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जीएसटी को भारत में लगे हुए 5 साल से अधिक हो चुके हैं और अब यह कर भारत में पूरी तरह से स्थापित हो जाना चाहिए लेकिन व्यापारिक क्षेत्र से जो समाचार लगातार आ रहें है उनके अनुसार परेशानियां अभी भी है . जीएसटी की सबसे पहले भारत में मुख्य रूप से चर्चा सन 2006 में हुई थी जब कि उस समय के वित्तमंत्री श्री पी. चिदंबरम ने जीएसटी की चर्चा भारतीय संसद में की थी . उसी समय से कुछ कर कानूनों से जुड़े हुए लेखक जीएसटी से जुड़े हुए है और सुधीर हालाखंडी उनमें से एक हैं. आइये आज बात करते हैं सुधीर हालाखंडी से जीएसटी के बारे मे.

प्रश्न:- सुधीर जी आप तो जीएसटी से प्रारम्भ से ही जुडे हुए है और अब जीएसटी को भारत में लागू हुए 5 वर्ष हो चुके हैं . आपकी राय में यह जीएसटी का सफ़र कैसा रहा .

सुधीर हालाखंडी – इस सफ़र के तीन पक्ष हैं . पहला -सरकार , दूसरा – करदाता और तीसरा – प्रोफेशनल्स . आइये जीएसटी के इस सफ़र का तीनों पक्षों पर क्या प्रभाव पडा उसकी चर्चा करतें हैं . देखिये जहाँ तक सरकार का पक्ष है देखें तो राजस्व का ध्यान आता है  और लगातार जीएसटी का राजस्व बढ़ता जा रहा है तो फिर इस पक्ष के हिसाब से जीएसटी एक सफल कर है.

जहां तक व्यापारी वर्ग और प्रोफेशनल्स का सवाल है अभी भी इस कर कानून की जटिलताएं बनी हुई है और अगर कुछ क्षेत्रों में जैसे इनपुट क्रेडिट, RCM का मामला है जटिलताएँ बढ़ती जा रही है. जीएसटी में अभी बहुत सुधार की जरुरत है . जिस संख्या में जीएसटी नोटिस जारी हो रहें है उससे लगता है कि जीएसटी की प्रक्रियाएं सरल नहीं है .

प्रश्न :- वैसे जीएसटी में इनपुट क्रेडिट को लेकर क्या होना चाहिए जिससे सभी पक्ष संतुष्ट हो सके.

सुधीर हालाखंडी – देखिये मेरी प्रारम्भ से ही यह राय रही है कि जीएसटी एक बार एकत्र करने के बाद उसे चुकाने की जिम्मेदारी भी उसी व्यक्ति की होनी चाहिए जिसने इसे एकत्र किया है और जीएसटी में जब यह हो जाएगा तभी डीलर्स संतुष्ट हो पायेंगे और जीएसटी की बहुत सी समस्याएं हल हो जायेंगी. खरीददार की इनपुट क्रेडिट रोकना कोई इस समस्या का हल नहीं हैं ना ही यह कोई आदर्श स्तिथि है . यह तो अपने पक्ष का राजस्व प्राप्त करने के लिए सरकार का सबसे सरल उपाय है और सीधी भाषा में कहें तो यह गलत तरीका है जिसे बदलना जरुरी है .

प्रश्न :- अभी यह जो 2017-18 और 2018-19 की इनपुट क्रेडिट मिस्मेच के लिए जो सर्कुलर जारी किया गया है उससे कितनी राहत मिलेगी.

सुधीर हालाखंडी – यह सर्कुलर तो सिर्फ तकनीकी गलतियों से रुकी हुई इनपुट क्रेडिट के सम्बन्ध में है और उन्ही में लाभ या राहत देगा  लेकिन विशेष मुश्किल तो तब है जब कि विक्रेता ने कर लेकर चुकाया ही नहीं है तो ऐसे में सरकार को उन विक्रेता को पकड़ कर दण्डित करना चाहिए और उन्ही से कर वसूलना चाहिए. यदि ऐसे में क्रेता की इनपुट क्रेडिट रोकी जाती है तो यह एक तरह से उस पर कर का दोहरा भार होगा क्यों कि एक बार का कर तो वे अपने विक्रेता को दे चुके हैं.

प्रश्न :- RCM की समस्या के बारे में भी आपने बहुत लिखा है . आखिर यह क्या समस्या है और इसका समाधान अब तक क्यों नहीं हो रहा है .

सुधीर हालाखंडी – RCM पहले तो अनरजिस्टर्ड व्यक्तियों से खरीदी गई सभी माल और सेवाओं पर लगा दिया था फिर इसमें कुछ छुट दी गई और फिर लगभग 4 माह बाद इसे हटा लिया गया था लेकिन अधिसूचित वस्तुओं और सेवाओं पर यह लागू रह गया  . यदि यह जिस तरह से प्रारम्भ में लागू किया गया था उसी तरह से रह जाता तो यह कितनी मुसीबतें खडी करता क्यों कि इसका जितना भी हिस्सा रह गया है वही करदाताओं के लिए बहुत खतरनाक साबित हो रहा है . सरकार को करना यह चाहिए कि वह उस RCM के दुष्प्रभावों से करदाताओं को मुक्त करे जहाँ इस कर का कोई वित्तीय प्रभाव नहीं था या है . जहां इनपुट क्रेडिट चुकाने के बाद उसकी क्रेडिट मिलनी है और करदाता ने उसे नहीं चुकाया है तो करदाता को इसका दंड नहीं दिया जाना चाहिए. वैसे भी यह एक अदूरदर्शी और अव्यवहारिक प्रावधान रहा जिसके दुष्प्रभावों के बारे में जब इन्हें बनाया गया था तब सोचा ही नहीं गया है.

प्रश्न :- जीएसटी लागू होने का सबसे बड़ा फायदा क्या हुआ ?

सुधीर हालाखंडी – दो राज्यों के बीच होने वाले व्यापार पर लगने वाले कर की इनपुट क्रेडिट मिलने लगी है और वेट के दौरान लगने वाले सीएसटी कर के तहत सी -फॉर्म्स एकत्र करने की समस्या से मुक्ति मिल गयी है . करों की संख्या कम हुई है . प्रोफेशनल्स को अब लगातार पढने और सीखने की आदत डालनी पड़ी है . करदाता सूचना तकनीक की आधुनिक सुविधाओं की जानकारी मिली है . सरकार का राजस्व बढ़ा है और करदाताओं की संख्या भी बढ़ी है.

प्रश्न :- जीएसटी में एक प्रावधान है जिसके तहत यदि कोई क्रेता बिल की तारीख से 180 दिन तक भुगतान नहीं करता है तो उसकी इनपुट क्रेडिट जो उसने ली है ब्याज सहित फिर से भरनी पड़ती है . इसका कोई फायदा विक्रेताओं को हुआ है जो भुगतान पाप्त नहीं होने के कारण परेशान रहते हैं ?

सुधीर हालाखंडी – इस प्रावधान को इस लिए लाया गया था कि इसकी कभी स्पष्ट घोषणा कानून निर्माताओं द्वारा नहीं की गई है और इसका फायदा विक्रेताओं को हो रहा है इसका भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं दिखता है क्यों कि भुगतान इतने समय पर नहीं किया गया है और अधिकांश मामलों में इसका पालन भी नहीं हो रहा है .  इस प्रावधान की मुख्य विशेषता यह है कि भुगतान नहीं करने [पर इसकी सूचना देने की जिम्मेदारी भी क्रेता को ही दी गई है तो इसका कोई विशेष फायदा विक्रेता को नहीं हो रहा है .

प्रश्न:- जीएसटी नेटवर्क के बारे में भी आपने शुरू से बहुत कुछ लिखा है . इस समय क्या स्तिथि है इस नेटवर्क की .

सुधीर हालाखंडी – प्रारम्भ के वर्षों में जीएसटी के नेटवर्क ने कर दाताओं और सरकार दोनों को बहुत तकलीफ दी लेकिन इस समय यह नेट वर्क ठीक काम कर रहा है और शायद ही कोई शिकायत अभी पिछले कुछ महीनों में आई है . इस समय इस नेटवर्क का काम ठीक ठाक है .

प्रश्न :- जीएसटी एक दोहरा कर है जिसमें एक ही व्यवहार पर राज्य और केंद्र दोनों कर लेते हैं. इससे कर दाताओं को कोई परेशानी है .

सुधीर हालाखंडी – जीएसटी भारत में एक देश एक कर के नाम से लगाया गया था लेकिन भारत के संविधान के अनुसार संघीय ढांचे के कारण यह एक दोहरे कर के रूप में ही लगाया जाना था . भारत में जीएसटी अगर लगना था तो इसी तरह से ही लगना था. प्रारम्भ में यदि कोई परेशानी हुई हो तो अलग बात है लेकिन अब तो सब की आदत पड़ गई है इसलिए अब तो कोई परेशानी नहीं है. प्रारम्भ में भी जो परेशानी कही गई थी वह केवल सिंद्धांतों की थी कि एक देश एक कर के नाम से दोहरा कर क्यों है बाकी इससे अभी कोई परेशानी नहीं है. जीएसटी भारत सरकार द्वारा लिया गया एक साहसिक कदम था और यह दोहरा कर इसका व्यवहारिक स्वरुप है. जीएसटी में जो परेशानियाँ आई है वे इस कर के लगाने से नहीं है बल्कि इसे लगाने के तरीके से है जिसमें कई खामियां थी और अभी भी है.

प्रश्न :- जीएसटी का एक वार्षिक रिटर्न है और इसे भी आप कोई बहुत अधिक व्यवहारिक रिटर्न नहीं कह सकते हैं. इस बारे में आपका क्या विचार है ?

सुधीर हालाखंडी – जीएसटी का वार्षिक रिटर्न इस तरह से बनना चाहिए कि करदाता तमाम अपनी गलतियों को बताते हुए वह रिटर्न बनाये जिससे उसकी वास्तविक कर देयता और उसका भुगतान किस तरह से किया जा गया है यह बता सके. लेकिन यह रिटर्न ऐसा नहीं है और फिर जब जीएसटी के मुख्य रिटर्न GSTR-3B में गलतियां सुधारने का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए इस वार्षिक रिटर्न का महत्त्व बिलकुल ही समाप्त हो गया है.

जीएसटी के वार्षिक रिटर्न को आये अभी 5 साल हो गए है फिर भी आपने देखा होगा कि इस रिटर्न को समझने के लिए हर साल की तरह इस साल भी बहुत से सेमीनार हुए हैं और लेख लिखे गए हैं और इसी से पता लगता है कि यह रिटर्न प्रोफेशनल के लिए भी एक मुसीबत है तभी तो इसे हर साल सीखना पड़ता है.

जीएसटी में अभी बहुत सुधार की जरुरत है

जीएसटी के वार्षिक रिटर्न को लेकर एक मेरा बड़ा सवाल है कि GSTR-9 और 9C क्यों अलग -अलग भरवाएं जाते हैं. GSTR-9 में कुछ और कॉलम बढ़ा कर इसे 5 करोड़ रूपये के ऊपर के टर्नओवर वाले डीलर्स के लिए GSTR-9C यहीं बनाया जा सकता है. इसीलिये मैं कई बार कहता हूँ कि प्रारम्भ से ही  कहीं ना कहीं जीएसटी कानून में व्यवहारिकता की कमी तो रही है.

प्रश्न – जीएसटी इ-वे बिल और ई -इन्वोईस के बारे में आपका क्या ख्याल है ?

सुधीर हालाखंडी – जीएसटी ई-वे बिल में तो फिलहाल कोई समस्या नहीं है क्यों की अधिकांश राज्यों ने अपने राज्य के भीतर इसकी सीमा को 50 हजार रूपये से बढ़ा 1 लाख रूपये और कहीं -कहीं 2 लाख रूपये कर दी है. ई -इन्वोइस को इस समय 10 करोड़ रूपये से अधिक पर रखा गया है और अभी हाल ही में जारी एक स्पष्टीकरण में यह बताया गया है कि फ़िलहाल इसकी सीमा 5 करोड़ रूपये करने का कोई विचार नहीं है इसलिए फिलहाल छोटे डीलर्स को राहत है . सरकार जीएसटी के पूरे सिस्टम को आधुनिक करना चाहती है तो फिर डीलर्स को भी इसके लिए तैयार रहना चाहिए इसके अलावा कोई चारा नहीं है.

प्रश्न – जीएसटी में ब्याज की दर के बारे में भी आप लगातार बताते रहते हैं. आखिर क्या है यह विवाद ?

सुधीर हालाखंडी – देखिये कोई अगर देरी करेगा तो ब्याज तो लगेगा ही लेकिन मेरा यह कहना है कि ब्याज की दर बहुत ज्यादा है और इसे व्यवहारिक बनाना चाहिए. इसे बैंक ऋण की दर से 2 या 3 प्रतिशत अधिक रखनी चाहिए क्यों कि 18 प्रतिशत की दर बहुत पुरानी और अधिक है . इस दर को कम करने की जरुरत है क्यों कि कर देरी से जमा करने और रिटर्न देरी से भरने के और भी दुष्परिणाम है इसलिए ब्याज को ब्याज की तरह की वसूल किया जाना चाहिए.

प्रश्न – एक विवाद और भी है कर के जमा करने के सम्बन्ध में . डीलर्स कर तो जमा करा देते हैं लेकिन उनका ब्याज तब तक चलता है जब तक कि वे रिटर्न नहीं भर देते हैं.

सुधीर हालाखंडी – यह भी एक अप्राकृतिक और तर्कहीन प्रावधान है और इसके बारे में कई बार लिखा जा चुका है लेकिन अभी भी जो है वही चल रहा है और निकट भविष्य में इसकी कोई संभवना भी नहीं है.

इसी तरह का एक प्रावधान है IGST के टैक्स के विरुद्ध CGST और SGST को समायोजित करने का है और इसके तहत जब तक CGST का बैलेंस क्रेडिट लेजर में समाप्त नहीं होता है तब तक IGST को  SGST से समायोजित नहीं किया जा सकता है और इससे आगे के लिए एक ऐसा असंतुलन पैदा होता है कि SGST में पर्याप्त शेष होने पर भी CGST का केश में भुगतान करना पड़ता है . यदि पहले IGST में टैक्स को समायोजित करते समय CGST और SGST को बराबर -बराबर या आवश्यकतानुसार समायोजित करने दिया जाए तो यह समस्या हल हो सकती है.

प्रश्न :- जीएसटी सरलीकरण आपका प्रिय विषय रहा है और आपने इस पर भी बहुत लिखा है . इस समय काफी समय से आपकी कलम इस विषय पर खामोश है,

सुधीर हालाखंडी – हाँ मैंने इस विषय पर शुरू से ही लिखा है और आगे भी यह मांग जारी रहेगी क्यों कि मेरा यह कहना है कि जीएसटी की सफलता इसके सरलीकरण में ही निहित है . इस समय सिर्फ इस विषय को विश्राम दिया है.

प्रश्न :- अच्छा !! जीएसटी सरल हो जाए क्या यही अंतिम लक्ष होना चाहिए ?

सुधीर हालाखंडी – फिलहाल तो यही लक्ष होना चाहिए लेकिन अंतिम लक्ष तो एकल जीएसटी होना चाहिए जिसमें केंद्रीयकृत जीएसटी हो और एक बार इसे एकत्र करने के बाद राज्य और केंद्र आपस में बांटे. यह  कब लागू होगा यह तो पता नहीं लेकिन इसके प्रयास जारी रहने चाहिए क्यों कि जीएसटी का आदर्श स्वरुप यही है.

प्रश्न :- यदि आपको जीएसटी के किन्ही प्रावधानों के हटाने या बनाने को कहा जाए तो आप क्या करेंगे या आप क्या सलाह देंगे.

सुधीर हालाखंडी – देखिये सबसे पहले तो मैं वितीय प्रभाव से मुक्त RCM को 1 जुलाई 2017 से हटाने की राय दूंगा. दूसरा GSTR-3B को संशोधन करने का प्रावधान बनाने की सलाह दूंगा और तीसरा यह है कि एक डीलर को इनपुट क्रेडिट लेने की समय सीमा को उसके वार्षिक रिटर्न भरने तक बढ़ा दिया जाये. इनपुट क्रेडिट के सम्बन्ध में वसूली उस व्यक्ति से की जाए जो कि टैक्स एकत्र कने के बाद कर जमा नहीं करवा पा रहा है.

प्रश्न :- जीएसटी एम्नेस्ट्री स्कीम के बारे में भी आपके कुछ विचार है ?

सुधीर हालाखंडी – हाँ लेकिन यह एमनेस्टी लेट फीस माफ़ करने या ब्याज माफ़ करने वाली एमनेस्टी नहीं है जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ . देखिये जीएसटी एक नया कर था और सरकार माने या ना माने थोड़ा कठिन भी था. अब इसमें प्रारम्भ के 5 सालों में गलतियां बहुत हुई है और मेरा यह कहना है गलती और अपराध में फर्क होना ही चाहिए इसलिए एक एमनेस्टी स्कीम ऐसी आनी चाहिए जिसमें डीलर्स अपनी इन गलतियों को सुधार सके. जैसे IGST की इनपुट क्रेडिट SGST और CGST में ले ली गई है , कर का भुगतान पूरा किया गया है लेकिन RCM में इसे दिखाया नहीं गया है . ये कुछ उदहारण है और ऐसी सभी गलतियों जिनमें कर की चोरी नहीं है तो इनको सुधारने के लिए एक एमनेस्टी लाई जानी चाहिए.

प्रश्न :- और जीएसटी के पाठकों के बारे में आपका कोई सन्देश.

सुधीर हालाखंडी – हाँ मेरे ट्वीट लगातार देखते रहिये वे अधिकत्तर जीएसटी से ही सम्बंधित होते हैं . कानून जैसा भी बना है उसका पालन करने की पूरी कोशिश करिए , ध्यान से काम करिए ताकि कम से कम गलतियां हो और आप आराम से अपना काम करते रहें.

***

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4 Comments

  1. Raj Kumar Kanodia says:

    Sir,
    GST SHOULD BE LEVIED ONLY ON FIRST POINT(MANUFACTURER+ OR OTHER WHO IS FIRST SUPPLIER OR SERVICE PROVIDER), IN CASE OF UN-REGISTERED SUPPLIER AND/OR SERVICE PROVIDER THEN GST SHOULD BE LEVIED ON REGISTERED SUPPLY AND/OR SERVICE TAKER. THERE IS NO ITC CLAIM, NO LETIGATION.

  2. DEEPAK SONJE says:

    GOVT IS COLLECTED AND USED GST AMOUNT BUT NOT CONSIDER TRADERS REQUIREMENTS THIS GST IS ONLY IN FAVIOUR OF GOVERNMENT AND GOVERNMET NOT CONSIDERS TRADERS PROBLEMS

  3. DEEPAK SONJE says:

    CURRENT GST IS ONLY IN FAVIOUR OF GOVERMENT BUT AS GOVERNMENT POINT OF VIEW TRADERS ARE THIEF AND THEY COLLECTED GST AS GUNDOKA HAFTA AND NOT A TAX SUCH AS

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