सुधीर हलाखंडी

कर कानूनों में सरलीकरण का वादा कम से कम दो दशक पूर्व किया गया था जिसे प्रत्येक सरकार एवं वित्त मंत्री ने बार –बार दोहराया है और प्राम्भिक अवस्था में इस पर काफी कार्य भी किया गया था. केन्द्रीय सरकार के साथ –साथ सभी राज्यों की सरकारों ने भी इस सम्बन्ध में अपने –अपने करदाताओं को इस प्रकार के वायदे बार –बार दोहराए है . इन सभी के पीछे लक्ष यह था कि सरकार का कर संग्रहण भी बराबर होता रहे और करदाताओं को भी कम से कम कष्ट हो .

आयकर के सम्बन्ध में भी इस और काफी काम हुआ था जिसमे एक पृष्ट का “सरल” रिटर्न फॉर्म भी जारी हुआ , टैक्स ऑडिट की रिपोर्ट आयकर रिटर्न के साथ नहीं लगाने का प्रावधान भी लागू हुआ , राज्यों के वैट कर कानूनों के तहत सभी राज्यों को एक ही तरह की कर दर लगाने की शुरुआत हुई , केन्द्रीय बिक्री कर के तहत बिक्री कर की दर वैट लगने के बाद प्रतिवर्ष एक प्रतिशत गिराने की भी प्रक्रिया प्राम्भ हुई . यह सभी स्वागत योग्य कदम रहे और कही भी यह संकेत उपलब्ध नहीं है कि इससे सरकार के राजस्व में कोई कमी आई हो .

लेकिन पिछले कुछ वर्षो में एका-एक क्या हुआ कि सरलीकरण के वादे से हमारे कानून निर्माताओ ने मुंह मोड़ लिया ? एक पेज का आयकर रिटर्न कई पेज का हो गया , मांगी जाने वाली सूचनाये बिना किसी कारण से लगातार बढाई जाने लगी , स्त्रोत पर कर कटोती के प्रावधान एवं इससे सम्बन्धित रिटर्न भरने की प्रक्रिया इतनी कठोर बना दी गई कि करदाता को कर एकत्र कर जमा कराना एक जंजाल लगाने लगा. इस सम्बन्ध में लगने वाली शास्ती (पेनल्टी) के नीयम इस तरह सख्त बनाए गए है कि लगता है पेनल्टी वसूली भी एक राजस्व वसूली की तरह कर कानूनों के निर्माताओ मूल का उद्देश्य हो गया है .

आयकर रिटर्न भरने के लिए ऑनलाइन सुविधा का दायरा तो बढ़ा लेकिन इसके साथ ही इसे दुविधापूर्ण बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. जब अंकेक्षित (ऑडिटेड) आयकर के साथ वित्तीय प्रपत्र यथा लाभ हानि खाता , बैलेंस शीट इत्यादि अपलोड करवा ही रहे है तो ये सभी राशिया फिर से आयकर रिटर्न में भी भरवाने की क्या आवश्यकता है इसके बारे में विचार करने का समय किसी के पास नहीं है , फ्रिंज बेनिफिट टैक्स के जमाने में ड्राफ्ट किये गए आयकर रिटर्न के लाभ हानि खाते के प्रारूप को आज भी जारी रखा जा रहा है जब कि इस कानून की अनुपयोगिता को स्वीकार करने हुए सरकार इस कर को ही कभी का वापिस ले चुकी है .

साझेदारी फर्म (पार्टनरशिप फर्म ) यदि अपना रिटर्न धारा 44AD के तहत 8 प्रतिशत का लाभ दिखाते हुए भरना चाहती है तो आयकर रिटर्न -5 में स्पष्ट्तया इसकी कोई व्यवस्था नहीं है इसके लिए आयकर रिटर्न -4 SSS की तरह ही आयकर रिटर्न -5S जारी करने की मांग कब से हो रही जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है क्यों कि सारी शक्ति एवं ज्ञान का उपयोग तो प्रक्रियाओं को किस तरह और कठिन एवं दुविधापूर्ण बनाया जाए इस पर लगा है . इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मोबाइल पिन एवं ई-मेल पिन से जुडी अव्यवहारिक प्रक्रिया है जिसे बिना सोचे समझे लागू किया गया बिना यह जाने कि हर कर दाता के लिए ई-मेल अकाउंट रखना संभव नहीं है और यदि यह इतना ही उपयोगी था तो फिर इसे 30 एवं 31 जुलाई 2014 को क्यों हटा दिया गया ? यह सभी कुछ करदाताओं की सुविधा की जगह कानून निर्माताओ की सुविधा को देखते हुए हो रहा है और प्रक्रियाओं को सुविधाजनक तरीके से तोड़ा मरोड़ा जा रहा है .

केद्रीय बिक्री कर की दरो को कम करने का जो वादा किया गया था उसे कई वर्षो से 2 प्रतिशत पर ही रोक दिया गया है , राज्यों में वेट की दरो के साथ लगातार खिलवाड़ हो रहा है – 4 प्रतिशत की सामान्य दर को राज्यों ने बढ़ा कर 5 किया तो केंद्र ने इसे रोकने की जगह स्वयं ही केन्द्रीय कर कानूनों के तहत आवश्यक वस्तुओ (केन्द्रीय बिक्री कर कानून की धारा 14 के तहत वर्णित वस्तुए ) की कर दर पर लगे प्रतिबन्ध को 4 प्रतिशत से बढ़ा कर 5 प्रतिशत कर दिया गया जिससे ही पता लगता है की करारोपण को लेकर करदाताओ के साथ क्या खेल खेला जा रहा है .

कई राज्यों में वेट के रिटर्न भरने की पर्याप्त सुविधा नहीं होते हुए भी शत –प्रतिशात ऑनलाइन रिटर्न भरने को करदाताओ की सुविधा के नाम पर अनिवार्य कर दिया गया है लागातार साईट क्रेश होने या धीमी चलने के कारण रिटर्न भरने की तारीखे लगातार बढाई जाती रही है लेकिन इस सम्बन्ध में लगनी वाली पेनाल्टी के सम्बन्ध में राज्य कोई रियायत देने को तैयार नहीं है . इस सम्बन्ध में यह सवाल भी उठता है कि जब सुविधाए भी पूरी उपलब्ध नहीं है तो शत – प्रतिशत ऑनलाइन रिटर्न भरना अनिवार्य करना कन्हा की समझदारी है और यदि सुविधाओं का अभाव है तो फिर पेनाल्टी लगाने के शोक को तो थोडा रोका जा सकता है .

जी.एस. टी . के नाम पर करदाताओ को वर्ष 2006 से सरलीकरण के सपने दिखाए जा रहे है लेकिन वास्तविकता यह है कि जी.एस.टी. के असली केंद्रीयकृत रूप को तो राज्य वर्ष 2006 में ही ठुकरा चुके थे और अब दुविधा यह है कि जी.एस. टी . के जिस समझोतावादी रूप में इसे लागू करने की सहमती होने की बात की जा रही है , जिसके तहत बिक्री एवं सेवा के एक ही व्यवहार पर केंद्र एवं राज्य दोनों ही “सी.जी.एस.टी.” (केंद्र द्वारा लगाया जाने वाला जी.एस. टी .) एवं एस.जी.एस.टी. (राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला जी.एस. टी .)के रूप में अलग –अलग कर लगायेंगे, को लेकर भी केंद्र और राज्यों के बीच अभी बहुत कुछ तय होना बाकी है . अभी निकट भविष्य में जे.एस.टी लगने की बहुत ज्यादा संभावना नहीं है लेकिन जो रुख हमारे कानून निर्माताओ इस समय है वह नहीं बदला तो निश्चित रूप से जी.एस. टी .लगाने के बाद करदाताओं की मुश्किलें और भी बढ़ जायेंगी . जी.एस. टी. की सफलता के लिए जरुरी है कि सरकार एक बार फिर से कर प्रणालियों के सरलीकरण की और कोई ठोस कदम उठाए.

अभी हाल ही में केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने टैक्स ऑडिट रिपार्ट का वर्ष के मध्य में जो नया प्रारूप जारी किया उससे तो यह हे जाहिर होता है कि अब कानून निर्माता “सरलीकरण” के साथ – साथ तार्किकता के सिद्धांत का भी त्याग कर दिया गया है क्यों कि इस प्रारूप में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इसे वर्ष के मध्य में जारी किया जाए और अब टैक्स ऑडिट की रिपोर्ट की तारीख 30/11/2014 तक बढ़ा कर आयकर रिटर्न की तारीख अभी भी 30/09/2014 रखना इस और पूरा संकेत है कि कर कानूनों के सम्बन्ध में अब सरली कारण एवं तार्किकता के वादे को ताक में रख दिया गया है चाहे इससे करदाताओ को कितना भी कष्ट क्यों ना हो.

हो सकता हो कि इसमे नई सरकार का कोई निहित उद्देश्य या निर्देश नहीं हो क्यों कि यह कार्यक्रम तो लगातार ही चल रहा है और बिना किसी स्पष्ट निर्देश के सरकारी नोकरशाही पुरानी नीति एवं परम्पराओं का ही पालन कर रही हो लेकिन यह सच है कि इससे आम करदाता एवं उनकी मदद करने वाले विशेषज्ञों के कष्ट बढ़ाते जा रहे है जो कि किसी भी लोकप्रिय सरकार का उद्देश्य हो ही नहीं सकता जिसकी और इस सरकार का ध्यान दिलाना एवं सरकार द्वारा इस और ध्यान देना बहुत ही जरुरी है .करो का एकत्रीकरण तो निर्बाध रूप से हो लेकिन करदाताओ को होने वाले कष्ट भी कम हो सके.

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0 responses to “क्या अब कर कानूनों के सरलीकरण का युग समाप्त हो चुका है”

  1. V. Sivaraman says:

    Typo error corrected:

    Don’t be surpised if very soon (may be from next AY 2015-16) the assessee will be asked to maintain accounts in “TALLY SOLUTIONS” only and attach the data with tax returns.
    May be few more accounts package providers like “busy” who fund the ….

  2. V. Sivaraman says:

    Don’t be surpised if fery soon (may be from next AY 2015-16) the assessee will be asked to maintain accounts in “TALLY SOLUTIONS” only and attach the data with tax returns.
    May be few more accounts package providers like “busy” who fund the ….

  3. CA Rakhecha Surat says:

    That was the MARKETING GAME of the government.
    .
    Firstly, it invited the ASSESSEES; now it is PENALIZING them for NO FAULT of them.
    .
    The government must verify the tax collected just a decade ago and the collection of tax in recent years.
    .
    To support my view:
    .
    Every year the Income-Tax Department makes a TARGET to achieve the TAX REVENUE.
    .
    Is it really a BUSINESS that TARGET be achieved. Whatever Taxes are due, that must be accounted/projected, not the make it ambition to COLLECT more and more.

  4. Sunil Pareek says:

    Dear Sir,

    I am agree with you.
    You are 100% correct, Please forward your views to Finance Ministry and PMO.

  5. C A K C AGARWAL says:

    It is very true that which has been said by Sudhir jee. Actually so much burden on the businessman have been imposed ,that now now the business man thinking whether they should continue the bushiness or not. it appears from the action of the Govt. , that they are discouraging the Indian business man and giving much facility to foreign country. So much restriction just as T D S. has been imposed on the businessman, what the business man getting by following the rule of T D S, he has to spent money, face penalty,waste the time for nothing, we feel that the law should be such, which may not be hurdle in the progress of the country. I am very sure, and our beloved new Govt. will consider it

  6. pkb says:

    realy fantastic & well drafted article. We must make posters of the article & paste on each wall of Income tax department & finance ministry.

  7. Manish says:

    Really good article in Hindi sir, appreciate your in-depth knowledge and command over language.

  8. b k vyas says:

    it’s a true that govt think only their worknot shows indidividual person proble.

  9. PUSHPENDRA KUMAR GUPTA says:

    Dear Sir,

    First of all,Pl.accept my hearty congratulation for daring to publish such meaningful hard facts about Income tax act .Why Govt.of India is neet heeding public demand to get change the age old IT Act –still medical deduction is Rs 15000 pa ,Transport allowance Rs.900 pm,eduacation allowance -Rs 200 pm for 02 kids etc. Now for the sake of coming good days in Hon’ble Modi ji regime /Under guidance of Hon’ble Arun jaitley ji,we do have a good & affirmative hope.

    warm regards,
    P.K.Gupta
    QA Dept
    SRF Limited,Bhiwadi(Alwar)raj 301019

  10. sundeep johri says:

    You are 100% correct, Please forward your views to Finance Ministry and PMO

  11. V Sivaraman says:

    This only speaks of the arrogance of the Tax Revenue officials.

  12. gopal tulsyan(Advocate) says:

    thank u very much sir….i am also agree with u,gov. only SARALIKARAN ka nara dekar asseesee ko ULLU banakar BABAJI KA THULLU pakra rahi hai. again thnk.u sir.

  13. CA KIRAN SIPANI says:

    Dear Sir

    Your view is absolutely right, We are appreciating for the same. But Law makers do not have any concern. Facing the Complication in law is the Duty of Tax Professional. what can we do.?

  14. sathyanarayana says:

    I do not understand this because I do not know Hindi

  15. Akash says:

    Very Very good sir…i m 100% agree with u…not only me but here are so many person who have same thoughts as u mentioned
    thank u very much
    but what we do our govt. is deaf…blind.

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