वैसे तो पड़ोसी की मदद करना हमारी सभ्यता के अनुरूप है, लेकिन मदद तभी कारगर साबित होती है जब हम खुद आत्मनिर्भर हो गए हो.

लेकिन आज जो देश में हालात हैं, उसे देखते हुए पड़ोसी देश को मदद कर पाना मुश्किल बन पड़ा है. अब इसे मजबूरी ही कहिये कि चीन अपना आधिपत्य हमारे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका पर करना चाहता है और यदि इन पड़ोसी देशों को समय पर मदद न मिली तो ये भी पाकिस्तान की तरह चीन के नियंत्रण में होंगे और चारों तरफ से चीन जैसे विस्तारवादी पड़ोसी से हम घिर जाएंगे और हमे न चाहते हुए भी चीन के आगे झुकना पड़ेगा.

ऐसे में पड़ोसी देश चीन की चालों में न आये और भारतीय महासागर पर हमारा आधिपत्य हो, इसके लिए नेपाल और श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को हमें ही सम्हालना होगा, लेकिन किस कीमत पर.

यदि ऐसा करने से हमारी अर्थव्यवस्था, व्यापार और उत्पादन क्षमता पर गलत असर पड़ता है तो यह समझदारी नहीं हो सकती. सिर्फ चीन से बचने के लिए हम भी उसी बदहाली में पहुंचे, जहाँ श्रीलंका आज है तो फिर ऐसा कोई भी नहीं चाहेगा.

तो क्या दूसरा कोई उपाय हो सकता है और यदि कोई उपाय है तो एकमात्र उपाय चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने से होगा.

विदेश नीति में बदलाव समय की मांग है. दक्षिण पूर्व एशिया को युरोपीय संघ जैसी महाशक्ति में तब्दील करना होगा. अमरीका और युरोप शुरू से चाहते थे कि एशियन देश आपस में लड़े और वही हो रहा है.

चीन को अलग थलग करने की नीति या पश्चिम देशों के साथ मिलकर दबाव बनाने की नीति शुरू से गलत रही है और इसमें कोई सफलता नहीं मिली. अमरीका और यूरोप एक तरफ तो चीन का विरोध करते हैं एवं भारत के साथ खड़े होते हैं तो दूसरी ओर सबसे ज्यादा उत्पाद चीन से ही खरीदते हैं.

चीन एक आत्मनिर्भर देश अपने आपको साबित कर चुका है और उसके साथ मिलकर ही चलने में भलाई है, लेकिन हमनें अपनी विदेश नीति में उसको पहले न रखकर पश्चिम देशों पर ध्यान दिया. आज हालात ये है कि न हम अपनी अर्थव्यवस्था को सम्हाल पा रहे और न ही पड़ोसी देशों की मदद कर पा रहे और न ही आत्मनिर्भर बन पाए.

हाल का ही उदाहरण लें तो हमारा सीमेंट उद्योग मुश्किलों में फंसने जा रहा है. हमारे देश में पहले से ही सीमेंट का उत्पादन उसकी मांग से ज्यादा हैं और ऐसे में नेपाल को मदद देने के लिए क्वालिटी मापदंड के अनुसार नेपाली सीमेंट का आयात हमने परमिट कर दिया है.

अच्छी क्वालिटी का सस्ते दामों का सीमेंट नेपाल से भर भरकर देश में आ रहा है जो हमारे देशी उद्योग को काफी नुकसान पहुंचा सकता है.

सीमेंट उद्योग में गला काट प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, मार्जिन कम होंगे और व्यापार करना मुश्किलों से भरा होगा. पहले से ही हमारे देश में सीमेंट उत्पादन की अधिक क्षमता है और इसके बावजूद मदद के नाम पर नेपाली सीमेंट आयात होना हमारे उद्योग को नुकसान पहुंचाने वाला है.

नेपाली सरकार ने विकास के नाम पर चीनी सहायता से 15 सीमेंट के संयत्रों की स्थापना की, जिसकी उत्पादन क्षमता 22 मिलियन टन है. अब बाजार न होने के कारण नेपाली सीमेंट उद्योग मुश्किलों से घिर गया और ऐसे में भारत से मदद मांगी. चीन के तरफ झुकाव न हो, इस बात के डर से भारत ने अपना बाजार नेपाली सीमेंट के लिए खोल दिया.

नेपाल में 50 से अधिक सीमेंट कंपनियां काम करती हैं. उनमें से पल्पा सीमेंट इंडस्ट्रीज लिमिटेड सहित 15 सीमेंट और क्लिंकर दोनों का उत्पादन करते हैं.

मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि कंपनियों की कुल सीमेंट उत्पादन क्षमता 22 मिलियन टन है.

उद्योगपतियों का कहना है कि नेपाली सीमेंट उत्पादों को भारतीय बाजार में कड़ी कीमत प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है.

साफ है अब हमारे पास एक ही विकल्प है कि हम अपने उद्योगों की रक्षा करते हुए आत्मनिर्भर बनें और फिर अपने संसाधनों के अनुरूप पड़ोसी देशों की मदद करें.

पश्चिम देशों से हथियार या तेल खरीदकर दोस्त बनाने की बजाय उन्हें दोस्त बनाए, जो हमारा उत्पाद खरीदें और पड़ोसी देशों से खासकर चीन से अच्छे संबंध बनाकर अपना काम निकालने की कूटनीति पर काम करें तो यह अर्थव्यवस्था एवं इस दक्षिण पूर्व एशिया की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम होगा.

*सीए अनिल अग्रवाल जबलपुर 9826144965*

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