सुधीर हालाखंडी

Sudhir Halakhandiसमीक्षा-  जीएसटी कौंसिल के ताजा निर्णय – क्या हुआ और अब और क्या चाहिए
जीएसटी कौंसिल की 31वीं मीटिंग जो 22 दिसम्बर 2019 को हुई है इससे आम करदाता एवं कर विशेषज्ञों को बहुत अधिक उम्मीद थी . आइये एकबार देखें कि क्या ये उम्मीदें पूरी हुई या फिर से उन्हें निराश होना पडा. आइये देखें कहाँ तक करदाता की उम्मीदें पूरी हुई है और जहां नहीं हो पाई उनमें आगे क्या उम्मीद है और जहाँ नहीं हुई है वहां सरकार की क्या मजबूरियां थी . एक और बात पर आपसे बात करेंगे कि कुछ जगह हुआ यह है कि माँगा कुछ और गया था और जो दिया गया है उसने ना सिर्फ प्रभावित डीलर्स की निराशा को बढ़ाया है बल्कि ऐसा लगता है कि ईमानदार करदाता के साथ यह न्याय नहीं है . इसके साथ ही सेवा क्षेत्र में जो स्माल डीलर्स काम कर रहें हैं उनके लिए भी  एक आशा की किरण नजर आई है . आइये थोड़ा विस्तार से इन सभी विषयों पर जीएसटी कौंसिल की इस महत्वपूर्ण मीटिंग में लिए गए निर्णयों के परिपेक्ष में चर्चा करें.

1.कर की दर और राजस्व

यहाँ हम राजस्व प्राप्ती की आवश्यकता से जीएसटी भुगतान करने वाले किसी एक वर्ग की उम्मीदों की तुलना करेंगें तो हमें एक ही सिक्के का दूसरा पक्ष भी नजर आयेगा और वह  पक्ष है कि राजस्व एकत्र करना भी सरकार का एक उत्तरदायित्व है और कर छूट देते समय इसका ध्यान रखना भी जरुरी है और यह वित्त मंत्री महोदय ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में बहुत अच्छी तरह से समझाया था .  यहाँ हम बात कर रहे हैं सीमेंट और टायर की . रियल स्टेट और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को बहत बड़ी उम्मीद थी कि कर की दर 28% से गिराकर 18% कर दी जायेगी. इस पर किसी सकारात्मक खबर के इन्तजार के लिये माहौल भी पिछले एक दो दिन से बना दिया गया था . लेकिन ऐसा हुआ नहीं और इसके लिए वित्त मंत्री महोदय ने राजस्व पर इस कमी के कारण पड़ने वाले प्रभाव का हवाला भी दिया .
सीमेंट और टायर की उपयोगिता आम आदमी की अनिवार्यता से जुडी है और इन्हें अब बहुत समय तक सरकार कर की उच्चतम दर पर रखना बहुत दिन तक संभव नहीं होगा. एक विचार यह भी है कि सरकार इस दर को कम करने के लिए “उचित समय” का इन्तजार कर रही है . कारण कुछ भी हो सीमेंट और टायर पर कर की दर में कमी ना होना इस मीटिंग से एक बड़े वर्ग को निराशा दे गया है.
एक सांत्वना के रूप में पुराने टायर पर कर की दर कम की गई है लेकिन इसका कोई बहुत बड़ा प्रभाव नहीं पडेगा. पुराने टायर पर कर की दर 28% से गिराकर 18% कर दी गई है . यहाँ यह विचारणीय प्रश्न है कि कि सरकार टायर पर एक बार 28% कर लेती है तो फिर पुराने टायर पर एक बार फिर कर क्यों लिया जाता है . क्या यह दोहरा करारोपण नहीं है वह भी तब जब कि व्यवहारिक रूप से अधिकत्तर मामलों में टायर की खरीद पर इनपुट क्रेडिट ही नहीं मिलती है. यह एक व्यवहारिक विचार है कानूनी धारणा इसके विपरीत हो सकती है लेकिन फिर भी कर की दर में इस कमी का कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ने वाला है .
सिनेमा टिकट्स पर कर की दर कम कर सरकार ने एक लोकप्रिय फैसला लेने की कोशिश की है. 32 इंच तक के टेलीविजन पर कर की दर 28% से घटा कर 18% की गई है लेकिन जिन भी वस्तुओं पर कर की दर कम करने की घोषणा की गई है उनका कोई विशेष प्रभाव नहीं पडेगा सिर्फ इसके कि अब 28% कर की दर के तहत आने वाली वस्तुओं की संख्या कुछ कम नजर आने लगेगी . माल वाहनों के थर्ड पार्टी बीमा के प्रीमियम पर जीएसटी की दर में 6 प्रतिशत की कमी कर इसे 18% से गिराकर 12% किया गया है जो एक अच्छा कदम है जो इस सेक्टर के उपभोक्ता को अवश्य राहत देगा . उम्मीद की जा सकती है कि  आगे आने वाली जीएसटी कौंसिल की मीटिंग में शायद कुछ और सकारात्मक घोषणा हो जिससे कुछ वास्तव में इन्तजार कर रहे सेक्टर को कुछ राहत मिल सके जिसमें रियल स्टेट और ट्रांसपोर्ट सेक्टर भी शामिल है .
यहाँ जो कमी की गई है उससे राजस्व पर 5500 करोड़ रूपये की हानि का अनुमान लगाया गया है लेकिन यदि उम्मीद के अनुसार सीमेंट और आटोमोबाइल सेक्टर को छूट दी जाती तो केवल इन दोनों में दर की कमी से होने वाला घाटा 33000.00 करोड़ रूपये था इसलिए आप समझ सकतें है वित्तीय मजबूरियों के चलते सरकार वह लाभ नहीं दे पाई जिसकी उम्मीद की जा रही थी .

2. करों का एक ही लेजर – एक बड़ी समस्या का अंत

करों को जमा कराने के लिए भी जीएसटी में अलग –अलग लेजर थे और किसी एक लेजर में जमा कर उसी प्रकार के कर को ही समायोजित करता था और यदि गलत लेजर में कर जमा हो जाए तो उसे पहले फिर से जमा करना होता था और गलत लेजर में जमा किये गए कर का रिफंड लेना होता था . यह एक गलत प्रणाली थी और इसके बारे में प्रारम्भ से ही बता दिया गया था कि इसे सुधार कर एक ही लेजर से सारे कर जमा होने चाहिए ( एक वर्ष पुराने लेखक के ट्विट देखें ) . अब सरकार इसे मानने को तैयार है और शीघ्र ही कर अब एक ही लेजर से जमा होगा.  यह देरी से लिया हुआ एक स्वागत योग्य फैसला है जिसे आप गलती सुधार भी कह सकते हैं .

3.वार्षिक रिटर्न – तारीख फिर बढ़ी !!!!!!!!!! पिछले साल की छुटी  हुई इनपुट भी ले सकेंगे .

वार्षिक रिटर्न और जीएसटी ऑडिट  की तारीख जो पहले 31 दिसंबर थी जिसे बाद में बढ़ाकर 31 मार्च किया गया था उसे अब बढ़ाकर 31 मार्च 2019 किया गया है और इसे एक्सपर्ट्स करदाता को दी जाने वाली सुविधा से ज्यादा जीएसटी प्रबंधन की वार्षिक रिटर्न संबंधी यूटिलिटी समय पर नहीं बना पाने को देते है. जीएसटी रिटर्न्स के सम्बन्ध में प्रक्रिया संबंधी परिवर्तन किये गए है लेकिन इस सम्बन्ध में एक बड़ा फैसला यह किया गया है कि वित्तीय वर्ष 2017-18 में जो इनपुट क्रेडिट लेनी रह गई है वह अब व्यवहारिक रूप से 20 अप्रैल 2019 तक ली जा सकती है. लेकिन क्या विक्रेता भी इस अवधि के अपने GSR-1 में छूटी बिक्री जिसे वे किसी डीलर के नंबर में दिखाने से रह गए हैं और रोकड़ अर्थात B to C में दिखा दी थी  को अब भी दिखा सकेंगे ? यदि ऐसा नहीं करते हैं तो फिर इस परिवर्तन के अभाव में इनपुट क्रेडिट लेने के समय को बढाने के आधे –अधूरे फायदे ही मिलेंगे. सरकार को इसपर भी विचार कर शीघ्र फैसला करना चाहिए.

4. सेवा क्षेत्र के लिए कम्पोजीशन – एक स्वागत योग्य विचार

अगली मीटिंग में फैसला लेने के लिए कुछ मुद्दे समिती / मंत्रियों के समूह को सोंपे गए है जिसमें सेवा क्षेत्र से जुड़ा एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा भी है और वह है सेवा क्षेत्र के स्माल डीलर्स को कम्पोजीशन के तहत लेना . इसे लॉ एवं फिटमेंट समिती को सोंपा गया है . सर्विस सेक्टर के लिए यह एक बड़ी राहत  हो सकती है . जीएसटी के तहत जो 20 लाख रूपये की करमुक्ति की सीमा है उसे बढाने का मामला भी मंत्रियों के समूह को दिया गया है . इन दोनों मुद्दों पर कोई सकारत्मक फैसला हुआ तो करदाताओं के एक बड़े वर्ग को लाभ होगा लेकिन सरकार को इससे जुड़े राजस्व की और भी सोचना पडेगा.

5. रिफंड वितरण (Disbursement)– अब एक ही विभाग से

जीएसटी एक देश –एक कर के नाम से प्रचारित किया गया था लेकिन यह एक दोहरा कर है जिसमें केंद्र एवं राज्य किसी भी एक करयोग्य व्यवहार पर एक साथ अपने –अपने अलग-अलग कर वसूल करते हैं . डीलर्स के लिए केंद्र और राज्यों के अधिकार क्षेत्र भी तय कर दिए है जिनसे डीलर दोहरे नियंत्रण से बाहर रहें . डीलर्स का राज्य और केंद्र के अधिकार क्षेत्र में विभाजन व्यवहारिक रूप से यह कितना सफल है वह तो समय ही बताएगा लेकिन जीएसटी रिफंड जारी (Disbursement) करते समय  अभी भी दोहरा नियंत्रण है जिसे अब समाप्त करने का फैसला इस समय कौंसिल द्वारा लिया गया है जो एक स्वागत योग्य कदम है और अब एक ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है जिससे रिफंड का वितरण एक ही विभाग से हो .

6. रिटर्न्स की लेट फीस पर लिए फैसले से डीलर्स निराश

आइये अब इस मीटिंग में लिए एक बड़े और अब विवादास्पद फैसले पर चर्चा करें. लेट फीस जीएसटी के प्रारम्भ से ही एक विवाद का मसला रहा है और रिटर्न जीएसटी के साथ आसानी से चले जाते हों ऐसा नहीं कहा जा सकता है . जीएसटी नेटवर्क भी इसके लिए कुछ हद तक जिम्मेदार रहा है . इसके चलते और कुछ अपने कारणों से डीलर्स समय पर रिटर्न नहीं भर पाए लेकिन फिर भी उन्होंने किसी भी तरह से रिटर्न भर दिए पर इसके लिए उन्हें लेट फीस का भुगतान करना पड़ा और कुछ मामलों में यह लेट फीस की रकम काफी बड़ी थी . कहीं –कहीं कर की राशि से भी बड़ी थी और शून्य बिक्री या शून्य कर देयता पर भी लेट फीस की राशी में कोई छूट नहीं थी क्यों कि देरी से जमा कराये कर पर वे ब्याज तो दे ही रहे हैं .
अब डीलर्स की मांग यह थी कि सरकार यह लेट फीस उन्हें लौटा दे. लेकिन जो फैसला हुआ है वह यह है कि जिन डीलर्स ने अभी तक जुलाई 2017 से सितम्बर 2018 तक के रिटर्न पेश नहीं किये हैं उन्हें कोई 31 मार्च 2019 तक रिटर्न भर देने पर कोई लेट फीस का भुगतान नहीं करना पडेगा. यह इस फैसले का लेट फीस भुगतान कर चुके डीलर्स की लेट फीस लौटाने की मांग से कोई सम्बन्ध नहीं है लेकिन यह फैसला उनके मांग का समर्थन करता हुआ ही दिखता है . सरकार ने जो डीलर्स लेट फीस के कारण अपने रिर्टन नहीं भर रहे है उनसे राजस्व लेने के लिए यह फैसला किया है और इसका अर्थ सरकार यह मानती है कि इन डीलर्स का कर भी बकाया है और ऐसी स्तिथी में इस तरह के फैसले कोई अच्छी परम्परा की और संकेत नहीं करते हैं और इसी कारण से  यह कोई स्वागत योग्य फैसला नहीं है और जिन डीलर्स ने लेट फीस के साथ रिटर्न भर दिए है उनके साथ यह फैसला भेदभाव भी दर्शाता है . अब सरकार को यह चाहिए कि इस फैसले की सार्थकता को साबित करने के लिए उन डीलर्स की लेट फीस भी लौटा दे जिन्होंने ईमानदारी से अपने रिटर्न और कर लेट फीस के साथ भर दिए हैं .

7. जीएसटी नेटवर्क की कार्यप्रणाली पर भी चर्चा हो 

आइये अब एक और विषय पर चर्चा करें और वह है जीएसटी नेटवर्क की कार्यप्रणाली और अब इसके बारे में जीएसटी कौंसिल को गंभीरता से विचार करना चाहिए. जीएसटी नेटवर्क से डीलर्स और प्रोफेशनल्स को हमेशा ही शिकायत रही है और जीएसटी 18 महीने बीत जाने के बाद भी जीएसटी नेटवर्क की शिथिलता अभी भी जीएसटी की सफलता पर एक प्रश्नचिन्ह बना हुआ है . जीएसटी नेटवर्क की क्षमता में यथोचित वृद्धि होनी जरुरी है और इसके साथ ही जीएसटी प्रबंधन और जीएसटी नेटवर्क के बीच भी सामंजस्य का अभाव है जिसके लिए जीएसटी विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए .
आइये देखें जीएसटी नेटवर्क के साथ समस्या क्या है ? देखिये जब भी कोई सूचना तकनीकी विकसित की जाती है तो आने वाले कुछ वर्षों की आवश्यकता का आकलन कर इसे विकसित किया जाता है लेकिन जीएसटी नेटवर्क के साथ ऐसा शायद नहीं हुआ इसलिए जीएसटी लगते ही जीएसटी नेटवर्क संकट में पड़ गया जो आज भी जारी है.
दूसरा आपको एक और बात है कि किसी टैक्स के सम्बंधित नेटवर्क को तकनीकी व्यक्ति ही चला लें ऐसा संभव नहीं ही यहाँ जीएसटी विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए थी . आइये आपको एक उदाहरण देतें हैं – जिन जीएसटी   डीलर्स ने अपने रजिस्ट्रेशन निरस्त करवा लिए उन्हें अपना एक अंतिम रिटर्न GSTR-10 में भरना था जो कि निरस्तीकरण के आदेश की तिथी से 90 दिन के भीतर भरना था . यह रिटर्न समय पर ऑनलाइन जारी ही नहीं हुआ इसलिए बढ़ते –बढ़ते इसकी तारीख 31 दिसंबर कर दी गई लेकिन जीएसटी नेटवर्क ने 15 दिसम्बर के बाद ही लेट फीस 200 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से वसूल करना शुरू कर दिया था और बहुत से केसेस में इस कारण डीलर्स ने जमा भी करा दी थी क्यों कि प्रतिदिन यह लेट फीस 200 रूपये के हिसाब से बढ़ रही थे. इसकी जानकारी जब जीएसटी प्रबन्धन को दी गई तब शायद 7 वें दिन यह गलती सुधारी गई . त्रुटि मानव स्वभाव है और जीएसटी नेटवर्क भी इंसान ही चला रहें है लेकिन पूरे देश में लाखों डीलर्स पर लगने वाले इस बड़े कर के प्रबंधन में ऐसी गलतियां नहीं होनी चाहिए यदि प्रबंधन कुशलता से काम करे. यह तो कुछ भी नहीं है इसके बाद जो हुआ वह और भी खतरनाक स्तिथी की और संकेत करता है . इस गलती को जब सुधारा गया तब GSTR-10 की अंतिम तिथी 30 दिसंबर कर दी गई जब कि यह तारीख 31 दिसंबर होनी चाहिए थी.
GSTR-9 एवं सम्बंधित वार्षिक रिटर्न्स के फॉर्म्स की यूटिलिटी समय पर उपलब्ध नहीं होना भी जीएसटी प्रबंधन और जीएसटी नेटवर्क में विशेषज्ञता के अभाव का परिचायक है . यहाँ सूचना तकनीक से जुड़े लोग इसके लिए जीएसटी कानून और इसमें लगातार परिवर्तन और इसकी जटिलता को देते हैं लेकिन यह सारा कुछ यही बताता है कि एक तो जीएसटी प्रबंधन और जीएसटी नेटवर्क में सामंजस्य और विशेषज्ञता दोनों का अभाव है और यही अभाव अंत में जीएसटी पर बोझ साबित होगा . इस समस्या पर भी अब जीएसटी कौंसिल को विचार करना चाहिए.

8. प्रक्रियाओं में सुधार जरुरी 

जीएसटी रिटर्न मुश्किल है , यह जगजाहिर बात है लेकिन कर कानून से जुडी ब्यूरोक्रेसी ने प्रारम्भ से ही इनके सरल होने की जबरदस्त वकालात की थी और इस वक्त यह हाल है कि मूल कानून में बताये गए मुख्य रिटर्न्स की बात करें तो अभी जीएसटी लगने के पहले महीने अर्थात जुलाई 2017 के रिटर्न्स ही अभी 18 माह तक पेंडिंग है . जीएसटी रिटर्न 3 B दो माह के लिए आया था और इसे लगभग 18 माह से ज्यादा हो चुके हैं. अब फिर सरकार 1 अप्रैल से नया रिटर्न सिस्टम लाएगी प्रायोगिक तौर पर जिसे जुलाई 2019 में अंतिम रूप से लागू किया जायगा . सरकार सुधार की और अग्रसर है लेकिन गति अवश्य ही बहुत धीमी है जो चिंता का विषय है .
जीएसटी कानून में जिस तरह से सरकार सुधार कर रही है उससे यह लगता है कि प्रारम्भ में यह कर कानून इतना सख्त क्यों बनाया गया था ? क्यों  यहाँ कर कानून से जुडी ब्यूरोक्रेसी ने हमारे राजनैतिक नेतृत्व को इतना जटिलता भरा कानून बना कर लगाने को मजबूर किया कि 18 माह में ही इतने अधिक सुधार करने पड़ रहें हैं और इसके बाद भी सुधार की मांग लगातार आ रही है .जीएसटी कौंसिल को अब इस मसले पर भी अपनी कोई राय कायम कर इसके कारणों को भी खोजना चाहिए ताकि सुधार की प्रक्रिया तेज हो सके.
यहाँ आप देखेंगे कि हमने कहीं सरकार और कहीं जीएसटी कोंसिल शब्द का प्रयोग किया है आप अपनी सुविधा अनुसार इसे बदल कर पढ़ लें क्यों कि अंतिम उद्देश्य तो सरकार और कौंसिल का जीएसटी सुधार ही है .
जीएसटी कौंसिल की मीटिंग पर अधिकांश कर दाताओं की नजर कर की दर पर रहती है लेकिन जीएसटी से जुड़े विशेषज्ञों का इस सम्बन्ध में पूरा ध्यान जीएसटी सुधारों पर लिए फैसलों पर रहता है . जीएसटी भारत सरकार का एक बहुत ही साहसभरा उद्देश्यपूर्ण फैसला है जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य था और अब इसकी सफलता निरंतर सुधारों के प्रयासों पर आधारित है जिसके लिए जीएसटी कौंसिल और सरकार को निरंतर प्रत्नशील रहना पडेगा और आपको और हमको भी निरंतर रचनात्मक और व्यवहारिक सुझाव देने होंगे.
आइये कुछ एवं तीव्र सुधारों की आशा करें ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जीएसटी उतना ही उपयोगी हो सके जिसकी उम्मीद व्यापार और उध्योग जगत ने जीएसटी लगने के समय की थी .

  • सुधीर हालाखंडी

 

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8 Comments

  1. AMAR KUKKAR says:

    Late fees deposited by honest dealers any how should be refunded and till today late fees in the previous returns is charging, therefore returns from Oct to Nov cannot be filled till previous returns is filled.

  2. ASHISH KHANDELWAL says:

    You are right sir.
    The decision of waiver of late fees for those who have not filed the returns till now shows that the person who have filed the returns with late fees are foolish. This is an inspiration to the person who are not complying the law. This is quite disgusting.

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