जीएसटी – अब समस्याओं का समाधान जरुरी है

अब जीएसटी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक अनिवार्यता है और पूरी अर्थव्यवस्था व्यवहारिक रूप से जीएसटी की सफलता पर ही निर्भर है लेकिन इस समय जीएसटी के सम्बन्ध में जो स्तिथी चल रही है उससे भारतवर्ष के व्यापारी वर्ग की स्तिथी अब असहनीय हो गई है और उनकी परेशानियां अब बढ़ती ही जा रही है इसलिए अब सरकार को चाहिए कि वह इन समस्याओं पर ध्यान दे और इसके लिए सुधारात्मक कदम उठाये अन्यथा जीएसटी भारतीय उद्योग एवं व्यापार के लिए एक दीर्घकालीन समस्या बनकर इसे नुक्सान पहुचायेगा. आइये देखें कि जीएसटी की समस्याएं क्या है , इनकी गंभीरता कितनी है और इनके समाधान अब क्यों जरुरी है . हमारे कानून निर्माताओं को चाहिए कि वे जीएसटी से जुडी समस्याओं को अब गंभीरता से ले और उनके शीघ्र सुलझाने का एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाए . इन समस्याओं के कारण अब हो यह रहा है कि डीलर्स को लगातार नोटिस मिल तहे है और उनको उनके ना सिर्फ जवाब देने पड़ रहें हैं लेकिन सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि सरलीकरण के नाम पर लाया गया यह कर अब कानूनी मसलों में जाकर उलझ जायगा और इसका सबसे बड़ा खमियाजा केवल और केवल करदाता को उठाना पडेगा.

10 serious problems of GST

1.  तकनीकी गलतियां सुधारने का कोई अवसर नहीं दिया गया

जीएसटी में अधिकाँश समस्याएं इस बात के कारण है कि तकनीकी भूलों को सुधार करने की कोई प्रभावी सुविधा नहीं है और प्राम्भ से ही जीएसटी को इतनी सख्ती के साथ बनाया गया जिससे यह लगता है कि हमारे कानून निर्माताओं ने उस समय यह मान लिया था कि डीलर्स और प्रोफेशनल्स कोई “रोबोट” है और वे कोई गलती कर ही नहीं सकते और इसी कारण से इतनी सख्त प्रक्रियाएं बनाने के बाद भी गलती होने पर सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं रखी गई  और यही एक कानून निमाताओं की भूल व्यापार एवं उद्योग के लिए मुसीबत बन गई है .   

जीएसटी एक नया कर है  और भारत के उद्योग एवं व्यापार ने इसके पालन करने में पूरी मेहनत और ईमानदारी से सहयोग दिया है लेकिन कर नया होने के कारण इसके पालन में प्रारम्भिक समय में उद्योग एवं व्यापार से काफी तकनीकी गलतियाँ हुई है  लेकिन इस प्रकार की तकनीकी गलतियों में किसी भी प्रकार की कर चोरी की भावना नहीं होती है लेकिन चूँकि जीएसटी के प्रमुख रिटर्न GSTR-3B में गलती के संशोधन का कोई प्रावधान नहीं था तो ये गलतियों सुधर ही नहीं सकी और इस समय जीएसटी के प्रारम्भिक दौर में ही ये गलतियां अब गंभीर रूप ले चुकी है इनके लिए सरकार को अब कोई सुधार का तरीका निकलना होगा.

जीएसटी से पहले जो अप्रत्यक्ष कर का कानून था जिसके सरलीकरण के लिए जीएसटी लाया गया था उस कानून में जिसमें  सर्विस टैक्स , वेट और सेंट्रल एक्साइज भी शामिल थे में भी रिटर्न को संशोधत करने की सुविधा थी , आयकर का रिटर्न भी संशोधित हो सकता है फिर जीएसटी कर जो कि सरलीकरण के लिए लाया गया था उसमें इस तरह का असुविधाजनक प्रतिबन्ध लगाने का कोई तर्क नहीं है और यदि जीएसटी के रिटर्न संशोधित करने का प्रावधान कर दिया जाए तो जीएसटी के रिटर्न एवं कर निर्धारण में होने वाली अधिकांश  समस्याएं  हल हो जायेंगी . आप इस समस्या पर विशेषज्ञ राय भी लें कि बिना रिटर्न संशोधित किये कई तरह की समस्याएं हल ही नहीं हो सकती है और ये सभी समस्याएं हल हुए बिना वार्षिक रिटर्न्स भी कर निर्धारण में अधिकारियों की कोई मदद नहीं कर पायेंगे और इसके अभाव में सारे कर निर्धारण नोटिस जारी करने के बाद ही होंगे जो कि जीएसटी के सरलीकरण के सिद्धांत के विरुद्ध होगा.

 इस तरह की तकनीकी त्रुटियों को दूर करने का उद्योग एवं व्यापार को यदि एक मौक़ा दिया जाये तो जीएसटी से सम्बंधित अनेक समस्याएं हल हो सकती है जिनमें कर के तीनो वर्गों में  जैसे SGST, CGST एवं IGST में एक की बिक्री  दूसरे वर्ग में दिखा देना या इनकी ITC एक दूसरे में क्लेम हो जाना लेकिन अब इनका संशोधन नहीं होने से अब व्यापारी वर्ग परेशान हो रहा है जब कि यह कर सरकार को मिल भी चुका है अब इसे फिर से वसूलना और उस पर ब्याज लेना ये केवल तकनीकी खामी के कारण व्यापार को दंड देना ही हुआ जब कि जीएसटी में प्रारम्भ से लेकर आज तक सरकार से भी कई तकनीकी गलतियां हुई है जिसे भी लगातार अधिसूचनाएं एवं परिपत्र जारी कर सुधार करने की कोशिश की गई है तो फिर एक छोटी सी सुविधा व्यापारी वर्ग में देने में कहीं कोई भी  परेशानी नहीं होनी चाहिए. इसे आप व्यापार एवं उद्योग की और से अनुरोध मान कर इस सुविधा देने का कष्ट करें.

2.  सकल कर पर ब्याज लेना अतार्किक और अव्यवहारिक है

सकल कर दायित्व पर ब्याज का भुगतान का मामला  भी व्यापार एवं उद्योग को परेशान कर रहा है . देरी से रिटर्न भरने पर ब्याज तो केवल नगद में जमा कराए जाने वाले बकाया कर ही होना चाहिए ना कि सकल कर पर. स्वयम जीएसटी कौंसिल और सरकार भी इस विचार से सहमत नही है इसीलिये सरकार ने  इस सम्बन्ध में संशोधन प्रस्ताव भी दिया है लेकिन वह भी अभी लंबित ही है और इसे सरकार  शीघ्र ही इसे एक जुलाई 2017 के भूतलक्षी प्रभाव से लागू कर व्यापार एवं उधोग को इस परेशानी से छुटकारा दिलाएं जो कि सरकार के  ही के कानून के अतार्किक प्रावधान के कारण उत्पन्न हुई है. जो राशि सरकार के खजाने में आ चुकी है उस पर ब्याज लगाने का ना तो कोई औचित्य है ना ही कोई व्यवहारिक और आर्थिक तार्किकता  और इस तरह से यह व्यापारिक वर्ग पर एक अनुचित बझ है .

भारत सरकार जीएसटी कानून की धारा 50 (1) में 1 जुलाई 2017 के भूतलक्षी प्रभाव से परिवर्तन कर भारत के उद्योग एवं व्यापार को इस प्रावधान की अतार्किक व्याख्या से होने वाले प्रभाव से बचाए क्यों कि इस तरह के ब्याज का कोई औचित्य व्यवहारिक रूप से नहीं है और कानून में इस तरह से यदि प्रावधान रखा भी गया है तो वह भी गलत ही है अब गलती का सुधार भी सरकार को ही करना चाहिए .

3.  जीएसटी कर अप्रत्यक्ष कर कानून है या लेट फीस वसूली का कानून

जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर कानून है जिसका देश के व्यापार एवं उद्योग को बहुत ही बेसब्री से इन्तजार था लेकिन प्रारम्भ से ही जीएसटी को इस तरह से लगाया गया कि एक बहुत बड़ा सवाल खडा हो गया कि जीएसटी अप्रत्यक्ष कर कानून है या लेट फीस वसूली का कानून है .

देरी से रिटर्न भरने पर व्यापारी वर्ग को भारी लेट फीस का भुगतान करना पडा है जब कि जीएसटी एक नया कानून था और साथ ही कई तकनीकी परेशानियां भी इस कर की प्रक्रियाओं को लेकर थी और सरकार ने भी इस सम्बन्ध में लगातार परिवर्तन किये हैं तो व्यापारी वर्ग से भी देरी होना संभव था . इसके अतिरिक्त जीएसटी नेटवर्क की “क्षमता  और गति” भी देरी के लिए जिम्मेदार थी .

हमारे कानून निर्माता यह ध्यान रखे  कि व्यापारी वर्ग जिसने जीएसटी की सफलता के लिए अथक परिश्रम किया है उनकी लेट फीस लौटाने की व्यवस्था करे  एवं अभी आगे भी  भी जीएसटी की लेट फीस को इस तरह से परिभाषित करें कि वह व्यापारी द्वारा एक कर अवधि में “नगद” में भुगतान किये जाने वाले कर से अधिक कभी भी ना हो. अगर आप शून्य कर देयता वाले रिटर्न पर भी लेट फीस उसी दर से लगाना चाहते हैं कि डीलर्स उसे बर्दाश्त नहीं कर पाए तो आपको फिट इस कानून की और समझदारी से एक बार फिर देखना चाहिए.

जीएसटी कानून भारत में एक सरल अप्रत्यक्ष कर कानून लाने के लिए लाया गया था लेकिन यह एक नया कानून था और गलतियां और देरी भी सभी पक्षों के द्वारा किया जाना स्वाभाविक है अब इसके लिए इस तरह से दंड दिया जाये तो फिर इसे नए कानून को सीखने का समय तो कानन निर्माताओं ने डीलर्स को दिया ही नहीं जो कि एक नए कर के लिए जरुरी था.

4.  बैंक में  भुगतान करते ही सरकार को भुगतान समझें

जीएसटी एक नया कानून है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि इसे बनाते समय कार कानूनों के साथ जुड़े मूल सिद्धांतो को ही भुला दिया जाए जैसा कि जीएसटी में कर के भुगतान को लेकर किया गया है. जीएसटी में कोई भी व्यापारी जिस समय अपने कर का बैंक द्वारा भुगतान कर देता है उसी समय सरकार को यह कर प्राप्त हो जाता है तो फिर जब व्यापारी उसे जिस तिथी को सेट ऑफ करे उस तिथी तक ब्याज लगाने के पीछे भी कोई तर्क नहीं है और इस प्रावधान ने भी व्यापारी वर्ग को बहुत परेशान कर रखा है . इस तरह की “कागजी मांग” खड़ी करना वह भी  इस समय जब कि जीएसटी खुद ही प्रयोगात्मक दौर से गुजर रहा है व्यापारी  वर्ग पर बोझ डालने का कोई तर्क नहीं है .

जो पैसा कर के रूप में सरकार को मिल चुका है उस पर सिर्फ इसलिए ब्याज लगा देना कि उसे सेट ऑफ नहीं किया है ,जो कि एक तकनीकी खामी है, उचित भी नहीं है और व्यवहारिक भी नहीं है .

आयकर कानून में भी जो रकम चालान के द्वारा बैंक में  जमा करा दी जाती है उसी तारीख से ही इसे जमा मान लिया जाता है और इसी तरह से ही जीएसटी में भी बैंक में राशि जमा करा देने से इसे जमा मान लिया जाए. वेट और सर्विसे टैक्स में भी यही होता था तो अब इसे जीएसटी में लागू करने में कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए .

5.जीएसटी नेटवर्क अपना काम समुचित रूप से नहीं कर रहा है और यह सबसे बड़ी समस्या है 

जीएसटी पूर्ण रूप से एक सुचना तकनीक पर आधारित कर है और इसलिए जीएसटी की सफलता पूरी तरह से जीएसटी नेटवर्क और उसके सेवा प्रादाताओं की तकनीकी क्षमता पर आधारित है और जीएसटी का दुर्भाग्य यह रहा है जीएसटी का नेटवर्क जीएसटी लागू होने के बाद कभी भी अच्छी तरह से काम नहीं कर पाया है और जीएसटी की अधिकांश परेशानियों का कारण यही जीएसटी नेटवर्क है जिसकी गति एवं क्षमता को बढ़ाना अति आवशयक है और आप इस नेटवर्क को शीघ्र दुरुस्त करने का कष्ट करें ताकि जीएसटी की प्रक्रियाओं के पालन में व्यापारी वर्ग को परेशानी ना हो. जीएसटीएन एक राष्ट्रीय नेटवर्क है और इसके लगातार असफल होने को अब आंकड़ों से छुपाया नहीं जा सकता है अत: आप जीएसटी नेटवर्क के सेवा प्रदाता को इस बात के लिए बाध्य करे कि जीएसटी नेटवर्क की गति एवं क्षमता इस तरह बढाए कि आने वाले 10 साल तक के बढे हुए काम को यह झेल सके जो कि सुचना प्रोद्योगिकी का एक मूल सिद्धांत होता  है जिसका पालन जीएसटी नेटवर्क की कार्यप्रणाली में नही किया गया है .

जीएसटी नेटवर्क की असफलता के लिए बार –बार यह प्रयास किये गए हैं कि इसके लिए डीलर्स और प्रोफेशनल्स को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए या उन्हें यह कहा जाए कि वे आखिरी दिनों में रिटर्न क्यों भरते हैं और यह कोई इस समस्या का कोई व्यवहारिक हल नहीं है और इसके लिए आपको जीएसटी नेटवर्क को मजबूत करना होगा ताकि डीलर्स इसका उपयोग करते हुए जीएसटी की प्रक्रियाओं का निर्बाध तरीके से पालन कर सके. जीएसटी नेटवर्क एक सुविधा होना चाहिए जब कि यह एक असुविधा में परवर्तित हो चुका है जिसमें शीघ्र सुधार की आवश्यकता है और यदि वर्तमान में जो जीएसटीएन सेवा प्रदाता है उनके द्वारा यह सम्भव नहीं है तो सरकार  उन्हें दूसरे सेवा प्रदाता से बदल दें जो कि खराब सेवा देने पर इस तरह सेवा प्रदाता बदल देने का व्यवहारिक नियम है और सरकार  भी उसका जनहित में पालन करें ताकि लम्बे समय से चल रही यह समस्या हल हो .

जीएसटी नेटवर्क में खामियां है और यहाँ विशेष बात यह है कि इसके लिए जिम्मेदार पक्ष इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है और इसी कारण से कोई सुधार नहीं हो रहा है . सबसे पहले जरुरी है कि जिम्मेदार पक्ष जीएसटी नेटवर्क की कमियाँ स्वीकार करे तभी इसमें सुधार होगा और यह सुधार सबसे ज्यादा जरुरी है क्यों कि जीएसटी नेटवर्क ठीक प्रकार से कार्य करे ये जीएसटी की सफलता के लिए जरुरी है .

6.  इनपुट क्रेडिट के मिस्मेच की समस्या

खरीद के मिस्मेच पर समस्या वेट में भी थी और जीएसटी में भी वही हाल है और वेट की तरह जीएसटी में खरीद पर इनपुट क्रेडिट का मिस्मेच भी एक बड़ी समस्या है और जिस तरह से अब कानून बनाया गया है वह इस समस्या को और भी गंभीर बनाता है. जीएसटी खरीद की इनपुट क्रेडिट के मिस्मेच को दूर करने के लिए तीन से छह महीने का समय दिया जाए   और इसके अतिरिक्त खरीददार को इस प्रकार का दंड देने के जगह उस बेचने वाले डीलर को दण्डित किया जाए  जो कर खरीददार से लेकर जमा नहीं करवा रहे हैं . 

जिन डीलर्स ने माल बेचा है उन्हें भी रजिस्ट्रेशन भारत सरकार ने ही दिया है आर अब वह कर जमा नहीं कराता है या देरी से जमा कराता है , जिसके कई कारण हो सकते हैं , के लिए खरीददार को जिम्मेदार ठहराना कोई न्याय नहीं है . यह कहना कि “आप अपना विक्रेता समझदारी से चुने” बहुत ही आसान आधिकारिक बयान हो सकता है पर यह कोई मिस्मेच की समस्या का हल नहीं है .

डीलर्स को अपने विक्रेताओं  के द्वारा कर जमा नहीं करवाने के कारण मालुम करना , उन्हें दूर करना और विक्रेताओं से कर जमा करवाना इसके लिए समय चाहिए और आपसे अनुरोध है कि इसके लिए 3 से 6 माह का समय देने का कष्ट करें और खरीददार की भी समस्या समझने का प्रयास करें और इसे हल करें . जल्दबाजी में खरीददार की इनपुट क्रेडिट रोक देना व्यापार एवं उद्योग के लिए कार्यशील पूंजी की समस्या खड़ी कर देगी और व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा.

यह समय जीएसटी को लेकर समस्याएं हल करने का है ना कि उनकी समस्याएं बढाने का लेकिन इस समय जारी की गई नई प्रक्रियाएं मुश्किलें हल करने की जगह समस्याएं बढ़ा ही रही है .

क्या जीएसटी में कोई ऐसा हल नहीं हो सकता कि खरीददार जिसने ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए कर अपने विक्रेता को दिया है उसके अधिकारों की भी रक्षा की जाए . खरीददार से कर फिर से वसूल लेना तो सबसे आसान तरीका है लेकिन यह किसी भी तरीके से न्यायसंगत नहीं है और इसका हल भी हमारे कानून निर्माताओं को निकालना चाहिए.

7.  RCM के अव्यवहारिक प्रावधान को हटायें

जीएसटी भारत के अप्रत्यक्ष कर को आसान बनाने , कर राजस्व में वृद्धी करने एवं प्रक्रियाओं को कम एवं सरल बनाने के लिए लाया गया था और ऐसा ही उस समय प्रचारित किया गया था . लेकिन जीएसटी में  अपंजीकृत व्यापारी से खरीद पर लगाया गया RCM एक नई और अव्यवहारिक प्रक्रिया थी  और यह RCM जो कि  अपंजीकृत व्यापारी से खरीद पर 1 जुलाई 2017 को लगाया गया था और इस  RCM को दिनांक 13 अक्तूबर 2017 को हटा लिया गया था लेकिन इस अव्यवहारिक कानून को लेकर परेशानी 1 जुलाई 2017 से ही थी इसलिए इस प्रावधान को इसी तारीख से हटाना ही उचित रहता जो कि नहीं किया गया है और इस गफलत में यह प्रावधान 1 जुलाई 2017 से 12 अक्तूबर 2017 तक लगा रह गया  इस कारण से कई किस्म की परेशानियों का सामना व्यापारी वर्ग को करना पड़ रहा है अत; सरकार इस अव्यवहारिक प्रावधान  पर ध्यान दें कि किस उपाय से व्यापारी वर्ग को इस परेशानी से छुटकारा मिल सके.

जो प्रावधान 13 अक्तूबर 2017 को अव्यवहारिक था वह 1 जुलाई 2017 को व्यवहारिक कैसे हो सकता है इसके अतिरिक्त यदि इसे  1 जुलाई 2017 से हटा लिया जाता तो सरकार के राजस्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और व्यापारी वर्ग को भी कोई इस परेशानी से मुक्ति मिल जाती जिससे कि इस समय वे परेशान है .

जीएसटी में पूरे ही RCM के प्रावधान को लेकर  एक और पक्ष  है और वह यह है  कि अधिकाँश मामलों में व्यापारी वर्ग पर लगे इस अव्यवहारिक प्रावधान से सरकार को राजस्व के रूप में कुछ नहीं मिलता है सिर्फ व्यापारी वर्ग को अतिरिक्त प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है जो कि सरलीकरण के नाम पर लाये गए जीएसटी के मुख्य उद्देश्यों से मेल नहीं खाता है . अत; सरकार  इस प्रावधान को वापिस लेने का कष्ट करें जहाँ इसका कोई वित्तीय प्रभाव नहीं है और व्यापारी वर्ग भी इस पूरी ही  अनचाही प्रक्रिया से मुक्त हो जाएगा.

8. इनपुट क्रेडिट को लेने का निर्धारित  समय समाप्त होने की स्तिथी

जीएसटी कानून के तहत जीएसटी इनपुट क्रेडिट लेने की भी एक निर्धारित अवधि थी और यह अवधि बीतने के बाद यह क्रेडिट नहीं ली जा सकती है और यदि किसी डीलर ने ले ली है तो उसे निरस्त कर वह राशि ब्याज के साथ वसूली जाती है और यहाँ आप ध्यान रखें कि इस सबंध में विभाग के द्वारा एक वसूली अभियान चलाने की भी खबरे चल रही है . यहाँ ध्यान दें यह वह रकम है जो विक्रेता द्वारा खरीददार से वसूल कर सरकार को जमा करा दी है लेकिन क्रेता इसे समय पर इसे अपने रिटर्न में ले नहीं पाया लेकिन यह कर सरकार को वसूल हो चुका है . अब सरकार इसकी क्रेडिट को निरस्त कर इसे फिर से वसूल करती है तो यह एक ही कर की दोहरी वसूली होगी जो कि किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है.

जीएसटी कानून की धारा 16(4) के अनुसार किसी एक निर्धारण वर्ष में मिलने वाली इनपुट क्रेडिट एक निर्धारित समय में नहीं ली जाए तो वह समाप्त हो जाती है और इस तरह से व्यापारी वर्ग को उस कर की आर्थिक हानि उठानी पड़ती है जिसका भुगतान वह अपने विक्रेता को दे चुका है और जो सरकार के खजाने में भी जमा हो चुका है .

एक बार फिर से यदि हम इस बात पर ध्यान दें  कि जीएसटी एक  नया कानून होने के कारण तकनीकी गलतियां डीलर्स से हुई है इसलिए सरकार प्रारम्भिक दो वर्षों में इस धारा 16(4) के प्रावधानों से छूट देकर उन्हें यह क्रेडिट देने का कष्ट करें क्यों कि यह पैसा सरकार के खजाने में तो आ ही चुका होता है और अब इस समय डीलर्स से इसे फिर से वसूल करना एक तरह से ह दोहरा कर ही होगा .

9.  2018-19 वार्षिक रिटर्न

 जीएसटी के 2018-19 के वार्षिक रिटर्न अभी तक भी पूरी तरह से  जीएसटी नेटवर्क पर उपलब्ध नहीं हैं और अभी भी इसके बहुत से जरुरी हिस्से काम नहीं कर रहे है जैसे GSTR-2A से आने वाले आंकड़े इस फॉर्म में नहीं आ रहे हैं  इसकी अंतिम तिथी अब सिर्फ अगले ही महीने है इसलिए हमारे कानून निर्माता इस रिटर्न को शीघ्र ही जीएसटी नेटवर्क पर पूरे तरह से  लगवाने का कष्ट करें और चूँकि अभी तक यह रिटर्न नेटवर्क पर व्यवहारिक रुप से  उपलब्ध नहीं है इसलिए आपसे निवेदन है कि 2018-19 के वार्षिक रिटर्न की तिथी 30 जून 2020 करने का कष्ट करें और इसके साथ ही रिटर्न इत्यादि के मामले में  जीएसटी नेटवर्क को नियमित करने का कष्ट करें.जीएसटी का 2017-18 का वार्षिक रिटर्न भी कई घटनाओं और साकार के बार-बार किये गए स्थगनों के बाद भरा गया और इस समय ऐसा लगता है कि 2018-19 में भी कोई बहत अच्छी स्तिथी नहीं है . इस समय आज अर्थात 26 फरवरी 2020 को यह फॉर्म जीएसटी साईट पर लगा हुआ तो है लेकिन यह पूरी तरह से एक्टिव नहीं है और भरा नहीं जा सकता है और सुचना तकनीक में उन्नत हमारे देश  भारत वर्ष के लिए यह कोई गर्व की बात नहीं है.

2017-18 के वार्षिक रिटर्न के लिए 5 बार तारीख बढ़ायी गई थी लेकिन इनमें से एक बार भी यह तारीख व्यापार एवं उद्योग की मांग पर नहीं बढाई गई थी , हर बार यह तारीख जीएसटीएन की तकनीकी खामियों और फॉर्म एवं उसकी सुविधा उपलब्ध नहीं करवाने के कारण हुआ था और इस बार भी यही स्तिथी है अत: हमारी सलाह यह है कि आप 2018-19 की तारीख को आप 30 जून 2020 अभी से कर दें ताकि इस सम्बन्ध में कोई असमंजस और भ्रम नहीं रहे .

आप पहले इस वार्षिक रिटर्न का फॉर्म और उसकी सुविधा जीएसटी नेटवर्क पर जारी करें और इसके बाद व्यापार एवं उद्योग को 90 दिन का समय दें ताकि वे इस रिटर्न को आसानी से समझ बूझ कर भर सकें .

इसके अतिरिक्त जीएसटी के वार्षिक रिटर्न में एक और सुविधा जोड़ी जानी चाहिए कि डीलर ने अपनी इनपुट क्रेडिट किस तरह से और कब ली है एवं इसके  अतिरिक्त अपना कर किस प्रकार से गणना की है और इसे किस प्रकार से चुकाया है इसका कोई स्पष्टीकरण देना चाहे तो दे सके क्यों कि जिस प्रकार से रिटर्न बनाए और भरे गए है कि उनसे अधिकांश मामलों में कर निर्धारण नहीं किया जा सकेगा और जितने ज्यादा नोटिस जारी  होंगे उतना ही जीएसटी का स्वरुप विकृत होता जाएगा.

10.जीएसटी सरलीकरण कब होगा ?

जीएसटी की प्रक्रियाएं बहुत ही मुश्किल है इन्हें आसान किये बिना जीएसटी की सफलता को पाना काफी मुश्किल है अत: अब  सरलीकरण की प्रक्रिया शीघ्र ही प्रारम्भ करने का कष्ट करेंजीएसटी भारत में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल बनाने के लिए लाया गया एक बहुत ही महत्वकांक्षी और साहसिक कदम था लेकिन इस समय जो जीएसटी की स्तिथी चल रही है उससे ऐसा लगता है कि जीएसटी का यह मुख्य उद्देश्य काफी पीछे चला गया है या यों कहे कि अदृश्य ही हो गया है और इस समय जिस तरह से जीएसटी की प्रावधानों को व्यापार एवं उद्योग के विरुद्ध काम में लिया गया है उससे लगता है कि अब सरलीकरण के सिद्दांत को पूरी तरह से छोड़ दिया गया है अब कानून निर्माता  प्रक्रियाओं को आसान बनाये और अव्यवहारिक प्रावधानों को हटाने का कार्य अब शुरू कर दें तो देश के व्यापार , उद्योग एवं अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छा वातावरण तैयार होगा जिसका वादा जीएसटी लाते समय किया गया था.

भारत की अर्थव्यवस्था बिना लघु और मध्यम उद्योग और व्यापार के नहीं चल सकती है इसलिए चूँकि यह वर्ग इस समय जीएसटी के कारण संकट में है अत; अब सरकार जीएसटी से  जुडी  समस्याओं का निवारण करें और इस और भी ध्यान दें कि इस वर्ग को लगातार जीएसटी नोटिस मिल रहे हैं जो कि इनकी मुश्किलें और भी बढ़ा रहे हैं अत: हमारे  कानून निर्माता  इस बात की जाँच करवाएं और  तकनीकी कारणों से जारी नोटिसों की संख्या कम करवाएं और यदि इस गति से नोटिस जारी हो रहें है सरकार  यह मान लें कि व्यापारी बहुत अधिक संख्या में इस  इस कानून का पालन नहीं कर पा रहें हैं और कानून में जो अव्यहारिक प्रावधान है उन्हें सरकार  हटाने का कष्ट करें क्यों कि यह तो हम सभी , जिसमें कानून निर्माता भी शामिल है , मानेंगे कि इतनी बड़ी सख्यां में यदि गलतियां हो रही है तो फिर खामी कानून में ही है  और इसें सुधार की अतिशीघ्र आवश्यकता है .

जिस संख्या में जीएसटी नोटिस जारी हो रहें हैं उसी से हमारे कानून निर्माता यह  मान लें  कि प्रक्रियाएं बहुत अधिक  कठिन है और इनका पालन करने में कई तकनीकी गलतियां हुई है अब उन गलतियों को सुधरने का मौक़ा दिया जाना चाहिए  तभी यह कर सफलता पूर्वक लागू हो सकेगा वरना उलझने सुलझनें की जगह और भी उलझती चली जायेगी और इस प्रकार जीएसटी डीलर्स के बहुत सारे मामलें अदालतों में भी जायेंगे जो कि किसी भी सरल कर प्रणाली के लिए उचित बात नहीं है.

सरलीकरण जीएसटी का उद्देश्य था और जीएसटी लाया ही इसीलिये गया था लेकिन अब सवाल उठना शुरू हो गया है कि जीएसटी सरलीकरण कब शुरू होगा और कानून निर्माताओं को अब यह अभियान शीघ्र ही प्रारम्भ करे जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए तो जरुरी है और इसके साथ ही जीएसटी के सफल अस्तित्व के लिए भी यह अत्यंत आवशयक है .

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5 Comments

  1. Rajesh says:

    सर पार्टी का gst नम्बर डालना भूल गया अब कुछ हो सकता है kya

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