जीएसटी – भारत में सबसे बड़ा कर सुधार अभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था की लाईफ लाइन बन सकता है

जीएसटी को भारतवर्ष का कर सुधारों के लिए लाया गया सबसे बड़ा प्रयास माना जाता है और जब इसे 1 जुलाई 2017 को पूरे देश में लागू किया गया था तो यह माना जा रहा था कि कर सुधारों और सरलीकरण की और यह सबसे बड़ा कदम उद्योग और व्यापार को बहुत बड़ी राहत देगा और साथ ही सरकार के राजस्व में भी वांछित वृद्धि करेगा . आइये देखें कि अब जब जीएसटी को लागू हुए 2.50 साल से भी अधिक हो चुके हैं तब इस कर से लेकर कर व्यापार  और उद्योग एवं राजस्व की जो आशाएं और उम्मीद कितनी पूरी हुई है और फिलहाल जीएसटी का भविष्य क्या है . जीएसटी जिस स्तिथी में है उसका श्रेय या जवाबदेही किसे दी जानी चाहिए और किस तरह जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाईफ लाइन बन सकता है क्यों कि जीएसटी कर सरलीकरण एवं अर्थ व्यवस्था के विकास के लिए ही लाया गया था .

जीएसटी को लेकर जहां उद्योग एवं व्यापार जहां अपने आप को प्रक्रियाओं में उलझा हुआ महसूस कर रहा है वहीँ सरकार के भी राजस्व की लक्ष पूरी तरह प्राप्त नहीं हो रहे हैं. कहीं ना कहीं कोई कमी तो है ही और यदि इसे दूर कर दिया जाए तो जीएसटी आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की “लाईफ लाइन” साबित हो सकता है .

देखिये जीएसटी को लेकर उद्योग और व्यापार की जो प्रारम्भिक उम्मीदें थी कि जीएसटी आने पर एक ही कर का भुगतान करना होगा , प्रक्रियाएं सरल हो जायेंगी और व्यापार करना आसान हो जाएगा उनमें कोई भी अतिशोक्ति नहीं थी क्यों कि सरकार द्वारा जीएसटी को प्रचारित ही इसी तरह से किया गया था . जीएसटी को लेकर एक बहुत बड़ा सन्देश यह था “एक देश एक कर” और इसी के साथ सरलीकरण को भी इस नए कर का उद्देश्य बताया गया था .

जीएसटी के प्रमुख उद्देश्य “एक देश एक कर” , सरलीकरण और व्यापार करने में आसानी इत्यादि को भारतवर्ष के करदाता को समझाने में सरकार ने पूरे प्रयास किये और उस समय भारत सरकार इसमें पूरी तरह से सफल भी रही थी और इसी का परिणाम यह रहा कि भारत का उद्योग एवं व्यापार इस नई कर प्रणाली के लिए ना सिर्फ तैयार था बल्कि बेसब्री से इस कर के लागू होने का इन्तजार भी कर रहा था तभी तो आपने देखा होगा कि जब भारत में यह कर लागू किया गया तो इसके विरोध के स्वर इस कर कर स्वागत के स्वरों के मुकाबले बहुत ही कम थे.

जीएसटी को लेकर हमारी सरकार की इच्छा शक्ति बहुत ही दृढ़ थी क्यों बिना इसके जीएसटी जितना बड़ा कर सुधार लागू होना ही संभव नहीं था और सरकार की इस इच्छाशक्ति को कर दाताओंका भी पूरा समर्थन प्राप्त था.

जीएसटी लागू करने में भारत के करदाता और भारत सरकार के अतिरिक्त एक और पक्ष था वह पक्ष था जिसने यह कानून सरकार को बना कर दिया और जो सरकार और जीएसटी कौंसिल को सलाह देने का काम कर रहा था  और इसी सलाहकार पक्ष ने सरकार और जीएसटी कौंसिल को विभिन्न मुद्दों पर सलाह भी दी थी और यही वह पक्ष था जिसने जीएसटी की प्रक्रियाएं भी बनाई और आज भी यही पक्ष जीएसटी की प्रक्रियाएं बदलने में और बनाने में सक्रीय है और हमारे कानून निर्माताओं ने इस सलाह्कार  वर्ग पर जरुरत से ज्यादा भरोसा किया है. सरकार ने जनता को और कर दाताओं को तो यह समझा दिया कि जीएसटी सरलीकरण की और एक बहुत बड़ा कदम है लेकिन कानून और उससे जुडी प्रक्रियाओं को बनाने वाले इस सलाह्कार वर्ग को या तो सरकार यह उद्देश्य समझा ही नहीं सकी या फिर उन्होंने अर्थात जिन लोंगों ने इस कानून और जुडी हुई प्रक्रियाओं की रचना की उन्होंने ने इस लक्ष का महत्त्व समझा ही नहीं और इस तरह प्रक्रियाएं प्रारम्भ से ही बहुत ही सख्त बना दी गई और ऐसा होने पर उन्हें लागू होने से पूर्व उनके परिणामों पर किसी ने गौर नहीं किया और इन जटिल प्रक्रियाओं को रोकने की भी  कोई  कोशिश ही नहीं की .

इस कानून को बनाने के लिए जो भी प्रयास किये गए सरलीकरण से ज्यादा कर की “चोरी रोकने” के प्रयास ज्यादा थे और इसी प्रयास में सरलीकरण के उद्देश्य को गौण कर दिया गया और इसलिए प्रारम्भ में जो सख्त कानून बन गया अब उसमें जितने भी परिवर्तन किये जा रहें हैं वे इस कानून की प्रक्रियाओं को और भी विक्रत कर रही है . सरकार जीएसटी जो अब भी सरल बनाना चाहती है और इसके संकेत भी बार- बार दिए जा चुके हैं .

जीएसटी कानून जो है उसमें से यदि हम भरे  जाने वाले रिटर्न और RCM जैसे अव्यवहारिक प्रावधान को हटा दें तो भारत के संघीय ढांचे में दोहरे अप्रत्यक्ष कर का यह लगभग आदर्श स्वरुप हो सकता है लेकिन यह बात हम इससे जुडी प्रक्रियाओं को लेकर नहीं कह सकते हैं . इस कानून के रचियताओं या सरकार और जीएसटी कौंसिल को सलाह देने वाले सलाहकारों ने इन प्रक्रियाओं को इतना कठिन बना दिया कि डीलर्स को इनका पालन करने में प्रारम्भ से ही करदाताओं को  बहुत कठिनाइयां आई और जब वे इनका पालन नहीं कर पाए तो लेट फीस नामक दंड ने कोढ़ में खाज का काम किया.

प्रारम्भ से ही जीएसटी की जो प्रक्रियाएं बनाई गई उनके पालन के लिए डीलर्स तो छोडिये जीएसटी का तंत्र ही तैयार नहीं था इसी कारण से रिटर्न भरने के लिए वैकल्पिक फॉर्मस की व्यवस्था की गई जो कि आज 28 माह बाद भी GSTR-3B के रूप में जारी है . कई अवांछित रिटर्न्स बनाए गए जैसे ITC-04 फिर उन्हें बार – बार स्थगित कर एक निश्चित अवधि के लिए वापिस लिया गया लेकिन ये फॉर्म आज भी जारी है लेकिन जिन कारणों के लिए इस फॉर्म को दो साल के लिए वापिस लिया गया वे  स्तिथियाँ आज भी वही है और डीलर्स को आज भी उम्मीद है कि ये फॉर्म वापिस ले लिया जाएगा . इस भ्रम और असमंजस की स्तिथी के लिए कोई तो जवाबदेही तय की जानी चाहिए और निवारण भी किया जाना चाहिए. उद्योग और व्यापार  जितना जीएसटी प्रक्रियाओं में उलझाते जाओगे उतना ही उनकी उत्पादकता और व्यापार पर असर तो पडेगा ही और अंत में इसका कुछ तो असर अर्थव्यवस्था  पर भी पडेगा.

देखिये जीएसटी में कुछ् गलतियां तो हुई ही है लेकिन इन्हें स्वीकार करने की जगह इन्हें विभिन्न तर्कों के जरिये समझाया जाता है जैसे इस समय जीएसटी नेटवर्क की क्षमता के बारे में किया जा रहा है . आपको जीएसटी से जुडा एक रोचक अनुभव बताता हूँ.

“कम्पोजीशन डीलर्स को प्रारम्भ में कहा गया उन्हें करयोग्य माल के साथ करमुक्त माल पर भी कम्पोजीशन कर चुकाना होता था और जब इस पर सवाल उठाया गया तो बड़े तार्किक ढंग से इसका सरकारी समर्थन किया गया . आप चाहें तो पुराने वीडियो देखकर इसकी पुष्टी कर सकते हैं . आपको पता है बाद में क्या हुआ ये सारे तर्क धरे रह गए और कम्पोजीशन डीलर्स (जो निर्माता नहीं थे ) उनपर से यह कर कर मुक्त वस्तुओं पर से हटा लिया गया.” इसी से पता चलता है कि सरकार ने भारत का सबसे बड़ा कर सरलीकरण किन अनुभवहीन हाथों में दे दिया था. क्या आपको लगता नहीं कि इनपुट क्रेडिट के 20% का प्रावधान भी इसी अनुभवहीनता का परिणाम है और यदि व्यापार और उद्योग इसके लिए उसी माह में इनपुट क्रेडिट रोकने की जगह 3 से 6 माह का समय मांग रहा है तो गलत क्या है ?

जीएसटी का पहला वर्ष 9 माह का था और यह 31 मार्च 2018 को समाप्त हो गया लेकिन इसके वार्षिक रिटर्न का समय बार-बार बढाया जा रहा है लेकिन इसके पीछे डीलर्स की कोई मांग जिम्मेदार नहीं है बल्कि अभी तक इसके लिए एक “आदर्श फॉर्म” ही नहीं बनाया जा सका है और भी इसके लिए एक बार फिर सरकार द्वारा 10 दिसंबर 2019 तक का समय मांगा जा रहा है तो आप सोचिये कि जब सरकारी क्षेत्र में ही जीएसटी फॉर्म्स को लेकर इतना असमंजस है तो डीलर्स यदि अपने अल्प साधनों के कारण कुछ रिटर्न्स नहीं समय पर भर पाए तो उनसे आप ब्याज तो वसूल ही रहें है लेट फीस के पीछे क्या तर्क है ? जीएसटी के रजिस्ट्रेशन समाप्त होने पर भरे जाने फॉर्म GSTR-10 का भी अधिकांश मामलों में कोई महत्त्व नहीं होता है लेकिन इस पर भी अधिकत्तम लेट फीस 10 हजार रूपये हैं .

यहाँ याद रखें कि वैकल्पिक रूप से जारी  GSTR-3B एक ऐसा फॉर्म है जिसे यह रिटर्न है या नहीं यह तय़ करने में सरकार को लगभग 2 साल गये थे लेकिन उस पर भी हजारों रूपये लेट फीस वसूल की गई है. हर रिटर्न पर यह अलग –अलग लगती है और  NIL रिटर्न्स में भी लेट फीस हजारो में पहुँच जाती है. सरकार डीलर्स की  इन भूलों पर लचीला रुख कर जीएसटी में डीलर्स का और भी विशवास पैदा कर सकती है.

इस रिटर्न GSTR-3B के संशोधन की मांग लगातार की जाती रही है और पता नहीं कानून के किन प्रावधानों के तहत इसे अब तक रोक कर रखा गया है. GSTR-3B में संशोधन हो जाए तभी कर निर्धारण करदाता को बिना विभाग में बुलाये हो पायेंगे अन्यथा अधिकाँश कर निर्धारणों में परेशानी ही आएगी.

जीएसटी मिसमैच को एक बहुत बड़ा तकनीकी मुद्दा बना दिया गया है और सभी डीलर्स को इसे अपने स्तर पर निकालने के लिए छोड़ दिया गया है जब कि वेट में मिसमैच की गणना स्थानीय राज्य  सरकारों द्वारा एक ही सॉफ्टवेयर के द्वारा कर सम्बंधित पक्षों को सूचित कर दिया जाता था . जीएसटी में भी सरकार क्यों नहीं डीलर्स से खरीद के “विक्रेता अनुसार” आंकड़े मांगे और उन्हें विक्रेता द्वारा भरे रिटर्न से केन्द्रीय स्तर पर  मैच किया जाए ताकि मिसमैच अपने आप तैयार हो जाए और खरीददार को सूचित हो जाये और इसके साथ ही कर नहीं जमा कराने वाले विक्रेता भी चिन्हित किये जा सके लेकिन  इस सम्बन्ध में सरकार को सबसे आसान तरीका यह लगा कि क्रेता , जो एक बार उस विक्रेता को कर दे चुका है जिसे भी रजिस्ट्रेशन सरकार ने  ही दिया है, की इनपुट क्रेडिट रोक दी जाए जो कि न्यायसंगत नहीं है. वेट में मिसमैच ज्ञात करने और सूचित करने की जो प्रक्रिया अपनाई गई थी उसे ही जीएसटी में भी काम में लिया जाना चाहिए .

जीएसटी में विक्रय के आंकड़े भी “बिल टू बिल” मांगे जा रहें है जिससे कि प्रक्रिया का बोझ बढ़ जाता है इसे भी “डीलर टू डीलर” किया जाना चाहिए ताकि आंकड़ों और प्रक्रिया का बोझ थोड़ा कम हो सके और जीएसटी नेटवर्क भी इस घटे हुए बोझ का लाभ उठा सके और अच्छी तरह से काम कर सके.

जीएसटी में प्रक्रियाओं के पालन पर इस तरह से जोर दिया गया कि जैसे पूरे देश की अर्थव्यवस्था इन्ही “ जीएसटी प्रक्रियाओं” पर टिकी हुई है और देश का व्यापार और कर एकत्रीकरण प्राथमिकता में दूसरे और तीसरे नंबर चले गए हैं . यदि कर एकत्रीकरण ही प्राथमिकता होता तो सरकार कम से का RCM के उस हिस्से को तो वापिस ले लेती जिसका कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़ने वाला है.

सरकार जीएसटी सुधार चाहती है और बार-बार इसका संकेत दिया जाता रहा है तो आइयें देखें कि जीएसटी सुधारों को लेकर सरकार की भरपूर इच्छाशक्ति के बाद भी रुकावट कहाँ है ? आइये इसे भी एक उदाहरण के द्वारा समझने का प्रयास करें – जीएसटी नेटवर्क की क्षमता एक समस्या है या नहीं इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती है और यदि भारत में जीएसटी वांछित परिणाम नहीं दे पाया तो इसका एक बड़ा कारण जीएसटी नेटवर्क भी  होगा और जीएसटी में जमीनी स्तर पर काम करने वाले लगभग सभी जीएसटी विशेषज्ञ जीएसटी नेटवर्क की क्षमता में वृद्धी की सलाह दे चुके हैं लेकिन अभी हाल सरकार द्वारा जीएसटी नेटवर्क की क्षमता में कमी को सिरे से ही ख़ारिज करते हए डीलर्स को अंतिम तीन दिन जीएसटी रिटर्न नहीं भरने की सलाह दी गई ताकि जीएसटी  नेटवर्क के बोझ को घटाया जा सके . दूसरी और आयकर नेटवर्क की बात करें तो इस वर्ष आयकर नेटवर्क ने रिटर्न भरने के अंतिम दिन बिना किसी रूकावट के रिकॉर्ड सख्या में रिटर्न स्वीकार किये जिसका उल्लेख हमारे माननीय प्रधानमंत्री महोदय ने भी किया था . क्या इसका विकल्प यह नहीं हो सकता कि जीएसटी नेटवर्क की क्षमता ही बढ़ा दी जाए जो जीएसटी के प्रारम्भ से ही संकट में है और भारत जैसे सूचना तकनीक में उन्नत देश के लिए यह कहाँ मुश्किल है ? पर शायद  सरकार को शायद इसी तरह की सलाह दी जा रही है ताकि यह समस्या हल ही नहीं हो सके .

सरकार को और जीएसटी कौंसिल को सलाह देने के लिए जीएसटी को जमीनी स्तर पर जानने वाले विशेषज्ञ वर्ग को भी शामिल करना जरुरी है ताकि डीलर्स का भी पक्ष और समस्याएं इस तरह से टाली नहीं जा सके. इस समय हो यह रहा है कि यदि कोई समस्या बताई भी जाती है तो निवारण खोजने की जगह सबसे पहले यह खोजा जाता है कि किस तरह से यह बताया जाए कि यह कोई समस्या ही नहीं है और ऐसे में समाधान तो देर सवेर होता ही है क्यों कि लम्बे समय तक इस तरह से काम नहीं हो सकता है लेकिन इन सब में एक तो समय बहुत खराब होता और जिस समय समस्या निवारण होना चाहिए उस समय नही होता है इससे करदाता की परेशानी बढ़ती जाती है .

जीएसटी नया कर है और इसमें सरकार और डीलर्स दोनों को भ्रम , असमंजस और कठिनाइयां आनी स्वाभाविक थी और दोनों ही पक्षों को इन्हें मानने के लिए तैयार रहना चाहिए तभी इनका समाधान हो सकता है क्यों सरल और सफल जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए “लाइफ लाइन” बन सकता है और यही इस समय की जरुरत भी  है.

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6 Comments

  1. sushil Sureka says:

    सुधीर जी,
    आप सदैव ही बहुत अच्छा विश्लेषण करते हैं। काश जीएसटी कोंसिल आपकी बातों पर ध्यान दे।
    सुशील सुरेका

  2. RAVISH CHOUBISA says:

    आप के द्वारा किये गए हिंदी में प्रयास GST के लिए सुखद होंगे
    धन्यवाद, कृपया आगे इस प्रयास को जरी रखें

  3. Praveen Tilot says:

    Dear Sir,
    You have initiate to explain article in Hindi. its very nice for people who ignore reading English to understand. Well done sir.

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