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मोदी सरकार की मानें तो बैंक वसूली एवं एनपीए घटाने की दिशा में सबसे प्रभावी और क्रांतिकारी कानून वर्ष २०१६ में दिवालिया कोड के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके लाने के बाद यह माना गया कि न केवल पैसे की वसूली जल्द होगी साथ ही कंपनी और उसके व्यापार को बचाने में मदद मिलेगी। विवादों की स्थिति कम होगी और न्यायपालिका पर बोझ घटेगा। लेकिन यदि वस्तुस्थिति देखें २०१६ से २०२५- पिछले ९ वर्षों की तो आप पाएंगे:

 १.  दिवालिया कोड में समाधान प्रस्तावित १ वर्ष में होने की बजाय ३-४ वर्ष लग रहें हैं।

2. आधे से ज्यादा केस परिसमापन बिक्री में चले जाते हैं।

3. पैसे की वसूली मात्र ३०% ही हो पा रही है और बेकार प्रबंधन को क्लीन चिट मिल जाती है।

4. सबसे मजेदार बात यह है कि देरी का कारण सरकार विभागों द्वारा विवाद उत्पन्न किया जाना है, खासकर तब जब इसे कोड का नाम इसलिए दिया गया की यह कानून सबके ऊपर होगा।

5. ज्यादातर सरकारी विभाग खासकर कर्मचारी प्राविडेंट फंड विभाग सोता रहता है और इंतजार करता है कि कब दिवालिया प्रक्रिया पूर्ण होने वाली है – तब जागते हैं और विवाद न्यायालय में लगाकर प्रक्रिया को उलझाते है।

6. प्रबंधन द्वारा मदद और रिकॉर्ड न मिलना, साथ ही कोई प्रशासनिक मदद न मिलना।

7. फर्जी क्लेम आना और कंपनी की परिसंपत्तियों का इस कोड में आने से पहले खत्म हो जाना

8. न्यायिक प्रक्रिया में पेशी पर पेशी और केसों का अंबार होना

9. दिवालिया प्रक्रिया को करने के लिए प्रोफेशनल को फंड न देना एवं पेटीशनर की उदासीनता

10. बैंकों द्वारा दिवालिया कोड का इस्तेमाल मात्र केस लगाने के लिए एवं दबाव डालने के लिए होता है न की इस प्रक्रिया को अपनाने के लिए

11. बैंकों का आज भी पूरा जोर बाहरी सैटलमेंट प्रक्रिया पर होता है

12. कोड इन तथ्यों को नहीं समझ पाता की व्यापार में कई तरह के लेन देन होते हैं और इन सबका समाधान मात्र समय सीमा या पैसे वसूली से नहीं किया जा सकता। कई तरह के एग्रीमेंट व्यापार में किए जाते हैं और इन सबको मात्र कोड के अंतर्गत लाने से खत्म नहीं किया जा सकता। इससे विवादों का बढ़ना स्वाभाविक है।

अब जरूरत थी कि कोड को एक व्यवहारिक स्वरूप दिया जावें जिसमें कोई भी प्रोफेशनल एजेंसी या प्रोफेशनल व्यापार को नहीं चला सकता। होना यह चाहिए था कि:

 1. प्रोफेशनल एजेंसी या प्रोफेशनल मात्र यह तय करेगा कि किसका क्लेम कितना सही है या ग़लत

2. कंपनी प्रबंधन द्वारा व्यापार गलत ढंग से चलाया गया या स्थितियों के व्यापार गड़बड़ हुआ।

3. कंपनी की परिसंपत्तियों की यथास्थिति और उचित मूल्य क्या है

4. प्रोफेशनल को मात्र यह रिपोर्ट १८० दिवस के भीतर आईबीबीआई और एनसीएलटी को सोंप कर एप्रूवल के लिए देना होगा।

5. एप्रूवल के बाद उधारीकर्ता और कंपनी प्रबंधन एनसीएलटी के मार्गदर्शन में सैटलमेंट तय करेगा।

6.व्यापार की बागडोर हर हालत में और हर वक्त कंपनी प्रबंधन के पास ही रहेगी।

7. प्रोफेशनल का काम सिर्फ यथास्थिति की रिपोर्टिंग तक सीमित होना चाहिए क्योंकि उसे किसी से कोई भी सहायता नहीं मिलती और अनावश्यक विवादों की स्थिति बनती है जो सालों न्यायालय में विचाराधीन रहते हैं।

 हालांकि सरकार ने लोकसभा ने मार्च 2026 में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 पारित किया, जिसमें प्रमुख बदलाव:

१. त्वरित स्वीकृति (14 दिन): कंपनी के डिफॉल्ट (कर्ज न चुकाना) साबित होने के बाद, इनसॉल्वेंसी की अर्जी को अनिवार्य रूप से 14 दिनों के भीतर स्वीकार करना होगा।

2. मजदूरों/कर्मचारियों को प्राथमिकता: दिवालिया कंपनियों की नीलामी में अब मजदूरों के बकाया वेतन और दावों को पहले निपटाने पर जोर दिया गया है।

3. सख्त प्रक्रिया और दंड: प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए दंड का प्रावधान है, ताकि जानबूझकर मामलों को न लटकाया जा सके।

4. क्रीर्यान्वयन में तेजी: यह संशोधन दिवाला समाधान में होने वाली व्यापक मुकदमेबाजी को कम करने और बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति में सुधार करने के लिए लाया गया है।

5. प्रक्रिया में बदलाव: दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 के तहत, अब रेजोल्यूशन प्रोफेशनल के साथ-साथ लेनदार उधारीकर्ता भी संदिग्ध लेनदेन के लिए आवेदन कर सकते हैं।

6. समूह और सीमा-पार दिवाला: 2025 के संशोधनों में समूह और सीमा-पार दिवाला समाधान ढांचे के प्रावधान भी शामिल हैं।

इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य 2016 के कानून को अधिक प्रभावी बनाना और बैंकों के फँसे हुए पैसे को तेजी से वापस पाना है, लेकिन कानून सही मायनों में तभी प्रभावी होगा जब इसमें इन दो बिन्दुओं को शामिल किया जावेगा:

 १. प्रोफेशनल की नियुक्ति सिर्फ कंपनी की यथास्थिति की रिपोर्टिंग तक सीमित होगी, व्यापार का पूरा दारोमदार प्रबंधन का ही होगा जिससे परिसंपत्तियों का कंट्रोल प्रबंधन के पास ही होगा एवं न्यायिक प्रक्रिया उसकी उपस्थिति ही अनिवार्य होगी।

2. दूसरा बिंदु – कानून में यह साफ लिखना होगा की कोई भी सरकारी विभाग अपना क्लेम कोड की समय-सीमा के अंतर्गत ही मान्य होगा जिसमें कर्मचारी विभाग भी शामिल होगा। समय सीमा के बाहर किए क्लेम और केस का कोई स्टेन्ड नहीं होगा।

 संशोधनों में उपरोक्त दो बिन्दुओं को शामिल किए बिना विवाद और बढ़ेंगे, प्रक्रिया में देरी होगी, पैसे की वसूली कम होगी और यह कोड फिर अप्रभावी रह जाएगा।

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सीए अनिल अग्रवाल इंसोलवेंसी प्रोफेशनल जबलपुर ९८२६१४४९६५

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