परिवार, हमारी शक्ति! हमारी परंपरा, हमारी एकता!”
(धीमे प्रकाश में मंच पर ‘परिवार ही पूंजी है‘ लिखी पट्टी दिखती है। फिर तालियों की गड़गड़ाहट में परदा धीरे-धीरे गिरता है।)
सुधीर हालाखंडी


