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विक्रय प्रमाण पत्र (Sale Certificate)

न्यायालयों, राजस्व अधिकारियों, या सरफेसी (SARFAESI) अधिनियम के तहत प्राधिकृत अधिकारियों (Authorized Officers) द्वारा सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से बेची गई संपत्ति के ‘विक्रय प्रमाण पत्रों’ को लेकर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, स्टाम्प अधिनियम और भू-राजस्व संहिताओं के प्रावधानों के बीच अक्सर प्रशासनिक संशय की स्थिति उत्पन्न होती है। । माननीय उच्चतम न्यायालय एवं देश कई उच्च न्यायालयों के द्वारा विक्रय प्रमाण पत्र मे स्टाम्प शुल्क के संबंध मे निर्णय दिए है। इन निर्णयों के आधार पर एक संक्षिप्त लेख इस प्रकार है –

विक्रय प्रमाण पत्र जारी करने की वैधानिक प्रक्रिया

जब किसी अचल संपत्ति का विक्रय सार्वजनिक नीलामी द्वारा किया जाता है, तो प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया विशिष्ट कानूनों द्वारा निर्देशित होती है। न्यायालय द्वारा की गई नीलामी के मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश XXI नियम 94 के तहत न्यायालय द्वारा विक्रय प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। वहीं, बैंकों द्वारा ऋण वसूली के मामलों में ‘सरफेसी अधिनियम, 2002’ के अंतर्गत ‘प्रतिभूति हित (प्रवर्तन) नियम, 2002’ के नियम 9(6) के तहत प्राधिकृत अधिकारी द्वारा यह प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। दोनों ही स्थितियों में वैधानिक प्रक्रिया यह है कि विक्रय प्रमाण पत्र की मूल प्रति (Original Copy) सीधे नीलामी के क्रेता को सौंप दी जाती है, और उसी प्रमाण पत्र की एक प्रति (Copy) रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 89(2) या 89(4) के तहत, क्षेत्राधिकार वाले संबंधित उप पंजीयक को प्रेषित की जाती है।

स्वामित्व का हस्तांतरण और प्रमाण पत्र की वैधानिक प्रकृति

सबसे बड़ा प्रश्न इस बात को लेकर होता है कि क्या विक्रय प्रमाण पत्र जारी होते ही वह स्टाम्प अधिनियम के तहत एक ‘लिखित’ (Instrument) बन जाता है एवं मुद्रांक शुल्क आकर्षित करता है ? विधि के अनुसार, संपत्ति का स्वामित्व (Title) क्रेता में उस क्षण ही निहित हो जाता है जब सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय द्वारा बिक्री की पुष्टि (Confirmation of Sale) कर दी जाती है । विक्रय प्रमाण पत्र केवल उस संपन्न हो चुके लेनदेन का एक औपचारिक साक्ष्य (Record) है, न कि स्वामित्व हस्तांतरित करने वाला कोई नया दस्तावेज़ ।

इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा B. Arvind Kumar v. Government of India and others के प्रकरण में निम्नानुसार कहा गया है-

“When a property is sold in public auction in pursuance of an order of the Court and the bid is accepted and the Court confirms the sale in favour of the purchaser, the sale becomes absolute and the title vests in the purchaser.”

धारा 89 के अंतर्गत प्राप्त विक्रय प्रमाण पत्र पर उप पंजीयक का दायित्व

जब किसी न्यायालय या प्राधिकृत अधिकारी द्वारा रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 89 के तहत विक्रय प्रमाण पत्र की प्रति (Copy) उप पंजीयक कार्यालय को प्रेषित की जाती है, तो उप पंजीयक के वैधानिक दायित्व अत्यंत स्पष्ट और सीमित होते हैं। इस स्थिति में उप पंजीयक का कार्य पूरी तरह से प्रबंधकीय (Ministerial) होता है, न कि न्यायिक या न्याय-निर्णायक (Adjudicatory)।

उप पंजीयक का प्राथमिक और एकमात्र दायित्व यह है कि वह प्राप्त हुई उस प्रति को अपने कार्यालय की ‘पुस्तक में फाइल (File) कर ले । वर्तमान मे इसे सामान्यतः अनुपूरक पुस्तक मे फाइल करते है।  फाईलिंग का उद्देश्य संपत्ति के हस्तांतरण की सार्वजनिक सूचना (Public Notice) सुलभ कराना है । चूंकि धारा 89 के तहत केवल एक प्रति प्राप्त होती है (न कि पंजीकरण के लिए प्रस्तुत मूल दस्तावेज़), अतः उप पंजीयक न तो इसके लिए किसी प्रकार के स्टाम्प शुल्क या पंजीकरण शुल्क की मांग कर सकता है, और न ही वह भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 33 के तहत अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस प्रति को परिबद्ध (Impound) कर सकता है।

इस वैधानिक दायित्व को स्पष्ट करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा M/s Esjaypee Impex Pvt. Ltd. v. The Asst. General Manager and Authorized Officer, Canara Bank (2021) के प्रकरण में निम्नानुसार कहा गया है-

“We are of the view that the mandate of law in terms of Section 17(2)(xii) read with Section 89(4) of the Registration Act, 1908 only required the Authorised Officer of the Bank under the SARFAESI Act to forward the copy of the certificate of sale to the Registering Authority to be filed in its Book I. A copy of the sale certificate forwarded to the Registering Authority to be filed in Book I under Section 89 is sufficient compliance of the provisions of the Registration Act.”

फाइलिंग और रजिस्ट्रीकरण के मध्य तुलनात्मक अंतर:

धारा 89 के अंतर्गत फाइल किया गया विक्रय प्रमाण पत्र पंजीकृत विक्रय प्रमाण पत्र
कानूनी आधार Registration Act, 1908 की धारा 89 Registration Act, 1908 की धारा 17/18
प्रकृति केवल फाइलिंग (statutory record) विधिवत पंजीयन (registered instrument)
प्रक्रिया प्राधिकृत अधिकारी/न्यायालय द्वारा स्वतः भेजा जाता है पक्षकार द्वारा प्रस्तुत किया जाता है
पंजीयन कार्यालय की भूमिका निष्क्रिय (केवल record रखना) सक्रिय एवं अर्ध-न्यायिक (verification + registration)
जांच कोई जांच/सत्यापन नहीं निष्पादन, पहचान, स्टाम्प आदि की जांच
पक्षकार की उपस्थिति आवश्यक नहीं आवश्यक
निष्पादन की स्वीकृति नहीं होती अनिवार्य
स्टाम्प ड्यूटी नहीं लागू
पंजीयन शुल्क नहीं लागू
दस्तावेज़ की स्थिति केवल अभिलेख (record) पूर्ण कानूनी दस्तावेज (instrument)
पंजीयन कार्यालय की जवाबदेही सीमित (केवल फाइलिंग/इंडेक्सिंग) व्यापक (due diligence आवश्यक)
त्रुटि की जिम्मेदारी जारी करने वाले प्राधिकरण की, पंजीयन कार्यालय की कोई जवाबदेही नहीं पंजीयन के संबंध में पंजीयन अधिकारी की
साक्ष्य मूल्य सीमित पूर्ण

इस वैधानिक स्थिति की पुष्टि करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा Inspector General of Registration v. G. Madhurambal (2022) के प्रकरण में भी कहा गया है कि धारा 89 के तहत प्रमाण पत्र की फाइलिंग का प्रभाव रजिस्ट्रीकरण के समान ही होता है और प्राधिकृत अधिकारी द्वारा आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं होती है।

स्टाम्प शुल्क की देयता और दस्तावेज़ का ‘अन्य उद्देश्यों’ के लिए उपयोग

जब तक विक्रय प्रमाण पत्र केवल साक्ष्य के रूप में रहता है और धारा 89 के तहत इसकी प्रति उप पंजीयक कार्यालय में फाइल की जाती है, तब तक इस पर स्टाम्प शुल्क देय नहीं होता। यह दस्तावेज़ केवल तब स्टाम्प शुल्क आकर्षित करने वाला ‘लिखित’ (Instrument) बनता है, जब क्रेता इसका उपयोग अपनी स्वेच्छा से आगे किसी विधिक लाभ के लिए करता है।

इस वैधानिक रूपांतरण की व्याख्या करते हुए माननीय केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है-

“A sale certificate, at the time of its issuance, is not an instrument because it merely records a concluded sale and does not, in itself, create or transfer title in praesenti. It only metamorphoses into an instrument attracting stamp duty if and when the original is presented for formal registration to secure rights against third parties.”

इसी क्रम में, स्टाम्प शुल्क की अनिवार्यता को और अधिक स्पष्ट करते हुए हाल ही में माननीय उच्चतम न्यायालय ने State of Punjab v. M/s Ferrous Alloy Forgings (2024) के प्रकरण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा है-

“It is only when the auction purchaser uses certificate for some other purpose that the requirement of payment of stamp duty etc. would arise…”

“Some other purpose” (किसी अन्य उद्देश्य) का विधिक अर्थ: इसका सीधा तात्पर्य यह है कि न्यायालय या बैंक द्वारा प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया अपने आप में स्टाम्प ड्यूटी नहीं मांगती। परंतु, यदि क्रेता उस ‘मूल विक्रय प्रमाण पत्र’ का उपयोग, किसी ‘अन्य उद्देश्य’ के लिए करता है—जैसे कि बैंक से ऋण (Mortgage) लेने के लिए, संपत्ति को आगे किसी अन्य को बेचने के लिए, उप पंजीयक के पास औपचारिक रूप से पंजीकृत (Register) कराने के लिए, या राजस्व न्यायालय में स्वामित्व सिद्ध करने के लिए—तब वह दस्तावेज़ एक सक्रिय ‘लिखित’ (Instrument) बन जाता है और उस पर भारतीय स्टाम्प अधिनियम (अनुच्छेद 18) के तहत पूर्ण स्टाम्प शुल्क का भुगतान अनिवार्य हो जाता है।

रजिस्ट्रीकरण और धारा 33 के अंतर्गत परिबद्ध (Impounding) करने की शक्तियां

यदि नीलामी का क्रेता उस मूल विक्रय प्रमाण पत्र को औपचारिक रजिस्ट्रीकरण के लिए (अन्य उद्देश्य हेतु) उप पंजीयक के समक्ष प्रस्तुत करता है, तो भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 2(12) के अनुसार प्राधिकृत अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के कारण वह दस्तावेज़ ‘निष्पादित’ (Executed) माना जाता है।

ऐसी स्थिति में, क्रेता को सर्वप्रथम उस मूल दस्तावेज़ को स्टाम्प अधिनियम की धारा 31 के तहत स्टाम्प कलेक्टर (जिला पंजीयक) के समक्ष प्रस्तुत कर अधिनिर्णय (Adjudication) कराना चाहिए, ताकि उचित स्टाम्प शुल्क अदा कर धारा 32 के तहत पृष्ठांकन (Endorsement) प्राप्त किया जा सके। यदि क्रेता इस प्रक्रिया का पालन किए बिना, सादे कागज पर जारी ‘मूल’ विक्रय प्रमाण पत्र सीधे उप पंजीयक के समक्ष रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रस्तुत कर देता है, तो उप पंजीयक भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 33 के तहत उस मूल दस्तावेज़ को परिबद्ध (Impound) करने के लिए वैधानिक रूप से बाध्य है। इसके पश्चात उचित स्टाम्प शुल्क और जुर्माने की वसूली के लिए उसे कलेक्टर को अग्रेषित किया जाना अनिवार्य है।

भू-राजस्व संहिता के अंतर्गत नामांतरण (Mutation) हेतु मूल विक्रय प्रमाण पत्र का उपयोग

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक प्रश्न है कि क्या नीलामी का क्रेता बिना मुद्रांकित कराए और पंजीयन कराए मूल विक्रय प्रमाण पत्र का उपयोग तहसीलदार के समक्ष भू-राजस्व संहिता के अंतर्गत नामांतरण हेतु कर सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर ‘रजिस्ट्रीकरण’ और ‘स्टाम्प शुल्क’ दोनों के दृष्टिकोण से अलग-अलग समझना आवश्यक है। रजिस्ट्रीकरण अधिनियम की धारा 17(2)(xii) के तहत इस प्रमाण पत्र को अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण से स्पष्ट छूट प्राप्त है। अतः, केवल ‘पंजीयन के अभाव’ के आधार पर तहसीलदार नामांतरण करने से इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि स्वामित्व का हस्तांतरण न्यायालय/बैंक की पुष्टि से ही पूर्ण हो चुका है।

परंतु, स्टाम्प अधिनियम के दृष्टिकोण से वैधानिक स्थिति भिन्न है। जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि स्टाम्प शुल्क की आवश्यकता तब उत्पन्न होती है जब क्रेता प्रमाण पत्र का उपयोग “some other purpose” (किसी अन्य उद्देश्य) के लिए करता है। राजस्व न्यायालय (तहसीलदार) के समक्ष स्वामित्व सिद्ध करने और नामांतरण (Mutation) का दावा करने हेतु मूल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना इसी ‘अन्य उद्देश्य’ की परिधि में आ सकता है।

चूंकि तहसीलदार भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 33 के तहत एक ‘सार्वजनिक अधिकारी’ (Person in charge of a public office) है, यदि उसके समक्ष बिना उचित स्टाम्प लगा हुआ मूल विक्रय प्रमाण पत्र साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो वह उसे साक्ष्य में ग्राह्य करने से मना कर सकता है और धारा 33 के तहत उसे परिबद्ध (Impound) करने के लिए बाध्य है। अतः, निष्कर्ष यह है कि नामांतरण के लिए विक्रय प्रमाण पत्र का रजिस्ट्रीकरण (Registration) अनिवार्य नहीं है, परंतु तहसीलदार के समक्ष इसे साक्ष्य स्वरूप प्रस्तुत करने से पूर्व इसका स्टाम्प कलेक्टर द्वारा विधिवत मुद्रांकित (Duly Stamped) होना वैधानिक रूप से आवश्यक है, अन्यथा यह परिबद्ध (Impound) किए जाने योग्य हो जाएगा।

संदर्भ:-

1. State of Punjab v. Ferrous Alloy Forgings (P) Ltd., 2024- माननीय उच्चतम न्यायालय

2. Revenue Divisional Officer & Sub Registrar Vs Thomas Deniel-2025 माननीय केरल उच्च न्यायालय

3. Tripower Enterprises (Private) Limited vs Sub Registrar and Others-माननीय मद्रास उच्च न्यायालय

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लेखन एवं मार्गदर्शन- श्री वीरेंद्र कुमार श्रीवास, वरिष्ठ उप पंजीयक, महानिरीक्षक पंजीयन, कार्यालय छत्तीसगढ़ रायपुर 

 संकलन एवं सह-लेखक- श्री भूपेश कुमार मिश्रा, उप पंजीयक, राजनांदगांव 

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