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सरकारी विभाग की Delay Condonation बनाम करदाता की Delay Condonation? जीएसटी कानून के अंतर्गत संवैधानिक एवं न्यायिक दृष्टिकोण-

प्रस्तावना-

यह कि वस्तु एवं सेवा कर (GST) कानून का उद्देश्य एक पारदर्शी, न्यायसंगत एवं तकनीक-आधारित कर व्यवस्था स्थापित करना था। किन्तु व्यवहारिक रूप से अपीलीय कार्यवाहियों में “Limitation” एवं “Delay Condonation” (विलंब माफी) सबसे अधिक विवादित विषयों में से एक बन चुका है।

यह कि उपरोक्त सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे आर्डर पर यह लेख लिखा गया है जिसमें करदाता और सरकार बराबर के पक्षकार होते हैं।उपरोक्त केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट को दूसरे पक्ष को सुनने का अवसर नहीं दिया और स्टे ऑर्डर, नोटिस जारी किया है।इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए यह लेख लिखा गया है।

यह कि व्यापारियों एवं कर-व्यवसायियों के बीच एक सामान्य चिंता यह है कि जहाँ सरकारी विभागों को विलंब के मामलों में उदार दृष्टिकोण प्राप्त हो जाता है, वहीं करदाताओं की अपीलें तकनीकी limitation के आधार पर अस्वीकार कर दी जाती हैं।

यह स्थिति एक महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं विधिक प्रश्न उत्पन्न करती है—

यदि limitation के प्रावधान सरकार और करदाता दोनों पर समान रूप से लागू होते हैं, तो क्या delay condonation में असमान व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 की कसौटी पर टिक सकता है?

यह कि GST Act 2017की धारा 107 के अंतर्गत विधिक स्थिति-

GST Act 2017 की धारा 107 के अनुसार—

  • अपील आदेश की सूचना प्राप्त होने से 3 माह के भीतर दाखिल की जानी चाहिए।
  • अपीलीय प्राधिकारी पर्याप्त कारण होने पर अधिकतम 1 माह अतिरिक्त विलंब को माफ कर सकता है।

अर्थात् विलंब माफी की शक्ति सीमित है।

परिणामस्वरूप अनेक मामलों में अपील केवल limitation के आधार पर खारिज कर दी जाती है, जबकि-

  • कर पहले ही जमा हो चुका होता है,
  • कोई दुर्भावना (mala fide) नहीं होती,

तथा न्याय की दृष्टि से मामले का गुण-दोष पर निर्णय आवश्यक होता है।

क्या सरकार भी Limitation से बंधी है?

उत्तर स्पष्ट रूप से — “हाँ”।

Limitation कानून समान रूप से लागू होता है-

  •  करदाता पर,
  •  सरकारी विभागों पर,

तथा सार्वजनिक प्राधिकरणों पर।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि केवल प्रशासनिक प्रक्रिया या फाइलों के आवागमन के कारण सरकार को अलग limitation व्यवस्था नहीं दी जा सकती।

इस संदर्भ में:

Postmaster General v. Living Media India Ltd.CIVIL APPEAL NO.  2474-2475 OF 2012(Arising out of SLP (C) Nos. 7595-96 of 2011

निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा—

Delay condonation कोई सामान्य अधिकार नहीं है और सरकारी विभाग इसे स्वाभाविक लाभ के रूप में नहीं ले सकते।

न्यायालय ने यह भी कहा कि-

  •  प्रशासनिक विलंब,
  •  फाइलों का घूमना,
  •  विभागीय अनुमोदन,

सदैव विलंब माफी का आधार नहीं बन सकते।

Substantial Justice के पक्ष में उदार दृष्टिकोण

दूसरी ओर न्यायालयों ने यह भी माना है कि तकनीकी प्रक्रियाएँ न्याय प्राप्ति में बाधा नहीं बननी चाहिए।

Collector, Land Acquisition v. Mst. Katiji Civil Appeal No. 460 of 1987, (Arising out of Spl. Leave Petn. (Civil) No. 12980 of 1986. D/d. 19.2.1987.

निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि-

  • तकनीकीताओं की अपेक्षा न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए,

तथा पक्षकारों को सामान्यतः merits पर सुनवाई से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार:

N.Balakrishnan v. M. Krishnamurthy (N. BALAKRISHNAN A v. M. KRISHNAMURTHY SEPTEMBER 3, 1998 [S. SAGHIR AHMAD AND K.T. THOMAS, JJ.) B Limitation Act, 1963 : Section 5. )

निर्णय में न्यायालय ने कहा—

विलंब की अवधि महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसका कारण महत्वपूर्ण है।

अर्थात यदि कारण वास्तविक एवं bona fide हो तो न्यायालय उदार दृष्टिकोण अपना सकता है।

जीएसटी मुकदमों में व्यवहारिक विरोधाभास

व्यवहार में जीएसटी विवादों में अक्सर निम्न विरोधाभास देखने को मिलता है-

सरकारी पक्ष-

  • विलंब को उदारता से माफ किया जाता है।
  • प्रशासनिक कारण स्वीकार किए जाते हैं।
  • न्यायालय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हैं।

करदाता पक्ष-

  • अपील limitation पर यांत्रिक रूप से खारिज कर दी जाती है।
  • पोर्टल समस्याओं या तकनीकी कठिनाइयों की अनदेखी होती है।
  • bona fide procedural lapses को कठोरता से देखा जाता है।
  • यह स्थिति असमानता एवं प्रक्रियात्मक अन्याय की भावना उत्पन्न करती है।

अनुच्छेद 14 के अंतर्गत संवैधानिक दृष्टिकोण-

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 प्रदान करता है-

  • यह कि कानून के समक्ष सब समान है।
  • तथा कानूनों का समान संरक्षण प्राप्त हैं।

यदि limitation के नियम दोनों पक्षों पर समान हैं, तो procedural fairness भी समान रूप से लागू होनी चाहिए।

करदाता यह तर्क उठाना चाहिए  कि-

  • यह कि समान परिस्थितियों में समान न्यायिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए,
  • यह कि bona fide conduct को समान संरक्षण मिलना चाहिए,

तथा तकनीकी आधार पर न्याय से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता की भूमिका-

यद्यपि GST Appellate Authorities की condonation power सीमित है, फिर भी उच्च न्यायालयों ने Article 226 के अंतर्गत अनेक मामलों में हस्तक्षेप किया हैI जहाँ-

  • यदि प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ,
  • यदि पोर्टल त्रुटियाँ थीं,
  • यदि सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया,

या तकनीकी प्रक्रिया ने न्याय को बाधित किया।

माननीय उच्च न्यायालयों ने बार-बार कहा है—

प्रक्रिया न्याय की सेवक है, स्वामिनी नहीं।

करदाता को सुझाव-

उचित मामलों में करदाता को निम्न आधार अवश्य उठाने चाहिए-

  • यह कि bona fide conduct हैं।
  • यह कि mala fide का अभाव है।
  • यह कि कर का पूर्व भुगतान किया गया है।
  • यह कि तकनीकी कठिनाई के कारण।
  • यह कि प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन किया गया है।
  • तथा अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता का सिद्धांत।

साथ ही निम्न न्यायिक सिद्धांतों का सहारा लिया जा सकता है-

  • liberal condonation principles,
  • substantial justice doctrine,
  • natural justice principles।

निष्कर्ष-

यह कि GST कानून का उद्देश्य न्यायसंगत एवं पारदर्शी कर प्रशासन स्थापित करना है। Limitation के प्रावधान आवश्यक अवश्य हैं, किन्तु वे न्याय से वंचित करने का साधन नहीं बनने चाहिए।

  • अतः संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। जैसे-
  • यह कि limitation में अनुशासन होना।
  • यह कि वास्तविक मामलों में न्यायपूर्ण उदारता होना।
  • यह कि राज्य एवं नागरिक के बीच समानता का व्यवहार किया जाना चाहिए।
  • तथा तकनीकी अस्वीकृति की अपेक्षा merits पर निर्णय हो।

यह कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य केवल प्रक्रिया का पालन नहीं, बल्कि प्रत्येक पक्षकार को निष्पक्ष अवसर प्रदान करना है।

*****

𝗗𝗶𝘀𝗰𝗹𝗮𝗶𝗺𝗲𝗿- यह लेखक के निजी विचार है.

Author Bio

मेरा नाम संजय शर्मा हैं।मैं उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में इनडायरेक्ट टैक्सेस में वकालत करता हूं ।तथा मेरी शैक्षिक View Full Profile

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