CA Ajay Sharma

CA Ajay Sharma

सुधीर हालाखंडी के जीएसटी लेखन, उनके कार्टून और जीएसटी से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा.

आइये बातचीत करें- लेखक, लेखन, कार्टून और जीएसटी के बारे में

सी ए अजय शर्मा :- सुधीर सर , आपका इस बातचीत में आपका स्वागत है . आइये सबसे पहले बात करें कोरोना लॉकडाउन के दौरान आपका समय कैसे निकल रहा है . आप अपनी गतिविशियों में लगातार व्यस्त रहते हैं तो इस समय थोड़ी परेशानी तो हो रही होगी . इस समय लेखन और कार्टून कैसे चल रहें हैं . वैसे आज लगभग 45 दिन हो गये हैं…

सुधीर हालाखंडी : देखिये , हमारे पास विकल्प क्या है ? इस बीमारी में बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है और यही हमारी सरकार भी कह रही है तो हमें घर पर तो रहना ही होगा. हमें स्वस्थ और सुरक्षित रहना है तो फिर हमें वह सभी नियम मानने होंगे जो कि हमारी सरकार के द्वारा बताये गए हैं. यही हमारा कर्तव्य भी है अपने प्रति और अपने लोगों के प्रति .

देखिये जब लॉक डाउन प्रारम्भ हुआ तब से तीन दिन तक तो मैंने पूरा आराम किया और इसका एक कारण था कि मैं तीस साल से एक ही रूटीन पर चल रहा था तो मुझे लगा कि यह एक आराम का सही समय है लेकिन चौथे दिन से मुझे कुछ परेशानी शुरू हो गई. ये मान कर चलिए कि चौथा दिन मेरे लिए बहत मुश्किल था इसीलिये 5 वें दिन से ही मैंने अपना पढने लिखने का कार्यक्रम तय कर दिया और अब तक जो जीएसटी इंटरव्यू मैंने लिए है वह भी इसी कड़ी का हिस्सा है और आज यह जिम्मेदारी आपको दी गई है . इसके अलवा मैंने कुछ लेख भी लिखें है और एक बार जब पढने और लिखने का काम शूरू हो गया फिर कोई ज्यादा मुश्किल नही रही… हाँ इस समय पता नहीं क्यों मेरा कार्टून बनाने का मन नहीं करता है … आज 45 दिन से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन मैंने एक भी कार्टून नही बनाया है … देखें आगे क्या होता है .

अजय शर्मा : सुधीर सर , आप जीएसटी विषय पर एक जाने माने लेखक है .आपका लेखन कार्य कब से प्रारम्भ हुआ और क्या आप सिर्फ जीएसटी पर ही लिखते हैं ? इस समय तो आपके लेख शायद सिर्फ जीएसटी से ही जुड़े हैं.

सुधीर हालाखंडी : देखिये , मैंने कर मामलों पर सन 2000 से लिखना शुरू किया था और मैंने ICAI के जर्नल के लिए पहला लेख 2003 में लिखा था और अब तक मैं लगभग 500 से अधिक लेख कई प्रकाशकों , अखबारों और वेबसाइट्स के लिए लिख चुका हूँ. जीएसटी के अतिरिक्त मेरा लेखन मुख्य रूप से वेट, आयकर , सेवा कर पर भी था .

जहां तक मुझे याद है मैंने सबसे पहले लिखना जो शुरू किया वह आयकर पर था और एक समय ऐसा था जब मैं भारत के आम बजट पर एक साथ कई मुख्य प्रकाशकों के लिए लिखता था . इसलिए मेरा लेखन सिर्फ अप्रत्यक्ष कर पर ही नहीं था लेकिन अब इस समय आप कह सकते हैं कि इस समय मैं सिर्फ जीएसटी पर ही लिख रहा हूँ .

मैंने ICAI के जरनल के लिए अब तक कुल 5 लेख लिखें है उनमें से एक केन्द्रीय बिक्री कर पर, एक आयकर पर , दो सेवा कर पर और एक जीएसटी पर. प्रत्यक्ष करों पर भी मैंने काफी लिखा है. जब टैक्स ऑडिट रिपोर्ट ऑनलाइन फाइल करने का प्रावधान जब पहली बार आया था तब मैंने अपनी पहली ऑडिट रिपोर्ट अपलोड करने के अनुभव एक टैक्स वेबसाईट पर लिखे थे जो कि उस समय काफी लोकप्रिय हुए थे.

goods and services tax (GST) written in a note

अजय शर्मा : तब फिर आपके लेखन में जीएसटी का प्रवेश कैसे हुआ? आपके जीएसटी लेखन की सुरुआत कैसे हुई ?

सुधीर हालाखंडी : सन 2006 में जीएसटी को पढ़ना प्रारम्भ किया था और यह सच है कि उस समय इस विषय पर बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी.

मैंने मेरा पहला जीएसटी पर एक विस्तृत लेख 2006 में लिखा था जो कि ICAI के CA जर्नल के अप्रैल 2017 अंक में प्रकाशित हुआ था तब से अभी तक जीएसटी पर पढ़ाई और लेखन जारी है . जब भी मैं कहीं लिखता हूँ कि मैंने जीएसटी पर 2007 में लिखा तो जो नए पाठक होते हैं वे मुझे मेसेज भेजते हैं कि इसे ठीक कर 2017 कर लूँ क्यों कि जीएसटी 2017 में लगा था ……. लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ मेरे लिए वास्तव में यह 2007 ही था .

अजय शर्मा: सुधीर सर, आपका लेखन हिदी बेल्ट में बहुत अधिक लोकप्रिय है और आपने एक हिदी में भी जीएसटी पर एक पुस्तक लिखी थी जिसने आपको काफी लोकप्रियता दिलवाई थी तो आपका यह हिंदी लेखन किस प्रकार प्रारम्भ हुआ ? व्यवसायिक लेखन जब आप करते थे वह तो लगभग सारा ही अंग्रेजी में था.

सुधीर हालाखंडी : मैंने वर्ष 2016 में जीएसटी पर हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया और उस समय यह मेरा एक नया प्रयोग ही था लेकिन 2017 के मध्य में मेरा यह लेखन करदाताओं और व्यापारी वर्ग में , ख़ास तौर पर, हिन्दी बेल्ट में काफी लोकप्रिय हो गया था इसलिए फिर मैंने इसको आगे भी जारी रखा और अभी भी यह चल रहा है . एक बात और है कि जीएसटी एक नया टैक्स था इसलिए हिन्दी में पाठकों की संख्या उस समय तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक थी और मेरा हिन्दी में लिखा सभी को सहज रुप में उपलब्ध था .

हाँ मैं जिस समय कुछ बड़े प्रकाशकों के लिए लिख रहा था उस समय में अंग्रेजी में ही लिखा करता था क्यों कि हिन्दी में कर मामलों में व्यवसायिक पत्रिकाएँ या तो थी ही नहीं या बहुत कम थी . एक बात और कर मामलों पर हिन्दी में लेखन का प्रचलन भी बहुत कम था इसलिए यह एक नया प्रयोग था जो आश्चर्य जनक रूप से काफी सफल रहा और ध्यान रखें कि हिंदी में लिखने वाले भी बहुत ही कम थे.

इसलिए मैंने जब जीएसटी पर हिंदी में लिखने की योजना बनाई तो मैंने इसके लिए किसी प्रकाशक का सहारा लेने की जगह सोशल मीडिया का सहारा लिया .

अजय शर्मा : सधीर सर , आपने सोशल मीडिया के सभी मंचों को बहुत ही अच्छी तरह से काम में लिया ….. चाहे वो व्हाट्स एप्प हो, ट्विटर हो, फेस बुक हो, टेलीग्राम या यू ट्यूब हो……

सुधीर हालाखंडी : धन्यवाद ! आपने मेरे प्रयास की सराहना की .. यही मेरे लिए प्रेरणा है . हां मेरा यह प्रयास काफी सफल भी रहा और हिन्दी भाषी करदाताओं के लिए काफी उपयोगी भी रहा .

अजय शर्मा : जी सर. हिंदी में करों से सम्बंधित लेखन बहुत ही सीमित है और इस सम्बन्ध में आपका कार्य बहुत ही सराहनीय है … आपके इसी हिंदी लेखन के कारण कर दाताओं ने , विशेष रूप से हिन्दी बेल्ट के करदाताओं ने जीएसटी को समझना शुरू किया …. पहली बार शायद ऐसा हुआ कि करदाताओं ने एक नए कर के बारे में खुद पढ़ना प्रारम्भ किया .. ये कार्य आपने व्यापार और उद्योग के लिए बहुत ही अच्छा किया सर…..

सुधीर हालाखंडी : धन्यवाद ! व्यापार और उद्योग ने भी मेरे इस प्रयास को काफी सराहा .. एक बात और भी थी कि यह लेखन बहुत ही आसानी से सोशल मीडिया के हर माध्यम पर बहुत ही सहजता से उपलब्ध था और इसके एक पाठक से दूसरे तक पहुँचने की गति बहुत तेज थी इसलिए इसकी पाठक संख्या निरंतर बढ़ती गई .

व्यापार और उद्योग ने भी इस लेखन के महत्त्व को काफी पहचाना और इसकी उपयोगिता को स्वीकार किया … उन्होंने मेरे प्रयासों की निरंतर सराहना की .. जिससे मुझे हमेशा प्रेरणा ही मिली . वर्ष 2017 में ही उन्होंने मुझे तालकटोरा स्टेडियम नई दिल्ली में अपने अखिल भारतीय व्यापरिक सम्मलेन में जीएसटी पर मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया था जिसमें उस समय के भारत के गृह मंत्री मुख्य अतिथी के रुप में आमंत्रित थे.

अजय शर्मा :- लॉक डाउन के दौरान जो आपने जीएसटी विशेषज्ञों के इंटरव्यू लिए हैं उसके पीछे आपकी प्रेरणा क्या थी और आपको यह महारत कैसे हासिल हुई कि आप जिन विशेषज्ञों से मिले ही नहीं उनसे आप साक्षात्कार लें. कोई आपका पिछला अनुभव भी है ?

सुधीर हालाखंडी : देखिये इसमें महारत जैसी कोई बात नहीं है ये जो जीएसटी विशेषज्ञ हैं इन्होने भारत में जीएसटी से सम्बंधित ज्ञान का प्रसार करने में बहुत ही सराहनीय प्रयास किये हैं और आपको पता है मैं भी कुछ् कुछ ऐसा ही प्रयास कर रहा था और इन सभी के प्रयासों से मैं काफी समय से परिचित भी हूँ . ये सभी जिनके मैंने इंटरव्यू लिए हैं और इसने अतिरिक्त भी वे जो मेरे इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए , इन सभी का भारत में जीएसटी के ज्ञान के प्रसार में काफी योगदान रहा है. मैं स्वयं इनके बारे में जानना चाहता था और ये सबसे उपयुक्त समय था कि ये सभी अपना समय भी दे सकते थे . इसीलिये इस समय इन इंटरव्यू को लेने का सिलसिला शुरू हुआ . इस समय जो विकसित सूचना तकनीक हमारे देश में सहज ही उपलब्ध है उसमें इस तरह की बातचीत के लिए आपस में मिलना कहाँ जरुरी है !!!

ये इंटरव्यू लेने की कला मैंने कैसे विकसित की … तो यह एक पुरानी कहानी है जब मैंने नई दिल्ली के एक बड़े कर सम्बन्धी प्रकाशक, जिनका मैं निरंतर लेखक था , के लिए ICAI के प्रेसिडेंट का इंटरव्यू लिया था यह शायद 2009 की बात थी और यह सिलसिला 2011 या 2012 तक चला था लेकिन बाद में मैंने व्यवसायिक लेखन से अपने आपको अलग कर लिया और यह श्रंखला वहीं बंद हो गई … यह उनकी एक मुख्य पत्रिका थी और जिसका मुख पृष्ठ आप मान लीजिये “स्टार एंड स्टाइल” या “स्टारडस्ट” जैसे पत्रिकाओं की तरह चमकदार होता था जिसके पूरे मुख पृष्ट पर ICAI के प्रेसिडेंट का फोटो हुआ करता था . तीन या चार इंटरव्यू के बाद एक बार ये सिलसिला बंद हुआ तो फिर शायद वापिस शुरू ही नहीं हुआ…

अजय शर्मा :- सुधीर जी , आपने अभी बताया कि आपने जीएसटी पर पहला लेख वर्ष 2006-07 में लिखा था तो यह बाताइये कि उस समय आपके पास जीएसटी की जानकारी के स्त्रोत क्या थे ? एक और बात आपको कैसा महसूस होता है जब लोग आपके लिखे जीएसटी पर एक लेख को भारत में इस सम्बन्ध में लिखा हुआ पहला लेख कहते हैं तब क्या आपको गर्व महसूस होता है ?

सुधीर हालाखंडी : 2006 का जो आम बजट था उसमें उस समय के जो वित्त मंत्री थे उन्होंने कुछ लाइनों में जीएसटी का जिक्र किया था और यह एक संकेत था आने वाले वर्षों में भारत में कभी ना कभी भारतवर्ष में जीएसटी लागू होगा. आइये मैं उस समय के वित्तमंत्री महोदय के बजट भाषण के वे अंश जो जीएसटी से सम्बंधित थे दिखाता हूँ :-

It is my sense that there is a large consensus that the country should move towards a national level Goods and Services Tax (GST) that should be shared between the Centre and the States. I propose that we set April 1, 2010 as the date for introducing GST. World over, goods and services attract the same rate of tax. That is the foundation of a GST. People must get used to the idea of a GST.

इसके बाद मैंने इन्टरनेट पर जीएसटी की खोज करना और पढ़ना शुरू किया और उस संमय मैंने जो पढ़ा वह यह था कि यह एक केन्द्रीयकृत कर होगा जिसके तहत केवल केंद्र ही कर एकत्र करेंगा और उसे राज्यों में बांटेगा .

लेकिन आप जानते ही हैं कि भारत में जो शासन प्रणाली है वह एक संघीय शासन प्रणाली है और उसके अनुसार केंद्र और राज्य दोनों को ही कर लगाने का अधिकार प्राप्त है इसलिए केन्द्रीय रूप से जीएसटी लगाने का प्रस्ताव राज्यों ने उसी समय खारिज कर दिया था और समझौते के तौर पर एक दोहरे जीएसटी पर विचार किया गया जिसमें माल और सेवा की सप्लाई के एक ही व्यवहार पर राज्य और केंद्र दोनों कर लगायेंगे और अंत में यही जीएसटी भारत में लागू हुआ जिसे आज आप देख रहें है .

जीएसटी पर मेरी पढ़ाई और जानकारी का एक और पक्ष था और वह था कि मैंने वर्ष 2003 से वेट को पढ़ना शुरू कर दिया था और वर्ष 2006 में मैंने जब भारत के अधिकाँश राज्यों में वेट लागू हुआ था तब मैंने दिल्ली के एक प्रकाशक के लिए वेट पर 6 राज्यों के वेट कानून का अध्ययन कर लेख लिखे थे और मेरे विचार से जीएसटी वेट का ही अगला रूप था इसलिए मेरी यह वेट का अध्ययन जीएसटी की मेरी पढाई में बहुत काम आया .

जहाँ तक मेरा एक जीएसटी लेख – Goods and Service Tax- an Introductory study जो ICAI के जनरल में अप्रैल 2007 में प्रकाशित हुआ था जिसे मेरे मित्र , शुभचिंतक और पाठक भारत का पहला जीएसटी का लेख मानते हैं लेकिन ऐसा कुछ भी अधिकारिक स्तर उपलब्ध नहीं है कि ऐसा माना जाए. यह आर्टिकल कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हो गया था उसके एक कारण तो यह था कि यह एक नया विषय था और दूसरा जहाँ यह प्रकाशित हुआ वह बहुत बड़ा मंच था . यह लेख जिस प्रकार से लोकप्रिय हुआ इसका एक बड़ा कारण था कि यह ICAI की मुख्य पत्रिका में प्रकाशित हुआ था और इसका सारा श्रेय इसी पत्रिका और उसके पाठकों को है .

अजय शर्मा : आपका अब तक का सबसे प्रिय आर्टिकल कौनसा है ? मेरे हिसाब से तो Goods and Service Tax- An Introductory Study. मैं सही हूँ सर ?

सुधीर हालाखंडी : आपने मुझे मेरे प्रिय लेख के बारे में पूछा लेकिन साथ ही आपने अपनी पसंद भी बताई है लेकिन मुझे मेरा उत्तर देने दीजिये . जो लेख आप बता रहे हैं वह एक लोकप्रिय लेख तो है लेकिन मेरे प्रिय लेख नहीं है .. इस लेख को कई जगह पहचान मिली .. इसे लोकसभा सचिवालय ने संसद सदस्यों को जीएसटी समझाने के लिए जो सामग्री प्रकाशित की उसमें भी रिफरेन्स के रूप में काम में लिया था . इस लेख ने कई विश्वविद्यालयों के सिलेबस में भी जगह पाई है लेकिन यह मेरा प्रिय लेख नहीं है . आइये मैं अपने प्रिय लेखों की चर्चा आपसे करता हूँ .

मेरा एक अच्छा आर्टिकल था “Income Tax Law in Pakistan – Interesting similarities with us”. ये लेख मेरा प्रकाशित हुआ था जोधपुर के एक टैक्स जर्नल में और यह लगभाग 15 साल पुरानी बात हैं और इस लेख में मैंने दोंनो देशो के आयकर कानूनों में समानताओं की चर्चा की थी . इसकी शुरुआत कैसे हुई आइये यह भी देखते हैं …

एक बार मैं इंटर नेट पर हिन्दू अविभक्त परिवार के बारे में कुछ ढूढ़ रहा था तो अचानक मैंने देखा कि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू परिवारों के लिए भी वहां के आयकर कानूनों में भी हिन्दू अविभक्त परिवार- HUF के प्रावधान है .. उसके बाद मैंने पूरा अध्ययन किया और पाया कि हमारे और पाकिस्तान के आयकर कानून में काफी समानता है .. यह बहुत पुरानी कहानी है और अब तो मेरे पास इस लेख की कोई कॉपी भी नहीं है

इसके अलावा मैंने एक लेख ICAI जर्नल के लिए लिखा था “Service Tax for Small service providers – Myths and Realities” और यह भी मेरे प्रिय लेखों में से एक है .

“Taxability of Gifts in India – What the Law should be” भी एक ऐसा ही लेख था जो मैंने एक बड़े टैक्स प्रकाशक के लिए लिखा था वह भी एक अच्छा लेख था.

मैंने अभी तक 500 से अधिक लेख लिखें है उनमें कई ऐसे है जो मुझे काफी पसंद है .

इसके अलावा जो मेरी हिंदी की जीएसटी ई –बुक है वह भी मेरे जीएसटी पर लिखे कुछ हिंदी लेखों का ही एक संकलन है.

अजय शर्मा : इसी से जुडा एक और सवाल ! आपके जीवन का सबसे खुशी देने वाला क्षण कौनसा था ? मेरे हिसाब से जब आपकी जीएसटी पर लिखी पुस्तक पर किसी टीवी चेनल ने प्राइम टाइम पर एक कार्यक्रम किया वह भी उस भारत में जीएसटी लगने की पूर्व संध्या को . जहां तक मुझे याद आता है अभी हाल ही वर्षों में शायद ही किसी सीए की लिखी पुस्तक पर किसी चेनल के प्राइम टाइम पर चर्चा हुई हो ?

सुधीर हालाखंडी : आइये आपके सवाल का जवाब देते हैं…….मेरे लिए सबसे महत्त्व पूर्ण क्षण वो था जब भारत सरकार के अधिकृत जीएसटी ट्विटर हेंडल ने मुझे फोलो किया. यह जीएसटी का भारत में प्रारम्भिक समय था और सरकार का यह ट्विटर GST@GOI डीलर्स और प्रोफेशनल्स के सवालों के जवाब दे रहा था और एक दिन मैंने इस ट्विटर हेंडल पर दिए गए लगातार 3 सवालों के जवाबों से असहमत होते हुए उनमें संशोधन कर दिए …. और कुछ दे बाद मैंने देखा कि यह ट्विटर मुझे फॉलो कर रहा है !!!!!!

मैं उस समय अर्थात 2017 की बात कर रहा हूँ समय यह ट्विटर हेंडल 6 अन्य गणमान्य व्यक्तियों को और संस्थाओं को फॉलो करता था जिसमें माननीय प्रधानमंत्री महोदय के PMO को शामिल करते हुए 2 खाते , माननीय वित्त मंत्री महोदय, केद्रीय राजस्व सचिव महोदय, जीएसटी कौंसिल , केन्द्रीय उत्पाद शुल्क विभाग …. और 7 वां मैं था !!!!!

मुझे आश्चर्य के साथ खुशी भी बहुत हुई लेकिन मेरा ये खेल 36 घंटे या उससे कम समय में ही ख़त्म हो गया लेकिन तब तक मैं इसका स्क्रीन शॉट ले चुका था और अपने मित्रों और शुभ चिंतको में शेयर कर चुका था . ये स्क्रीन शॉट मैंने अभी सुरक्षित रख रखा है .

हो सकता हो कि मुझे गलती से फॉलो कर दिया गया हो … या प्रोटोकोल की समस्या हो …. या ये सिर्फ मेरा एक सपना था .. लेकिन ये मेरे लिए एक सर्वश्रेष्ट क्षण था जिसे मैंने उस समय भरपूर जी लिया .

हर इंसान को अपनी सपनों की दुनिया में जीने का अधिकार है …… और मैं इसका कोई अपवाद नहीं हूँ .

अजय शर्मा : सर, जो नए प्रोफेशनल आ रहें है उनमें से भी कुछ होंगे जो आपकी तरह लिखना चाहते हैं …. उनके लिए आपके क्या सुझाव हैं ? एक और बात आप इतना समय कैसे निकाल लेते हैं ? एक साथ इतनी ज्यादा गतिविधियों को कैसे सम्हाल पाते हैं ? सर, आप अपने टाइम मैनेजमेंट के बारे में कुछ बताइये .

सुधीर हालाखंडी :- ये एक बहुत अच्छा सवाल है . आइये इसका जवाब देते हैं .. मेरा उन प्रोफेशनल्स को जो राइटर बनना चाहते हैं सलाह यह है कि बहुत अधिक पढ़िए … आप अपने आप ही लिखने लग जायेंगे. कुछ भी पढ़िए . कर कानून , कर मामलों पर लेख , सवाल –जवाब, जो भी उलब्ध हो …. इन्टरनेट के इस दौर में बहुत कुछ साहित्य उपलब्ध है … कुछ भी पढ़िए – कहानियाँ , नावेल, आत्मकथाएं , पत्रिकाएँ , अखबार और कॉमिक्स भी – बिल्लू , चाचा चौधरी.. यदि आपमें पढने की आदत नहीं है तो आपका लिखना क्षणिक ही होगा और आपका लेखकीय जीवन लम्बा नहीं होगा. यदि आप पढ़ नहीं सकते तो फिर इस क्षेत्र में प्रवेश ना करें आप परेशान हो जायेंगे .. आपको लेखन शैली ही विकसित नहीं हो पाएगी . मैं पिछले 20 साल से लगातार लिख रहा हं और जितना मैंने लिखा है उससे 100 गुना मैंने पढ़ा है और आप ये मान कर चलिए लिखना हमेशा पढने का ही परिणाम होता है.

कर मामलों पर आपको लिखना है तो पहले कई बार उस विषय को पढ़िए जिस पर आप लिखना चाहते हैं और कई बार पढ़िए और उसके बाद लिखिए .. और अपने मित्रों को भेजिए .. अपनी गलतियों की चिंता मत करिए …. लोग उन्हें ठीक करवा देंगे और फिर आप खुद ही अच्छा लिखना सीख जायेंगे.

लिखते समय अपनी गलतियों से मत डरिये … मैं आज भी गलतियां करता हूँ लोग उसे बता देते है और हम उन्हें धन्यवाद दे देते हैं और यह मान कर चलिए कि कोई आपको आपकी गलती बता रहा है चाहे वो स्पेलिंग मिस्टेक ही क्यों ना हो .. इसका अर्थ ही है कि कोई आपको पढ़ रहा है ..बस लिखना सीखने का यही सीधा तरीका है .

आपने मेरे टाइम मैनेजमेंट के बारे में पूछा है तो मैं कुछ ऐसा ख़ास नहीं कर रहा हूँ कि समय कोई समस्या बने और कई बार तो मुझे यह समस्या आती है कि समय कैसे पास करें … मेरा ऑफिस का समय 10 बजे से 7 बजे तक है और इस समय लेखन से सम्बंधित कोई कार्य नहीं करता हूँ … कभी – कभी इस बीच दिमाग में कोई कार्टून आ जाता है तो बात अलग है … लेकिन वह तो सिर्फ 5 मिनिट का काम होता है .

मैं जिस शहर से कम करता हूँ वहां दूरियां ज्यादा नहीं है और मेरे घर के ऑफिस का रास्ता सिर्फ तीन मिनिट का है .. हाँ एक बात और है कि मेरा शहर से बाहर जाने का कम ही रहता है या आप मान कर चलिए नहीं रहता है .. तो समय कोई समस्या नहीं है …वैसे मेरा सुबह उठने का समय 5 बजे है….

एक बात और है टाईम मैनेजमेंट नाम की कोई चीज होती ही नहीं है और ये शब्द सिर्फ मोटिवेशनल स्पीच के लिए ही ठीक है …… आप मान कर चलिए आप समय को मैनेज कर ही नहीं सकते , हमेशा समय ही आपको मैनेज करता है . यही जीवन की वास्विकता है .

अजय शर्मा :- आइये अब जीएसटी पर बात करें .. जीएसटी को भारत में आये हुए 30 माह से भी अधिक हो चुके हैं . आपकी क्या राय है जीएसटी के भारत में लागाये जाने और उसकी अभी तक की यात्रा के बारे में .

सुधीर हालाखंडी : जीएसटी भारत में अब तक का सबसे बड़ा कर सुधार था और यदि कानून निर्माता इसकी तैयारी में और समय लेते तब वे सिर्फ इन्तजार ही करते रह आते क्यों कि इतने बड़े कर सुधार का कोई पूरी तरह से आजमाया हुआ मॉडल तो हो नहीं सकता तो जिस भी समय जीएसटी लागू किया गया वही इसका सही समय था .

देखिये 2006 में भारत सरकार द्वारा यह कहा गया था कि 2010 में भारत में जीएसटी लागू कर दिया जाएगा और इसके स्वरुप के बारे में जो केंद्र और राज्यों के बीच जो अड़चन थी वह जैसे ही वह दूर हो गई तो उसके बाद का हर समय एक ऐसा समय था जब जीएसटी भारत में लगाया जा सकता था . 2017 तक सरकार ने इन्तजार किया यही बहुत था .

जीएसटी बिलकुल सही समय पर लागू किया गया और कानून निर्माताओं का काम यहीं तक था लेकिन इसके बाद जिस टीम ने जीएसटी को सम्हाला वो पूरी तरह तैयार ही नहीं थी . जीएसटी एक नया कानून था तो प्रारम्भ में इसमें भ्रम और असमंजस की स्तिथी तो होनी ही थी लेकिन जैसे जैसे स्पष्टीकरण आये उनसे स्तिथी और भी मुश्किल और असमंजस भरी होती गयी लेकिन इसके लिए हम देश के राजनैतिक नेतृत्व को दोष नही दे सकते उन्होंने जीएसटी लागू कर अपना काम पूरा कर दिया था .

जो लोग जीएसटी को प्रारम्भिक रूप में लागू करने के जिम्म्मेदार थे उन्होंने प्रारम्भ से ही ऐसी गलतियां की जो अभी भी उनकी ही इतनी मेहनत के बाद भी सुधर नही रही है . देखिये जीएसटी में कठोर प्रक्रियाएं एक समस्या है और होना यह चाहिए था कि प्रारम्भ में प्रक्रियाएं आसान होती और धीरे – धीरे इन्हें आवशयकता अनुसार कठिन बनाया जाता तो जीएसटी का पालन काफी आसान हो जाता लेकिन हुआ इसका बिलकुल उल्टा और यही अब एक समस्या बन गया है.

लेकिन एक बात ध्यान रखिये डीलर्स और प्रोफेशनल्स ने बहुत ही कौशल और साहस के साथ जीएसटी को लागू करने में मदद की है और ये भी तब जब कि प्रारम्भिक दौर में ही प्रक्रियाएं बहुत ही मुश्किल थी . इसके साथ ही जीएसटी की एक विशेष बात यह है कि इसने प्रोफेशनल्स के कार्य के घंटे और पढने की आदत को काफी हद तक बढ़ा दिया है जो उनके लिए काफी फायदेमंद है और लम्बे समय तक उन्हें इसका फायदा मिलेगा..

तो इस तरह से मेरी राय यह है कि जीएसटी का भारत में लगाया जाना सही समय पर लिया गया कदम है लेकिन इसकी अब तक की यात्रा बहुत सारे भ्रम , कठिनाइयों और परेशानियों से भरी हुई रही है. डीलर्स और प्रोफेशनल्स ने अच्छा काम किया है और यह सब इसके बाद हुआ कि कठिनाइयां बहुत अधिक थी .

अब मुझे उम्मीद है कि जीएसटी से जुड़े सभी पक्ष इसे एक अच्छा और सरल कर बनाने के लिए कार्य करेंगे और आने वाले समय में जीएसटी एक गुड और सिंपल टैक्स होगा जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री महोदय ने प्रारम्भ में कहा था .

अजय शर्मा :-जीएसटी लागू करते समय यह कथन भी काफी चर्चा में था कि जीएसटी भारत की अर्थ व्यवस्था को पलट कर रख देगा और इसका हमारी अर्थ व्यव्व्स्था पर सकारात्मक प्रभाव पडेगा . इस बारे में आपके क्या विचार है ?

जीएसटी एक कर एकत्र करने की प्रणाली है और आप मेरे 2017 के लेख देखेंगे तो मैंने तब लिखा था कि कोई कर प्रणाली कभी भी किसी अर्थ व्यवस्था को यों सीधा फायदा नहीं दे सकती है . अर्थ व्यवस्था के विकास के कई और भी करण होते हैं लेकिन एक बात ध्यान रखें कि यदि कर प्रणाली आसान हो तो व्यापार करने में आसानी होती है और अगर ऐसा होता है तो अर्थ व्यवस्था में सुधार भी होता है लेकिन ये सब इतनी जल्दी और तुरंत नही होता है और इसके लिए हमें पहले जीएसटी में सरलीकरण का उद्देश्य को पूरा करना होगा जो अभी भी अधूरा है .

अजय शर्मा :- सुधीर सर, आप ट्विटर पर अपने जीएसटी के मेसेज के साथ बहुत अधिक सक्रीय है . आपने जीएसटी लेट फीस को लेकर भी आपने कई बार ट्विट किया है . आप बताइये जीएसटी लेट फीस को लेकर आपकी का राय है . क्या आपकी राय में यह लेट फीस कर दाताओं को लौटा देनी चाहिए ?

सुधीर हालाखंडी : जीएसटी पर मेरे tweets ने मुझे 16000 नए दोस्त और शुभचिंतक दिए हैं और 140 शब्दों में अपने आप व्यक्त करने का यह एक अच्छा प्लेटफार्म है और मैंने अभी तक 3500 tweets मैंने किये है और कुछ एक को छोड़कर लगभग सभी ही जीएसटी से ही सम्बंधित है . ये भी हुआ है कि कई कुछ समाचार पत्रों ने भी मेरे tweets को अपने जीएसटी संबंधी समाचारों में जगह दी है .

लेट फीस के बारे मैं मैंने कई बार लिखा है और मेरा यह कहना है कि जीएसटी में जब कुछ अभी प्रयोगात्मक ही चल रहा है तो लेट फीस का कोई अचित्य नहीं है और सरकार को जो भी लेट फीस ली है वह अब लौटा देनी चाहिए.

इसका पक्ष और भी है कि एक समय ऐसा भी आया था जब दोषी डीलर्स जिन्होंने रिटर्न ही नहीं भरे उनकी लेट फीस सरकार ने माफ़ कर दी है लेकिन इसी समय पर जिन डीलर्स ने ईमानदारी से लेट फीस जमा कर कर रिटर्न भर दिए उन्हें भी उनसे ली हुई लेट फीस लौटाई नहीं गई है और यह तो सीधा –सीधा भेदभाव ही है और ऐसा करने से तो डीलर्स का कानून पर से ही विश्वास उठ जाता है.

अजय शर्मा :- आपकी राय में जीएसटी का सबसे बड़ा प्रक्रियात्मक दोष क्या है … मुझे पता है आप कहेंगे कि बहुत से है …. … लेकिन मेरा सवाल है सबसे बड़ा दोष ?

सुधीर हालाखंडी : जीएसटी में जो एक रिटर्न केवल दो माह के लिए लाया गया था और जो अभी भी जारी है वह रिटर्न है 3 B और इस रिटर्न में रिविजन की सुविधा नहीं देना अब तक लागू हुए जीएसटी का सबसे बड़ा प्रक्रियात्मक दोष है और इसी दोष ने डीलर्स की परेशानियां काफी बढ़ा दी है .

अजय शर्मा :- सुधीर सर, आइये अब बात करते हैं जीएसटी के वार्षिक रिटर्न्स के बारे में …..ये रिटर्न्स क्या कर निर्धारण में मदद कर पायेंगे ? वार्षिक रिटर्न्स के बारे में आपके कोई सुझाव है तो दीजिए ?

सुधीर हालाखंडी : देखिये अभी मैंने बताया आपको कि जीएसटी में सबसे बड़ा प्रक्रियात्मक दोष जीएसटी के मासिक रिटर्न 3B में संशोधन की सुविधा का अभाव है और इसी के चलते वार्षिक रिटर्न भी करनिर्धारण में कोई मदद नहीं कर पायेगा .

इसके अलावा वार्षिक रिटर्न में भी एक स्पष्टीकरण की भी एक जगह होनी चाहिए जिसमें डीलर यह बता सके कि छूटी हुई इनपुट क्रेडिट उन्होंने अगले साल किस माह के रिटर्न में क्लेम की है या किस माह में छूटा हुआ आउटपुट टैक्स दिखाया है या डीलर कोई मुद्दे पर स्पष्टीकरण देना चाहे क्यों कि इसके अभाव में इन सब को जांचने के लिए नोटिस जारी करने होंगे और इतने ज्यादा जारी होगे कि जीएसटी का सरलीकरण का मकसद ही समाप्त हो जाएगा.

अजय शर्मा :- सर आइये अब कुछ बात हो जाये जीएसटी कौंसिल के बारे में ……… क्या जीएसटी कौसिल जीएसटी से जुडी समस्याओं को हल करने में यह कौंसिल सफलता पूर्वक कार्य कर रही है ? क्या आप संतुष्ट है जीएसटी कौंसिल के अब तक के कार्य और उनके परिणाम से ….?

सुधीर हालाखंडी:- केंद्र और राज्यों को समुचित प्रतिनिधत्व देने वाली जीएसटी कौंसिल एक बहुत ही अच्छा विचार था जो कि हमारे देश के संघीय ढांचे को देखते हुए जरुरी था . इसकी मीटिंग्स हमेशा निरंतर और सही समय पर हो रही है लेकिन अभी मैंने बताया कि जीएसटी में समस्याएं बहुत अधिक है . मै यह कह सकता हूँ कि जीएसटी कौंसिल में समस्याएं जाती तो है और उनपर विचार भी होता है लेकिन समस्याओं के समाधान इतने धीमे आते हैं कि तब तक डीलर्स काफी परेशान हो जाते हैं . इसके साथ सरकार भी जीएसटी कौंसिल के फैसलों को , विशेष तौर पर जहां डीलर्स को कोई रिलीफ मिलना हो, तो उसके पालन करने में भी काफी समय लागती है . देरी सर भरे टैक्स के ब्याज के सम्बन्ध में इसी देरी ने डीलर्स को काफी परेशान किया और कानूनी रूप से अभी भी यह सरकार के स्तर पर अटका हुआ ही है.

जीएसटी कौंसिल ने जीएसटी नेटवर्क से जुडी समस्याओं के बारे में विचार करने में भी काफी समय लगाया है जबकि यह समस्या जीएसटी के शुरू से ही थी.

इन स्तिथियों को छोड़ दें तो जीएसटी कौंसिल ठीक ही काम कर रही है.

अजय शर्मा :- आइये अब आपके ही प्रिय विषय पर – जीएसटी नेटवर्क …… और ये सवाल आपने भी अभी तक जितने भी विशेषज्ञ आपके इंटरव्यू में आये थे उन सबसे पूछा है तो अब आप की राय भी हो जाए इसी विषय पर ….. जीएसटी नेटवर्क किस तरह से काम कर रहा है ? डीलर्स और प्रोफेशनल्स में काफी असंतोष है जीएएसटी नेटवर्क को लेकर .. आपकी इस बारे में क्या कहना चाहते हैं ?

सुधीर हालाखंडी :- जीएसटी नेटवर्क के जिम्मे जीएसटी की सफलता के कई सूत्र थे क्यों कि जीएसटी पूरी तरह से सुचना प्रोद्योगिकी पर आधारित कर है और इसके लिए जीएसटी नेटवर्क का हर तरह से सक्षम होना जरुरी था ताकि ये पूरे जीएसटी कर को एक स्थायित्व दे सके लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि जीएसटी नेटवर्क जीएसटी लागु होने के 30 माह बाद भी खुद ही स्थायित्व की तलाश में है और इस समय जीएसटी से जुडी सम्साओं का मुख्य कारण भी है .

मेरी एक बात नोट कर लें यदि सरकार जीएसटी डीलर्स से वसूल की गई लेट फीस लौटानी हो तो जीएसटी नेटवर्क की असफलता को इसका कारण बता कर ऐसा किया जा सकता है.

मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि जीएसटी नेटवर्क को लेकर जो समस्याएँ पिछले 30 माह से चल रही है उन्हें देखते हुए इसके सेवा प्रदाता को बदल देने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए क्यों कि सरकार जीएसटी नेटवर्क के सेवा प्रदाता को दोष देकर मुक्त नहीं हो सकती है क्यों कि आम करदाता जो परेशान है उसके लिए जीएसटी नेटवर्क और सरकार में कोई फर्क नहीं है और इसमें जो इमेज ख़राब हो रही है वो सरकार की ही हो रही है.

सरकार को किसी भी तरह से अब जीएसटी नेटवर्क से जड़ी समस्याएं हल कर लेनी चाहिए चाहे इसके लिए कोई भी उपाय करना पड़े.

देखिये जीएसटी नेटवर्क के साथ समस्याएं वर्ष 2017 से ही आ रही है लेकिन इन्हें स्वीकार करने में 2020 आ गया और यह कोई याद रखने लायक उपलब्धि नहीं है.

अजय शर्मा : जीएसटी में डीलर्स की गिरफ्तारी के प्रावधान भी है जिनको लेकर प्रारम्भ में काफी भ्रम और डर की स्तिथी थी . आपने भी कई बार इस भ्रम को दूर करने की कोशिश की है . आइये एक बार हमारे पाठको को भी कुछ इस बारे में बताइए . क्या इस तरह के प्रावधान पहले भी कर कानूनों में थे या पहली बार ही ऐसे प्रावधान लाये गए है . आम करदाता इन प्रावधानों से किस प्रकार से प्रभावित् होगा ?

सुधीर हालाखंडी : सबसे पहले तो आपको बता दूँ कि इस तरह के प्रावधान कोई नए नहीं है और पहले भी इस तरह के प्रावधान कर कानूनों में रहे हैं लेकिन चूँकि जीएसटी के बारे में चर्चा बहुत हुई इसीलिये जीएसटी में गिरफ्तारी के प्रावधानों के बारे में भी लोंगों ने ज्यादा पढ़ा और इसीलिये भ्रम भी ज्यादा फैला .

आम करदाता का इस प्रावधान से कोई लेना देना नहीं है क्यों कि आमतौर पर यह प्रावधान 2 करोड़ रूपये की कर चोरी के मामलों पर लागू होते हैं इसलिए आम करदाता पर ये प्रावधान लागू ही नहीं होंगे .

डीलर्स में डर यह है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है और डीलर्स की गलतियों को कर चोरी का नाम देकर उन्हें परेशान किया जा सकता है लेकिन आप यहाँ ध्यान रखें कि यहाँ प्रावधान कर चोरी की रकम 2 करोड़ रूपये से ज्यादा होने पर ही लागू होंगे इसलिए आप यह मान कर चलिए कि आम करदाता पर इसका कोई ज्यादा प्रभाव पड़ने वाला नहीं है .

इसके अतिरिक्त जीएसटी अधिकारियों को गिरफ्तारी का फैसला लेने का अधिकार ही नहीं है और यह अधिकार सिर्फ जीएसटी आयुक्त को ही है इसलिए भी इस प्रावधान के दुरूपयोग का अवसर भी कम ही है .

अजय शर्मा :- आइये एक बार फिर से आपकी व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में एक बड़ा सवाल आप एक कार्टूनिस्ट भी है ….हमने आपके जीएसटी कार्टून भी देखे हैं इन दिनों में … कब से शुरू हुआ आपका ये एक और शौक ?

सुधीर हालाखंडी : एक बहुत ही अच्छा सवाल है और इसका इंतजार मुझे हमेशा रहता है … इससे मेरी बचपन की यादें जुडी है . मैंने रविवारीय अखबारों से कार्टून बनाना शुरू किया ..फिर बच्चों की पत्रिकाओं के लिए भी कार्टून बनाये – जैसे लोटपोट, मधुमुस्कान , बालभारती …. मुझे याद है कि जब मैं 8 वीं क्लास में था उस समय हिन्दुस्तान टाइम्स की एक लोकप्रिय हिंदी पत्रिका “साप्ताहिक हिंदुस्तान” में भी मेरा कार्टून प्रकशित हुआ था. बाद मैंने कुछ राजनैतिक कार्टून बनाये और उस के बाद “कर मामलों” पर और अभी हाल ही में जीएसटी कार्टून …. जो जीएसटी समस्याओं से प्रेरित थे.

अजय शर्मा :- आप स्वयम सुधीर हालाखंडी को किस तरह से परिभाषित करेंगे ? एक प्रोफेशनल , एक राइटर, एक कार्टूनिस्ट या एक …

सुधीर हालाखंडी : एक प्रोफेशनल जो लिखना भी चाहता है और कभी कभी कार्टून भी बना लेता है …. जिसके लिए प्रोफेशन पहले है जिसे अपने प्रोफेशन बहुत ज्यादा प्यार है ….

सुधीर हालाखंडी एक लेखक भी है जिससे लिखते समय बहुत सी गलतियाँ होती है लेकिन जो कभी लिखना नहीं छोड़ता है …. वो हर विषय पर लिखना चाहता है इसलिए कई बार असफलता स्वाभाविक है…. इसके बावजूद वो यह सूचता है कि कारवाँ चलता रहना चाहिए…

अजय शर्मा :- सुधीर सर, लगता है आपको किसी आलोचक की जरुरत ही नहीं है …. आप खुद ही अपने सबसे बड़े आलोचक हैं ….

आइये अब एक सवाल उन प्रोफेशनल्स की और से जो छोटे शहरों में काम कर रहे हैं ….
सुधीर हालाखंडी : अच्छा ! मेरी भी उन सभी को शुभकामनाएँ … मैं खुद भी उनमें से एक हूँ .. मैं भी एक छोटे शहर से ही काम कर रहा हूँ .
अजय शर्मा :-सुधीर सर , आपने जीएसटी को लेकर इसकी जानकारी करदाताओं तक पहुंचाने में बहुत ही अच्छा काम किया है लेकिन कभी – कभी आप यह भी कहते है कि आप एक ऐसी जगह से कार्य कर रहें है जो अभी तक जिला भी नहीं बना है ….. अभी भी आप वहीं से काम कर रहे हैं या …..

सुधीर हालाखंडी : हाँ यह बात तो सही है कि जहाँ मैं रहता हूँ वो शहर अभी जिला नहीं बना है … यह शहर है ब्यावर जो अजमेर जिले में स्तिथ है और मेरा जन्मस्थान भी है … यह एक औधोगिक शहर है लेकिन पहले मैं यहाँ कभी रहा नहीं क्यों कि मेरी स्कूल और कॉलेज दोनों ही अजमेर से हुई है क्यों कि मेरे पिताजी वहीं काम करते थे …. वे अजमेर में आर्यसमाज की उस समय की कई शिक्षण संस्थाओं से जुड़े थे इसलिए मेरा बचपन और शिक्षा इस शहर में नहीं हुई …… मै प्रोफेशनल डिग्री लेने के बाद इस शहर में आया जहाँ मेरे दादाजी सेल्स टैक्स सलाहकार थे हो सकता है अप्रत्यक्ष करों में मेरी रूचि यहीं से आई हो.. इस शहर से मुझे काफी कुछ मिला है इसलिए अब असंतुष्ट होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है ..

यहाँ शुरुआती साल काफी संघर्ष के रहे . लेकिन धीरे –धीरे सब ठीक हो गया है और मेरी अगली पीढ़ी भी यही से काम कर रही है तो आप समझ सकते हैं कि सब कुछ ठीक ही चल रहा है…. इसलिए संतोष कोई नहीं है लेकिन मैं जानता हूँ कि छोटे शहरों से काम करने में थोड़ी मुश्किल तो आती है इसलिए मैं हमेशा इन शहरों से काम करने वाले प्रोफेशनल्स की हिम्मत की तारीफ़ करता हूँ……..

अजय शर्मा :- सर, आप छोटे शहरों में काम कर रहे प्रोफेशनल्स के लिए एक प्रेरणा के स्त्रोत है है. आपसे एक अच्छी बातचीत हुई , आपने समय निकाला और मुझे भी एक मौक़ा दिया इसके लिए आपका हार्दिक धन्यवाद …..

सुधीर हालाखंडी : आपका भी हार्दिक धन्यवाद और आपके पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं ….

समाप्त

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