-सुधीर हालाखंडी

Sudhir Halakhandiजिस समय भारत में जीएसटी लगाया गया था उस समय भी यही बताया गया था कि जीएसटी की प्रक्रियाएं जिस प्रकार से कठिन से कठिन बनाई जा रही है और व्यापार एवं उध्योग के लिए इन्हें पूरा करना आसान नहीं होगा . इसका एक बहुत बड़ा कारण था कि जीएसटी भारत में लाया तो एक बहुत अच्छे उद्देश्य से था लेकिन इसे जिन लोगों ने प्रारम्भ में बनाया उनका एक ही ख्याल था कि “जीएसटी में कर की चोरी किस तरह से रोकी जाये” और इसी एक मात्र उद्देश्य ने जीएसटी की सरलीकरण की राह में बहुत बड़ी बाधा खड़ी कर दी जो कि जीएसटी का मुख्य उद्देश्य था और इस सख्ती ने आज हालात यहाँ तक पहुचा दिए है कि अब ये सवाल पूंछा जा रहा है कि क्या अब भी जीएसटी को बचाया जा सकता है ?
Read this Article in English at the following link- Still GST Can Be Saved!! GST Chaos – Reasons And Solutions


क्या किया जाना चाहिए
आइये पहले यह देखें कि अब क्या किया जाना चाहिए ताकि इस आलेख का प्रारम्भ सकारात्मक तरीके से हो सके और इसके बाद हम देखेंगे कि जीएसटी संकट का कारण क्या है और कौन जिम्मेदार है इस स्तिथी के लिए .

1. टैक्स का भुगतान मासिक हो और जीएसटी रिटर्न त्रैमासिक किये जाए.
2. टैक्स का भुगतान चालान से लिया जाए और GSTR-3B को समाप्त किया जाए .
3. GSTR-1 को बिल टू बिल की जगह डीलर टू डीलर बनाया जाए . खरीदादर से भी डीलर टू डीलर खरीद की डिटेल ली जाए और दोनों का मिस्मेच केद्रीय स्टार पर निकाल कर विक्रेता और क्रेता के अकाउंट में शो कर दिया जाए ताकि वे इसे दूर कर सके.
4. अब तक भरे GSTR-3B में संशोधन की सुविधा शीघ्र प्रारम्भ की जाए .
5. तीन माह् में एक ही रिटर्न हो और इसमें जो भी सूचना लेनी हो वह एक साथ ही ले ली जाए . इस रिटर्न को भरने के लिए तिमाही की समाप्ति से 30 दिन का समय दिया जाए.
6. लेट फीस की राशी कर की राशि के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए .
7. वार्षिक रिटर्न भरने के से पूर्व सभी रिटर्न्स को सशोधन करने की प्रावधान होना चाहिए.
8. मिस्मेच में सीधे ही क्रेता के विरुद्ध कार्यवाही करने से पहले यदि उसके बिल इत्यादि पूरी तरह से सही है तो पहले विक्रेता के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही हो और उससे कर वसूल किया जाए और यदि वसूल ना हो तो रजिस्ट्रेशन निरस्त कर दिया जाए .
9. यदि क्रेता 6 माह तक भुगतान नहीं करे तो उसकी इनपुट क्रेडिट को निरस्त करने का प्रावधान है लेकिन इसकी सूचना भी क्रेता ही अपने रिटर्न में देगा . इसे परिवर्तित कर सूचना देने का यह अधिकार विक्रेता , जिसका भुगतान रुका है को दिया जाए.
10. रिटर्न संबंधी सुधारों को किसी आगे की तिथी से लागु करने की जगह तुरंत लागू किया जाए.
11. जीएसटी नेटवर्क एक बार में 1.50 लाख रिटर्न ही ले पात़ा है इसके बाद के डीलर ऑनलाइन लाइन में लगे रहते है . इसे बढा कर 15 लाख रिटर्न किया जाए ताकि आने वाले कुछ वर्षों तक जीएसटी नेटवर्क की समस्याएं समाप्त हो सके.
12. वार्षिक रिटर्न, समायोजन विवरण – 9 A , B और C को फिर से और तार्किक तरीके से ड्राफ्ट किया जाए.
13. सारे फॉर्म समय से आये, जीएसटी नेटवर्क ठीक से चलता रहे इसके लिए जीएसटी प्रबन्धन और जीएसटी नेटवर्क को पाबन्द किया जाए.
14. अंतिम दिन भी डीलर्स रिटर्न भर सकें इसकी पूरी व्यवस्था हो. जीएसटी नेटवर्क को इसके लिए पाबन्द किया जाए .
15. जीएसटी प्रबन्धन करदाताओं पर विशवास रखें और करदाता भी जीएसटी पर विश्वास रख सकें इसके लिए माहौल तैयार किया जाए.
16. सेवा क्षेत्र में 50 लाख रूपये के करदाताओं के लिए कम्पोजीशन स्कीम शीघ्र लाइ जाए. इसके लिए कम्पोजीशन कर की दर 3 प्रतिशत से 5 प्रतिशत के बीच रखी जाए.
17. कर की दरों के सबंध में केवल “Sin & Luxury” को ही 28% की दर में रखा जाए और शेष जो अभी भी 28% में हैं उनके बारे में जल्दी फैसला लिया जाए.

इस स्तिथी के कारण क्या है ?
आइये अब देखें कि जीएसटी जिस हालत में आज है उसके लिए जिम्मेदार कौन है क्या जिस तरह से जीएसटी कानून बनाया गया वह इसके लिए जिम्मेदार है या जिस तरह से जीएसटी भारत में लागू किया गया वह जिम्मेदार है. जीएसटी कानून तो मुख्यतया उसी तरह से बनाया गया है जैसा कि भारत की संघीय व्यवस्था में संभव था लेकिन जिस तरह से जीएसटी सख्ती से लागू करने के प्रयास किये गए उनमें सरलीकरण का अभाव ही इस स्तिथी के लिए पूर्ण रूप से जिम्मेदार नजर आता है .
जीएसटी में प्रक्रियाएं प्रारभ में ही इतने सख्त बनाई गई उसका एक उदाहरण प्रारम्भ में जो रिटर्न मांगे गए थे उनके बारे अब तक डीलर्स और प्रोफेशनल्स भूल ही चुके होंगे तो आइये देखें प्रारम्भ में जीएसटी प्रबंधन की क्या योजाना थी :-
ये थी और भी कठिन प्रक्रिया जो प्रारम्भ में आने वाली थी

रिटर्न का नाम विवरण कब तक पेश करना है
GSTR-1 मासिक बिक्री का विवरण अगले माह की 10 तारीख तक
 
GSTR-2 मासिक खरीद का विवरण अगले माह की 15 तारीख तक (10 तारीख के पूर्व यह रिटर्न नहीं भरा जा सकता है अर्थात इसे आपको 10 से 15 तारीख के बीच भरना है).
GSTR-3 मासिक कर का रिटर्न अगले माह की 20  तारीख तक.
GSTR-9 वार्षिक रिटर्न वित्तीय वर्ष की समाप्ती के बाद 31 दिसम्बर तक.


आपको लग रहा होगा की कितना सख्त प्लान था प्रारंभ में ही और हमारे ब्यूरोक्रेट्स प्रारम्भ में इसका प्रचार इस तरह से कर रहे थे कि इससे आसान जीएसटी की प्रक्रियाओं का स्वरुप हो ही नहीं सकता है . प्रारम्भ में ही विशेषज्ञों द्वारा यह आशंका व्यक्त कर दी गई थी कि हर माह इतने रिटर्न्स भरने संभव नहीं होंगे और अभी तक भी आप देखेंगें कि यह योजना लागू नही हो पाई और इसकी जगह एक नया जीएसटी फॉर्म – 3 B माह भरा जा रहा है और GSTR-1 हालात तो यह है कि इसकी तारीखें नियमित रूप से बढ़ती गई है .
GSTR-3B एक ऐसा रिटर्न था जो हर माह मांगा गया और देरी से पेश करने पर लेट फीस का प्रावधान भी था लेकिन इसके साथ ही जीएसटी नेटवर्क भी पूरी तरह से रिटर्न्स लेने को तैयार नही था और पिछले 18 महीने में कई बार संकट में पडा रहा तो ऐसे में लेट फीस ने भी डीलर्स के परेशानियों को और बढ़ाया और आज यह लेट फीस भी एक बड़े विवाद का कारण बन गई है . GSTR-3B कोई मूल रिटर्न नहीं था इसे केवल टैक्स जमा कराने के विकल्प के रूप में लाया गया था और अब इसे बंद कर केवल टैक्स के चालान से इसका काम चला लेना चाहिए.
GSTR-1 में भी सरकार प्रत्येक बिल की डिटेल मांगती है लेकिन इससे होता यह है कि इससे डीलर्स का काम बढ़ जाता है और दूसरा इससे जीएसटी नेटवर्क पर भी बोझ बहुत बढ़ जाता है आर रिटर्न्स के अंतिम दिनों में वह कभी चल ही नहीं पाया . यह काम बिल टू बिल की जगह डीलर टू डीलर डिटेल से भी बखूबी चलाया जा सकता था लेकिन इसके लिए डीलर्स पर विश्वास करना जरुरी होता है जो कि जीएसटी लागू करने के साथ ही जीएसटी प्रबंधन ने छोड़ दिया था.
सख्त कानून बनाना जरुरी है और कर चोरी रोकने के लिए इसकी सख्त जरुरत है लेकिन इसमें व्यवहारिकता का समावेश जरुरी है वो सख्त कानून किस काम का जिसका पालन करने में ईमानदार करदाता को इतनी अधिक तकलीफ हो और दूसरा आपका सिस्टम भी इसे झेल नहीं पाए. जीएसटी सरलीकरण के लिए लाया गया था लेकिन करदाता यह पूंछ रहा है कि यदि यही सरलीकरण है तो फिर कठिन जीएसटी क्या होता.
जीएसटी बिल मेचिंग का सिस्टम भी कोई बहुत अच्छा नहीं है यह भी डीलर्स के लिए एक समस्या है . पहले खरीददार GSTR-1 में अपनी बिक्री की डिटेल देता है वह खरीदादार के GSTR-2A में अपने आप चली जाती है फिर खरीददार उसे चेक कर अपने विक्रेता को सूचित करता है कि कौनसा बिल छोड़ दिया गया है . यह काम हर डीलर को अपनी खरीद चेक करने के लिए अलग –अलग करना होता है और सोचिये जब लाखों डीलर यह काम करते है तो कितना समय बर्बाद होता है.
आइये इसका विकल्प सोचें . सबसे पहले तो सरकार डीलर्स पर विश्वास करे और बिक्री की  बिल टू बिल की जगह डीलर टू डीलर सुचना ले उसके बाद डीलर्स को अपनी खरीद की बिल टू बिल डिटेल भी देने को कहे . अब इससे होगा यह कि एक ही केन्द्रीय सॉफ्टवेयर इस खरीद और बिक्री को चेक कर लेगा और मिस्मेच निकाल कर विक्रेता और क्रेता को उनके अकाउंट में सूचित कर देगा जिससे वे आपस में इसे मिस्मेच को दूर कर लेंगे. इससे लाभ यह एक तो लाखों डीलर्स को अपने –अपने मिस्मेच अलग –अलग नहीं निकालने पड़ेंगे और दूसरा जीएसटी नेटवर्क पर भी बोझ कम पडेगा. 2006 में भारत में वे लगाया गया था और कई प्रयोगों के बाद जीएसटी लागू होने के पूर्व यही सिस्टम सफलतापूर्वक चल रहा था .
एक बड़ा सवाल यह भी पूंछा जाता है कि क्या जीएसटी लगाने के पूर्व कोई होमवर्क किया गया था ? इसका जवाब तो यह है कि किया तो जरुर किया होगा लेकिन उसकी गुणवत्ता कोई बहुत अच्छी नही थी. जीएसटी नेटवर्क तो ऐसा लगता है कि तैयार ही नहीं था तो फिर इसपर प्रयोग करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है . आज हमारे कानून निर्माता भी जीएसटी को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं क्या इसका कारण यह है कि जीएसटी कम तैयारी और  अति-आत्मविश्वास के साथ लगाया गया था और “जीएसटी रिटर्न तो कोई पडौस का बच्चा ही भर लेगा” इसका बहुत बड़ा उदाहरण है. क्या जीएसटी रिटर्न ही जीएसटी है ? ऐसा नहीं था लेकिन प्रक्रियाओं के उलझाव ने ऐसा ही बना दिया है और यही अब सच बन गया है .
अभी जीएसटी की सफलता को राजस्व की प्राप्ती से तो आंका ही नहीं गया है यह तो केवल अभी प्रक्रियाओं की जटिलता और करों की दरों में ही उलझकर रह गया है.
अब जीएसटी को बचाने का एक मात्र ही उपाय है कि जीएसटी का मूल उद्देश्य अब सरलीकरण को बना दिया ताकि जिन डीलर्स को कर एकत्र कर भुगतान करना है वे पूरी तरह से इससे वाकिफ हो सकें और एक बार यह सुनिश्चित हो जाए तो फिर जीएसटी प्रबंधन जीएसटी की प्रक्रियाओं के साथ धीरे –धीरे प्रयोग कर इन्हें और भी उपयोगी बनाए. इसके अतिरिक्त जीएसटी नेटवर्क की क्षमता और गति को बढ़ाने के उपाय भी सुनिश्चित किये जाए.
जीएसटी का उद्देश्य होना चाहिए कि भारत की अर्थव्यवस्था को एक सरल और अच्छी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली देना जो कि जीएसटी के प्रारम्भिक 18 महीनों के दौरान संभव नही हो सका जिसके क्या कारण रहे इनका जिक्र अभी ऊपर किया गया है और अब जीएसटी को बचने के लिए इन कारणों को ध्यान में रखते हुए जितना शीघ्र हो सके उपाय किया जाना चाहिए जिनमें से कुछ उपाय ऊपर बताये गए है .

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14 Comments

  1. SHYAM MAHESHWARI says:

    GST के पायजामें में इतने पैबंद लगे चुके हैं कि पूरा पायजामा ही बर्बाद हो गया, अब इसका इलाज असंभव लगता है।

  2. S.N. CHECHANI says:

    The only option is old principal of designing any project “KISS”
    “keep it simple, stupid”.
    Keep things so simple that a stupid can understand it.But govt is not thinking about simplicity but only price reduction only.

  3. Sushil Sureka says:

    I have been following Shri Sudhir Halakhandi for quite sometime and he has been doing a great service to the Trade & Industry by lucid analysis and giving practical suggestions for improvement of GST. He is absolutely right in saying that the only goal while framing GST, was to give maximum powers to bureaucrats. It completely ignored the hardships of the stakeholders who collect and deposit tax on behalf of government free of cost or even investing their own money and are still labelled as cheats.
    GST is so complicated and in trying to improve it, so many patches have been put that it can never become simple by piecemeal approach.
    The need of the day is to rewrite the whole act keeping in view the ground realities of Indian Trade & small industry.
    Sushil Sureka,
    General Secretary,
    Ahilya Chamber of Commerce & Industry.Indore

  4. Rakesh Bansal Adv says:

    All class of tax professionals are
    working 24X7 to make GST a grate success. But we are all fools and we never understood that
    our Finance Minister is know only how to make money from the litigation’s. Bureaucrats
    are the master’s who’s advice is taken by Finance Ministry .We have read that
    small countries have grate success in GST implementation and the business community are
    happy.But in India, after the introduction of the GST the business community and all class of
    tax professionals are crying because of the problems faced by them in the WEB site and also theLaw. Do you know how many notifications, circulars,press note,clarifications and amendments
    have been introduced/made after the introduction of the GST? We too agree that there will be
    initial problems for a couple of years,but not to this extent.

  5. RAM DHARI says:

    JO KUCH NAHI KARNA CHAHTE, UNHE TO THALI SE KHANA UTHA KE KHANA BHI BAHUT KATHIN LAGTA HAI.
    HAMARA BHARAT MAHAN HAI LEKIN YHA PAR KUCHH NETA UR OFFICER SALE CHOR HAI.

  6. Rakesh Bansal Adv says:

    SIR, Bureaucrats in Modi Govt. gave complicated GST to India. This has been done with the
    main intent to defame Modi ji also to disprove his statement of Good Simple Tax about India
    GST. Now again, GSTN portal levying late fees penalty in thousands on tax payers for the
    mistake of Technology Partner for not providing 100% glitches free GSTN portal. This is once
    again the action of bureaucrats to defame Modi Ji. Now it is prayed before our favourite Prime
    Minister also Minister for public grievance to intervene in the matter give directions to GST
    Council not to levy late fees or penalty unless GSTN portal become free from all glitches.

  7. Mueksh Kumar says:

    Aalsi , Kamchor aur tax choro ke liye Sarkar kuch bhe kar le ,
    Enka Kabhi Nahi Barage.
    Jab Ek Aadmi Business karna Sikh Sakta Hai,
    To Wo Return File Karna Koy Nahi Sikh Sakta

  8. Rakesh Bansal Adv says:

    सर, आप टैक्स प्रोफेशनल के लिए जो काम कर रहे वो बहुत ही सहरानीय है i आप टैक्स प्रोफेशनल के असली हीरो हो i

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