सुधीर हालाखंडी

बजट आने के पहले हर वर्ष समाचार पत्रों में बजट साल के अगले साल जी.एस.टी. लागू होने की काफी जोर शोर से छपती है लेकिन एक बात हर बार होती है कि कही ना कही बाद में यह खबर आती है कि राज्यों और केंद्र के बीच किसी एक या अधिक मुद्दे पर मतभेद

है और सहमती के प्रयास किये जा रहे है और यह कर एक बार फिर टल जाता है .

लेकिन यहाँ हर बार यह ध्यान रखे कि मतभेद सिर्फ केंद्र और राज्य सरकार के मध्य ही होता है और कभी भी आधिकारिक स्तर पर यह नहीं कहा जाता है कि इस सम्बन्ध में व्यापार एवं उद्योग जगत के क्या विचार है जबकि यह पूरा ही कर व्यापर एवं उद्योग जगत पर ही लगना है और उन्हें ही इसे एकत्र कर सरकार को जमा कराना है और किसी भी अप्रत्यक्ष कर की सफलता केवल उद्योग एवं व्यापार के सकारात्मक सहयोग से ही संभव है लेकिन शायद जी.एस.टी. को लेकर केंद्र एवं राज्य सरकारों का पूरा ध्यान सिर्फ आपस के विवाद सुलझाने में ही है एवं इस जी.एस.टी. की सफलता के इस महत्वपूर्ण भाग की ओर अभी तक सरकार का ध्यान नहीं गया है .

यहाँ यह तो स्पष्ट है कि सरकार की निगाह में जी.एस.टी. केवल राज्यों आर केंद्र के बीच का मामला ही है . इस वर्ष सरकार इस कारण जी.एस.टी. को लेकर थोड़ा ज्यादा गंभीर नजर आ रही है क्यों कि लोकसभा में जी.एस.टी. संविधान संशोधन विधेयक पास करवाया जा चुका है लेकिन इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखे कि इस विधेयक का उद्देश्य केंद्र सरकार को वस्तुओ की बिक्री पर लगाने एवं राज्य सरकारों को सेवाओं पर कर लगाने की शक्तियां देना एवं जी.एस.टी. की राह में आने वाली संवैधानिक अडचने दूर करना है और यह देश में जी.एस.टी. लगाने की ओर पहला कदम है. इसके बाद इस विधेयक को राज्य सभा से पास करवाना होगा और कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाओं से भी पास करवाना होगा.

अभी जी.एस.टी. कर कानून बनने और उसे लागू करने की प्रक्रिया तो प्रारम्भ ही नहीं हुई है .

लेकिन कही भी समाचारों में यह नहीं आया कि इस सम्बन्ध में व्यापार एवं उद्योग जगत क्या चाहता है और ऐसा लगता है कि जी.एस.टी. पिछले 6 वर्षो से केवल राज्य और केंद्र सरकार के बीच का विवाद मात्र ही बना हुआ है और दोनों पक्ष सिर्फ आपसी हितो को लेकर ही एक दूसरे से सौदे बाजी करने में ही लगे है .

जी.एस.टी. के दौरान कर की दर भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है और सरकार के पास इसका कोई पक्का फार्मूला नहीं है कि इस दोहरे जी.एस.टी. की कौनसी दर लगाने पर सरकार जी.एस.टी. के दौरान अपना राजस्व वृद्धि का लक्ष्य पूरा कर पायेगी इस सम्बन्ध में राज्यों को होने वाले घाटे को भी पूरा करने के लिए संसाधन जुटा पाएगी और यह कर की दर ना सिर्फ व्यापार एवं उध्योग के लिए बल्कि स्वयं सरकार एवं उसके नीति निर्माताओ के लिए भी एक रहस्य एवं असमंजस का विषय ही बना हुआ है . सरकार कोई भी दर तय कर ले वह व्यापार एवं उद्योग जगत एवं उपभोक्ताओं के लिए ज्यादा ही होगी लेकिन उस पर भी सरकार के राजस्व वृद्धि सम्बन्धी घोषित या प्रचारित लक्ष्य पूरे भी होंगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है .

एक बात और बहुत ही महत्वपूर्ण है भारत में लगने वाले जी.एस.टी. के बारे में , जिस पर अभी बहुत अधिक ध्यान लोंगो का नहीं गया है वह यह है कि सरकार का दावा है कि जी.एस.टी. लगने से राजस्व में यथोचित वृद्धि होगी एवं उपभोक्ताओं को भी लाभ होगा. जी.एस.टी. एक अप्रत्यक्ष कर है जिसका अंतिम बोझ उपभोताओ पर ही पडेगा तो ऐसे में राजस्व भी बढेगा और उपभोक्ता भी लाभ में रहेंगे ये दोनों विपरीत baanteलक्ष्य एक साथ कैसे हासिल होंगे यह भी भविष्य के गर्भ में छिपा है .

व्यापार एवं उद्योग जगत के एक बहुत बड़े वर्ग में एक भ्रम तो यह बना हुआ है कि जी.एस.टी. एकल कर है और जब कि भारत में लागू होने वाला जी.एस.टी. एक राज्यों और केंद्र द्वारा लगाया जाने वाला दोहरा कर है जिसके सम्बन्ध में अभी राज्य और केंद्र भी आपस में पूरी तरह से सहमत नहीं है.

अभी चूँकि जी.एस.टी. लागू होने में समय है और केवल संविधान संशोधन हो जाने से ही ( जिसमे से भी अभी राज्य सभा एवं राज्यों की विधान सभाओं में पास होना अभी बाकी है ) जी.एस.टी. लागू नहीं हो जाएगा और वेट की तरह जी.एस.टी. की सफलता भी व्यापार एवं उद्योग के सहयोग पर ही निर्भर है इसलिए सरकार को चाहिए कि जी.एस.टी. के प्रक्रियात्मक प्रारूप को तैयार करने से पूर्व व्यापरिक एवं औद्योगिक संगठनो की राय अवश्य ले लेनी चाहिए.

इसके अतिरिक्त यह ध्यान देने योग्य बात है कि जी.एस.टी. एक ऐसा कर है जिसके तहत कर उसी राज्य को मिलेगा जहा अंतिम उपभोक्ता रहता है एवं अंतरप्रांतीय बिक्री कर जिसे सी.एस.टी . के नाम से जाना जाता है भी समाप्त हो जाएगा . इसके अतिरिक्त अंतरप्रांतीय कर की नयी व्यवस्था “आई.जी.एस.टी.” के नाम से प्रस्तावित है उसका भी सार यह है कि अंतिम कर उपभोक्ता के राज्य को ही मिलेगा .

हमारा देश दो तरह के राज्यों में विभाजित है एक वे राज्य है जो वस्तुओ का उत्पादन करते है एवं दूसरे जो कि बिना उत्पादन किये उपभोग करते है और जी.एस.टी. के तहत उपभोग करने वाले राज्य ही अधिक टैक्स पाने के हकदार होंगे जब कि वर्तमान प्रणाली के तहत निर्माता राज्यों को अधिक कर मिलता है . ऐसे में जो नए समीकरण इस कर के कारण बनेगे एवं उनका देश एवं अभी तक वस्तुओ के निर्माण में अग्रणी राज्यों के ओद्योगिक विकास पर क्या प्रभाव पडेगा इस पर भी शायद अभी गंभीरता पूर्वक विचार नहीं किया गया है .

इस सम्बन्ध में उचित यही है कि व्यापार एवं उद्योग वर्ग की और से भी इस सम्बन्ध में जो सुझाव दिए जा रहे है उनको भी सरकार सुने एवं अंतिम कानून बनाते समय उनके सुझावों को भी उचित स्थान दे तभी जी.एस.टी. की सफलता सुनिश्चित की जा सकती है .

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0 responses to “अभी भी दूर है जी.एस.टी. : जी.एस.टी. में क्या व्यापार एवं उद्योग जगत की भी सुनी जायेगी ?”

  1. a.p.saxena says:

    Sir,
    One thing left out in my comments is the question of distribution between the Union & the States is the net proceeds of taxes which have to be divided between them. Article 236 of the Constitution of India provides for the setting up the Finance Commission at intervals of five years to make recommendations to the President on this important subject.This is a matter which requires consideration after detailed examination of all aspects of the matter.Once GST is introduced,as proposed, from 1st April, 2016, various issues would be raised in the GST Council proposed to be set up as a Constitutional body. –

  2. BSKRAO says:

    On date there is NO REQUIRED TAX PROFESSIONALS to support compliance in Indian Taxation Laws. Govt. should do some thing in this regard before introduction of DTC & GST

  3. SUDHIR HALAKHANDI says:

    Here see what we have been promised when first the concept of GST was introduced in our country-
    BUDGET SPEECH -2006
    155. It is my sense that there is a large consensus that the country should move towards a national level Goods and Services Tax (GST) that should be shared between the Centre and the States. I propose that we set April 1, 2010 as the date for introducing GST. World over, goods and services attract the same rate of tax. That is the foundation of a GST. People must get used to the idea of a GST.
    BUDGET SPEECH 2007 –
    116. I wish to record my deep appreciation of the spirit of cooperative federalism displayed by State Governments and especially their Finance Ministers. At my request, the Empowered Committee of State Finance Ministers has agreed to work with the Central Government to prepare a roadmap for introducing a national level Goods and Services Tax (GST) with effect from April 1, 2010.
    Now if the Tax was introduced a “National Tax” then it will be a single Tax and in our country on a single transaction both state and centre will collect tax hence it is called double tax means two taxes on same transaction- It is very simple . I think you are confused with the term Multiple taxation which i have not mentioned.
    If there are so many advantages of single Taxation system of GST then why the states and centre agree on it and divide/distribute the revenue between them instead of going on separate Tax for state and center to make the procedure difficult for tax payers.
    That is my point.

  4. ajay rastogi says:

    First Central government should determine to introduce GST for betterment of our ultimate customers and parallel economy then they should take some crucial decision for balance distribution of revenue to central and states , now it is time requirement and best survival of Indian economy and prove a firm and balance world wide state of our economy, otherwise it will remains a long long awaited flop show since releasing from 2006 like story of “BIRBAL KI KHICHRI” , therefore , government should go ahead with a clean mind and determination to improve Indian economy to solve their internal disputes.

    Regards,
    A.K.RASTOGI

  5. SUDHIR HALAKHANDI says:

    In the standard format of GST the tax is to be levied and collected by the center and it is distributed by the center between the center and the states . Hence in standard format of GST it is a “single Tax” and the same format was described by Finance Minister in his Budget speech in 2006(See Budget speech of erstwhile FM Mr. P. Chidambaram in 2006)but since in our country states (we have federal system of Governance) also have right to tax sale of Goods and are not agree to surrender this right hence the scheme of single tax was rejected by the states at the initial stage of discussion . Now in proposed GST states and Centre both will tax a single transaction of sale and service hence it is called “Dohra Kar”.

    • N.K.Bajpai says:

      I think the use of the expression “dohra tax” conveys a wrong impression of double taxation without any predetermined and well thought out scheme agreed upon by both the Union & the States.

  6. N.K.Bajpai says:

    One thing left out in my comments is the question of distribution between the Union & the States is the net proceeds of taxes which have to be divided between them. Article 236 of the Constitution of India provides for the setting up the Finance Commission at intervals of five years to make recommendations to the President on this important subject.This is a matter which requires consideration after detailed examination of all aspects of the matter.Once GST is introduced,as proposed, from 1st April, 2016, various issues would be raised in the GST Council proposed to be set up as a Constitutional body.

  7. N.K.Bajpai says:

    It is not correct to say that ” GST dohra tax hai”.It is a tax which replaces all types of indirect taxes on
    commodities and services levied both by the Union government and the governments of 29 States and Union Territories. One of the two Constitution Amendment Bills introduced by the Union Finance Minister last month provides for giving authority to levy of Central Excise duty and Service Tax by the Union government and levy of Sales Tax or VAT by the State governments on the same commodity in the course of manufacture(Central Excise) and sale(Sales Tax or VAT by whichever name called).Since the scheme of GST provides for giving credit of duty paid on the commodity at each stage,it is expected that the final incidence of all taxes would be reduced.The ultimate objective of introducing GST is not only to reduce the incidence of taxation but also to simplify the collection mechanism and is therefore the most important reform of the tax system in our country since independence, as claimed by the Union Finance Minister in spite of numerous differences of opinion amongst the States.
    The second Constitution Amendment Bill provides for setting up a Goods & Services Tax Council which will be a joint forum of the State & the Union government under the Chairmanship of the Union Finance Minister and will have Ministers in-charge of Finance/Taxation nominated by each State & Union Territory having Legislatures(like Delhi & Poduchery) on important issues like tax rates, exemptions,
    threshold limits & dispute resolution modalities etc.
    It should be remembered that the power to levy taxes and decide whom and the extent to which to grant exemption from taxes is the sovereign right of the State subject, of course, to parliamentary control under our Constitution.It is in exercise of powers under our Constitution that the Union government, after due consultation with the States, has decided to introduce the two Constitution Amendment Bills which require ratification by half the State Legislatures before being submitted to the President of India for his assent.
    The whole issue of introducing GST has been in the public domain for several years now and has been widely discussed and debated in public and the trade and industry as well as the press.Our elected representatives in Parliament and State Legislative Assemblies will discuss and debate the issue and pass the Constitution Amendment Bills with such modification as they may consider necessary.Individual citizens can voice their views through the press as well as through the Prime Minister’s web site mygov.in as also tell our elected representatives about their apprehensions in the manner they like.

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