आपको जानकर हैरानी होगी कि रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 से लेकर अब तक यानि 2021-22 के अनुसार रिजर्व बैंक ने 2016 से लेकर अब तक 500 और 2000 के कुल 6849 करोड़ नोट छापे थे और उनमें से 1680 करोड़ से ज्यादा नोट सर्कुलेशन से गायब है जिसका मूल्य 9.21 करोड़ रुपये आता है.

 मतलब साफ है लोगों के पास 9 लाख करोड़ रुपये का काला धन इस देश में दबा हुआ है.

आज नोटबंदी की संवैधानिकता को लेकर भी माननीय उच्च न्यायालय में सुनवाई शुरू होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट के 10 सवाल, जिन पर होगी सुनवाई:

1.  क्या नोटबंदी का 8 नवंबर का नोटिफिकेशन और उसके बाद का नोटिफिकेशन असंवैधानिक है?

2. क्या नोटबंदी संविधान के अनुच्छेद-300 (ए ) यानी संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन है?

3. बैंकों और एटीएम में पैसा निकासी का लिमिट तय करना लोगों के अधिकारों का उल्लंघन है?

4. डिस्ट्रिक्ट सहकारी बैंकों में पुराने नोट जमा करने और नए नोट निकालने पर रोक सही नहीं है?

5. नोटबंदी का फैसला क्या आरबीआई की धारा-26 (2) के तहत अधिकार से बाहर का फैसला है?

6. क्या नोटबंदी के फैसले को बिना तैयारी के लागू किया गया. करंसी का इंतजाम नहीं था और कैश लोगों तक पहुंचाने का इंतजाम नहीं था?

7. क्या सरकार की इकोनॉमिक पॉलिसी के खिलाफ अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट दखल दे सकता है?

8. क्या नोटबंदी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. मसलन संविधान के अनुच्छेद-14 यानी समानता के अधिकार और अनुच्छेद-19 यानी आजादी के अधिकारों का उल्लंघन है?

9. क्या विमुद्रीकरण का फैसला सिर्फ संसद की मंज़ूरी से लिया जा सकता है?

10. क्या संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत राजनीतिक दलों द्वारा दाखिल की गईं रिट याचिकाओं पर विचार किया जा सकता है?

नोटबंदी की संवैधानिकता पर जो भी फैसला हो पर यह तो साफ हो गया की काला धन खासकर अपने देश में नकदी पर लगाम कसने या अनुपालनों की भरमार करने से नहीं रुक सकता. यहाँ सरकार की सोच पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता पर तथ्य बताते हैं कि नोटबंदी प्रक्रिया असफल साबित हुई. साथ ही जीएसटी और डिजिटल इंडिया की मुहिम भी अभी तक रंग नहीं ला सकी है. इन तथ्यों को जाने जो ऊपर की बातों पर मोहर लगाते हैं:

1. नोटबंदी के समय 13 लाख करोड़ रुपये 500 और 1000 के नोटों में सर्कुलेशन में थे.

2. आज 2022 में 31 लाख करोड़ रुपये 500 और 2000 के नोटों में सर्कुलेशन में है.

3. देश में आज नकदी 16 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 36 लाख करोड़ रुपये मार्केट में है.

4. देश की कुल नकदी में 14% दो हजार के नोटों का हिस्सा है और 74% 500 के नोटों का हिस्सा है.

5. पांच सौ के 6181 नोट सर्कुलेशन में होने चाहिए लेकिन मार्केट में 4555 करोड़ नोट ही आरबीआई के अनुसार चल रहे हैं.

6. इसका मतलब लगभग 1626 करोड़ 500 के नोट जिनका मूल्य लगभग 8 लाख करोड़ रुपये आता है, मार्केट से गायब है.

7. इसी तरह 370 करोड़ 2000 के नोट सर्कुलेशन में होने चाहिए लेकिन 316 करोड़ नोट ही चल रहे हैं.

8. इससे लगभग 54 करोड़ 2000 के नोट मार्केट से गायब है जिनका मूल्य लगभग 1 लाख करोड़ रुपये आता है.

9. मतलब साफ है मार्केट से 9 लाख करोड़ रुपये गायब है जो आरबीआई द्वारा छापे गए हैं.

10. यदि यह 9 लाख करोड़ रुपये मार्केट में होता तो लगभग जीडीपी में 45 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि होती और सरकारी राजस्व 15 लाख करोड़ रुपये से बढ़ सकता था.

11. इसी तरह भास्कर में छपी रिपोर्ट के अनुसार स्विस बैंकों में आज भारतीयों का लगभग 300 लाख करोड़ रुपये पड़े हैं और सर्कुलेशन से गायब 9 लाख करोड़ रुपये मात्र इसका 3% होता है.

उपरोक्त तथ्यों को समझे तो सरकार के पास मात्र दो उपायें है:

1. जैसे 2000 रुपये के नोट छापना बंद कर दिया, उसी तरह नोट छपाई बंद कर दें- लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था में जहाँ 40% जनसंख्या अभी भी गरीबी रेखा से नीचे है, जन सामान्य के लिए यह उपाय समस्या ला सकता है और आक्रोश पैदा कर सकता है और इसीलिए ये उपाय सरकार के लिए करना संभव प्रतीत नहीं होता.

2. नकदी पर लगाम कसने और अनुपालनों की भरमार की बजाय कैश लेनदेन में छूट देते हुए रिकॉर्ड कीपींग पर जोर देना होगा और साथ ही कर नियमों का सरलीकरण एवं दरों में कमी के माध्यम से ही हम काला धन भी घटा सकते हैं और राजस्व बढ़ा सकते हैं.

साफ है एक तरफ सरकार नोट भी छापती जा रही है और दूसरी तरफ इस पर लगाम भी कसती जा रही है जिस कारण से दो नाव की सवारी सरकार के लिए घातक साबित हो रही है और काले धन पर वार करने के लिए नीतिपरक बदलाव करने होंगे और साथ ही स्विस बैंकों से पैसे वापस देश में लाने की घोषणा नहीं, कार्यवाही करनी होगी.

*लेखक एवं विचारक: सीए अनिल अग्रवाल जबलपुर 9826144965*

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