Dated: 19/02/2020

आदरणीय वित्तमंत्री महोदया

वित्त मंत्रालय
भारत सरकार
नई दिल्ली

महोदया,

सादर नमस्कार !

विषय :- इस समय जीएसटी के सम्बन्ध में उद्योग एवं व्यापार वर्ग को आने वाली समस्याओं के लिए ज्ञापन एवं सुझाव

वर्ष 2020 का बजट आपने पेश किया उसमें जो जनउपयोगी एवं अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने के लिए जो कदम आपने उठायें है उसके लिए आपका तहे दिल से स्वागत एवं समर्थन और हार्दिक अभिवादन !

भारत सरकार ने भारत में जीएसटी लागू कर एक साहसिक एवं सराहनीय कदम उठाया है वह आसान नहीं था और इसके लिए इस कर से जुड़े सभी पक्षों का भी हार्द्कि अभिवादन एवं धन्यवाद !

अब जीएसटी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक अनिवार्यता है और पूरी अर्थव्यवस्था जीएसटी पर ही निर्भर है लेकिन इस समय जीएसटी के सम्बन्ध में जो स्तिथी चल रही है उससे भारतवर्ष के व्यापारी वर्ग की स्तिथी अब असहनीय हो गई है और आप इस पर तुरंत ध्यान दें और इसके लिए सुधारात्मक कदम उठाये अन्यथा जीएसटी भारतीय उद्योग एवं व्यापार के लिए एक दीर्घकालीन समस्या बनकर इसे नुक्सान पहुचायेगा. आइये देखें कि जीएसटी को इस समय किन सुधारों की आवश्यकता है :-

1. तकनीकी गलतियां सुधारने व रिटर्न संशोधन का मौक़ा दें :-

जीएसटी एक नया कर था और भारत के उद्योग एवं व्यापार ने इसके पालन करने में पूरी मेहनत और ईमानदारी से सहयोग दिया है लेकिन कर नया होने के कारण इसके पालन में प्रारम्भिक समय में उद्योग एवं व्यापार से काफी तकनीकी गलतियाँ हुई है लेकिन इस प्रकार की तकनीकी गलतियों में किसी भी प्रकार की कर चोरी की भावना नहीं होती है लेकिन चूँकि जीएसटी के प्रमुख रिटर्न GSTR-3B में गलती के संशोधन का कोई प्रावधान नहीं था तो ये गलतियों सुधर ही नहीं सकी.

जीएसटी से पहले जो अप्रत्यक्ष कर का कानून था जिसके सरलीकरण के लिए जीएसटी लाया गया था उस कानून में जिसमें सर्विस टैक्स, वेट और सेंट्रल एक्साइज भी शामिल थे में भी रिटर्न को संशोधत करने की सुविधा थी, आयकर का रिटर्न भी संशोधित हो सकता है फिर जीएसटी कर जो कि सरलीकरण के लिए लाया गया था उसमें इस तरह का असुविधाजनक प्रतिबन्ध लगाने का कोई तर्क नहीं है और यदि जीएसटी के रिटर्न संशोधित करने का प्रावधान कर दिया जाए तो जीएसटी के रिटर्न एवं कर निर्धारण में होने वाली अधिकांश समस्याएं हल हो जायेंगी. आप इस समस्या पर विशेषज्ञ राय भी लें कि बिना रिटर्न संशोधित किये कई तरह की समस्याएं हल ही नहीं हो सकती है और ये सभी समस्याएं हल हुए बिना वार्षिक रिटर्न्स भी कर निर्धारण में अधिकारियों की कोई मदद नहीं कर पायेंगे और इसके अभाव में सारे कर निर्धारण नोटिस जारी करने के बाद ही होंगे जो कि जीएसटी के सरलीकरण के सिद्धांत के विरुद्ध होगा.

आपसे निवेदन है कि इस तरह की तकनीकी त्रुटियों को दूर करने का उद्योग एवं व्यापार को यदि एक मौक़ा दिया जाये तो जीएसटी से सम्बंधित अनेक समस्याएं हल हो सकती है जिनमें कर के तीनो वर्गों में जैसे SGST, CGST एवं IGST में एक की बिक्री दूसरे वर्ग में दिखा देना या इनकी ITC एक दूसरे में क्लेम हो जाना लेकिन अब इनका संशोधन नहीं होने से अब व्यापारी वर्ग परेशान हो रहा है जब कि यह कर सरकार को मिल भी चुका है अब इसे फिर से वसूलना और उस पर ब्याज लेना ये केवल तकनीकी खामी के कारण व्यापार को दंड देना ही हुआ जब कि जीएसटी में प्रारम्भ से लेकर आज तक सरकार से भी कई तकनीकी गलतियां हुई है जिसे भी लगातार अधिसूचनाएं एवं परिपत्र जारी कर सुधार करने की कोशिश की गई है तो फिर एक छोटी सी सुविधा व्यापारी वर्ग में देने में कहीं कोई भी परेशानी नहीं होनी चाहिए. इसे आप व्यापार एवं उद्योग की और से अनुरोध मान कर इस सुविधा देने का कष्ट करें.

2. सकल कर पर ब्याज लेना अतार्किक और अव्यवहारिक है :-

(धारा 50 (1) में भूतलक्षी प्रभाव से संशोधन करे इस प्रावधान की सख्त व्यख्या ने इसे अतार्किक बना दिया है)

इसके अतिरिक्त सकल कर पर ब्याज देने का मामला भी व्यापार एवं उद्योग को परेशान कर रहा है. देरी से रिटर्न भरने पर ब्याज तो केवल नगद में जमा कराए जाने वाले बकाया कर ही होना चाहिए ना कि सकल कर पर. स्वयम जीएसटी कौंसिल और आपकी सरकार भी इस विचार से सहमत नही है इसीलिये आपने इस सम्बन्ध में संशोधन प्रस्ताव भी दिया है लेकिन वह भी अभी लंबित ही है आप शीघ्र ही इसे एक जुलाई 2017 के भूतलक्षी प्रभाव से लागू कर व्यापार एवं उधोग को इस परेशानी से छुटकारा दिलाएं जो कि आप ही के कानून के अतार्किक प्रावधान के कारण उत्पन्न हुई है. जो राशि सरकार के खजाने में आ चुकी है उस पर ब्याज लगाने का ना तो कोई औचित्य है ना ही कोई व्यवहारिक और आर्थिक तार्किकता और इस तरह से यह व्यापारिक वर्ग पर एक अनुचित बझ है.

जीएसटी कानून की धारा 50 (1) में 1 जुलाई 2017 के भूतलक्षी प्रभाव से परिवर्तन कर भारत के उद्योग एवं व्यापार को इस प्रावधान की अतार्किक व्याख्या से होने वाले प्रभाव से बचाने का कष्ट करें.

3. लेट फीस लौटाने का कष्ट या कृपा करें :-

(जीएसटी कर एकत्र करने के लिए लाया गया था लेकिन इसे लेट फीस टैक्स बना दिया गया है जो इस कर और डीलर्स के लिए उचित नहीं है)

देरी से रिटर्न भरने पर व्यापारी वर्ग को भारी लेट फीस का भुगतान करना पडा है जब कि जीएसटी एक नया कानून था और साथ ही कई तकनीकी परेशानियां भी इस कर की प्रक्रियाओं को लेकर थी और सरकार ने भी इस सम्बन्ध में लगातार परिवर्तन किये हैं तो व्यापारी वर्ग से भी देरी होना संभव था.अत: आपसे निवेदन है कि व्यापारी वर्ग जिसने जीएसटी की सफलता के लिए अथक परिश्रम किया है उनकी लेट फीस लौटाने का कष्ट करें एवं अभी भी जीएसटी की लेट फीस को इस तरह से परिभाषित करें कि वह व्यापारी द्वारा एक कर अवधि में “नगद” में भुगतान किये जाने वाले कर से अधिक कभी भी ना हो.

जीएसटी कानून भारत में एक सरल अप्रत्यक्ष कर कानून लाने के लिए लाया गया था लेकिन यह एक नया कानून था और गलतियां और देरी भी सभी पक्षों के द्वारा किया जाना स्वाभाविक है.

4. बैंक से भुगतान करते ही सरकार को भुगतान समझें :-

(व्यापारी सरकार को कर उसी दिन दे देता है जिस दिन वह इसे सरकारी खजाने में जमा करा देता है यह पैसा डीलर के खाते से निकल जाता है और सरकार के पास चला जाता ही – धारा 49(4 को भी इस सम्बन्ध में देखें जिसमें सेट ऑफ का प्रावधान दिया गया है और ब्याज लेने के लिए साधन ना बनाएं.)

जीएसटी में कोई भी व्यापारी जिस समय अपने कर का बैंक द्वारा भुगतान कर देता है उसी समाय सरकार को यह कर प्राप्त हो जाता है तो फिर जब व्यापारी उसे जिस तिथी को सेट ऑफ करे उस तिथी तक ब्याज लगाने के पीछे भी कोई तर्क नहीं है और इस प्रावधान ने भी व्यापारी वर्ग को बहुत परेशान कर रखा है. इस तरह की “कागजी मांग” खड़ी करना वह भी इस समय जब कि जीएसटी खुद ही प्रयोगात्मक दौर से गुजर रहा है व्यापारी वर्ग पर बोझ डालने का कोई तर्क नहीं है.

जो पैसा कर के रूप में सरकार को मिल चुका है उस पर सिर्फ इसलिए ब्याज लगा देना कि उसे सेट ऑफ नहीं किया है,जो कि एक तकनीकी खामी है, उचित भी नहीं है और व्यवहारिक भी नहीं है.

आयकर कानून में भी जो रकम चालान के द्वारा बैंक में जमा करा दी जाती है उसी तारीख से ही इसे जमा मान लिया जाता है और इसी तरह से ही जीएसटी में भी बैंक में राशि जमा करा देने से इसे जमा मान लिया जाए.

5. जीएसटी नेटवर्क अपना काम तो करें :-

(जीएसटी नेटवर्क 1 जुलाई 2017 से ही कार्य नहीं कर रहा है सरकार इसे स्वीकार करे और सम्बंधित पक्षों को इसमें सुधार करने के लिए बाध्य करे )

जीएसटी का नेटवर्क जीएसटी लागू होने के बाद कभी भी अच्छी तरह से काम नहीं कर पाया है और जीएसटी की अधिकांश परेशानियों का कारण यही जीएसटी नेटवर्क है जिसकी गति एवं क्षमता को बढ़ाना अति आवशयक है और आप इस नेटवर्क को शीघ्र दुरुस्त करने का कष्ट करें ताकि जीएसटी की प्रक्रियाओं के पालन में व्यापारी वर्ग को परेशानी ना हो. जीएसटीएन एक राष्ट्रीय नेटवर्क है और इसके लगातार असफल होने को अब आंकड़ों से छुपाया नहीं जा सकता है अत: आप जीएसटी नेटवर्क के सेवा प्रदाता को इस बात के लिए बाध्य करे कि जीएसटी नेटवर्क की गति एवं क्षमता इस तरह बढाए कि आने वाले 10 साल तक के बढे हुए काम को यह झेल सके जो कि सुचना प्रोद्योगिकी का एक मूल सिद्धांत होता है जिसका पालन जीएसटी नेटवर्क की कार्यप्रणाली में नही किया गया है.

जीएसटी नेटवर्क की असफलता के लिए बार –बार यह प्रयास किये गए हैं कि इसके लिए डीलर्स और प्रोफेशनल्स को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए या उन्हें यह कहा जाए कि वे आखिरी दिनों में रिटर्न क्यों भरते हैं और आप यह मान कर चलिए कि यह कोई इस समस्या का कोई व्यवहारिक हल नहीं है और इसके लिए आपको जीएसटी नेटवर्क को मजबूत करना होगा ताकि डीलर्स इसका उपयोग करते हुए जीएसटी की प्रक्रियाओं का निर्बाध तरीके से पालन कर सके. जीएसटी नेटवर्क एक सुविधा होना चाहिए जब कि यह एक असुविधा में परवर्तित हो चुका है जिसमें शीघ्र सुधार की आवश्यकता है और यदि वर्तमान में जो जीएसटीएन सेवा प्रदाता है उनके द्वारा यह सम्भव नहीं है तो आप उन्हें दूसरे सेवा प्रदाता से बदल दें जो कि खराब सेवा देने पर इस तरह सेवा प्रदाता बदल देने का व्यवहारिक नियम है और आप भी उसका जनहित में पालन करें.

6. इनपुट क्रेडिट के मिस्मेच की समस्या का तार्किक एवं व्यवहारिक हल ढूंढें :-

(धारा 36(4) को एक बार फिर से देखें ये व्यापार एवं उद्योग के लिए कार्यशील पूंजी की एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर रहा है )

जीएसटी में खरीद पर इनपुट क्रेडिट का मिस्मेच भी एक बड़ी समस्या है और जिस तरह से अब कानून बनाया गया है वह इस समस्या को और भी गंभीर बनाता है अत; आपसे निवेदन है कि आप जीएसटी खरीद की इनपुट क्रेडिट के मिस्मेच को दूर करने के लिए तीन से छह महीने का समय देने का कष्ट करें और इसके अतिरिक्त खरीददार को इस प्रकार का दंड देने के जगह उस बेचने वाले डीलर को दण्डित करें जो कर खरीददार से लेकर जमा नहीं करवा रहे हैं.

जिन डीलर्स ने माल बेचा है उन्हें भी रजिस्ट्रेशन भारत सरकार ने ही दिया है आर अब वह कर जमा नहीं कराता है या देरी से जमा कराता है, जिसके कई कारण हो सकते हैं, के लिए खरीददार को जिम्मेदार ठहराना कोई न्याय नहीं है. यह कहना कि “आप अपना विक्रेता समझदारी से चुने” बहुत ही आसान आधिकारिक बयान हो सकता है पर यह कोई मिस्मेच की समस्या का हल नहीं है.

डीलर्स को अपने विक्रेताओं के द्वारा कर जमा नहीं करवाने के कारण मालुम करना, उन्हें दूर करना और विक्रेताओं से कर जमा करवाना इसके लिए समय चाहिए और आपसे अनुरोध है कि इसके लिए 3 से 6 माह का समय देने का कष्ट करें और खरीददार की भी समस्या समझने का प्रयास करें और इसे हल करें. जल्दबाजी में खरीददार की इनपुट क्रेडिट रोक देना व्यापार एवं उद्योग के लिए कार्यशील पूंजी की समस्या खड़ी कर देगी और व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा.

7. RCM की अव्यवहारिक प्रक्रिया व प्रावधान को हटाएँ :-

(धारा 9 (4) के RCM के प्रावधान को दिनांक 1 जुलाई 2017 के भूतलक्षी प्रभाव से हटायें )

जीएसटी में RCM एक नई और अव्यवहारिक प्रक्रिया थी और अपंजीकृत व्यापारी से खरीद पर RCM को दिनांक 13 अक्तूबर 2017 को हटा लिया गया था लेकिन इस अव्यवहारिक कानून को लेकर परेशानी 1 जुलाई 2017 से ही थी इसलिए इस प्रावधान को इसी तारीख से हटाना ही उचित रहता जो कि नहीं किया गया है और इस कारण से कई किस्म की परेशानियों का सामना व्यापारी वर्ग को करना पड़ रहा है अत; आप इस पर ध्यान दें कि किस उपाय से व्यापारी वर्ग को इस परेशानी से छुटकारा मिल सके.

जो प्रावधान 13 अक्तूबर 2017 को अव्यवहारिक था वह 1 जुलाई 2017 को व्यवहारिक कैसे हो सकता है इसके अतिरिक्त यदि इसे 1 जुलाई 2017 से हटा लिया जाता तो सरकार के राजस्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.

RCM को लेकर एक और निवेदन है आपसे कि अधिकाँश मामलों में व्यापारी वर्ग पर लगे इस अव्यवहारिक प्रावधान से सरकार को राजस्व के रूप में कुछ नहीं मिलता है सिर्फ व्यापारी वर्ग को अतिरिक्त प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है जो कि सरलीकरण के नाम पर लाये गए जीएसटी के मुख्य उद्देश्यों से मेल नहीं खाता है. आप इस प्रावधान को वापिस लेने का कष्ट करें जहाँ इसका कोई वित्तीय प्रभाव नहीं है.

8. इनपुट क्रेडिट को लेने का समय समाप्त होने की स्तिथी में एक बार समय दें :-

(जीएसटी कानून की धारा 16(4) को देखें और जीएसटी के प्रारम्भिक दो साल में इसे स्थगित रखें)

जीएसटी कानून की धारा 16(4) के अनुसार किसी एक निर्धारण वर्ष में मिलने वाली इनपुट क्रेडिट एक निर्धारित समय में नहीं ली जाए तो वह समाप्त हो जाती है और इस तरह से व्यापारी वर्ग को उस कर की आर्थिक हानि उठानी पड़ती है जिसका भुगतान वह अपने विक्रेता को दे चुका है और जो सरकार के खजाने में भी जमा हो चुका है.

एक बार फिर से यहाँ हम आपसे यह निवेदन कर रहे हैं कि जीएसटी नया कानून होने के कारण तकनीकी खामियां डीलर्स से हुई है इसलिए आप पहले अर्थात प्रारम्भिक दो वर्षों में इस धारा 16(4) के प्रावधानों से छूट देकर उन्हें यह क्रेडिट देने का कष्ट करें क्यों कि यह पैसा सरकार के खजाने में तो आ ही चुका होता है.

9. 2018-19 वार्षिक रिटर्न नेटवर्क पर लायें और तारीख बढ़ाएं :-

(आपकी तकनीक और जीएसटी नेटवर्क रिटर्न और उनकी सुविधा उपलब्ध नहीं करवा पा रहें हैं तो इसकी अंतिम तिथी बढ़ाना ही तार्किक होगा – इसे 30 जून 2020 तक बढायें )

जीएसटी के 2018-19 के वार्षिक रिटर्न अभी तक भी जीएसटी नेटवर्क पर उपलब्ध नहीं हैं और इसकी अंतिम तिथी अब सिर्फ अगले ही महीने है इसलिए आपसे निवदन है कि इस रिटर्न को शीघ्र ही जीएसटी नेटवर्क पर लगवाने का कष्ट करें और चूँकि अभी तक यह रिटर्न नेटवर्क पर उपलब्ध नहीं है इसलिए आपसे निवेदन है कि 2018-19 के वार्षिक रिटर्न की तिथी 30 जून 2020 करने का कष्ट करें और इसके साथ ही रिटर्न इत्यादि के मामले में जीएसटी नेटवर्क को नियमित करने का कष्ट करें.

आज दिनांक 19 फरवरी 2020 तक भी यह सुविधा जीएसटी नेटवर्क पर उपलब्ध नहीं है.

2017-18 के वार्षिक रिटर्न के लिए 5 बार तारीख बढ़ायी गई थी लेकिन इनमें से एक बार भी यह तारीख व्यापार एवं उद्योग की मांग पर नहीं बढाई गई थी, हर बार यह तारीख जीएसटीएन की तकनीकी खामियों और फॉर्म एवं उसकी सुविधा उपलब्ध नहीं करवाने के कारण हुआ था और इस बार भी यही स्तिथी है अत: हमारी सलाह यह है कि आप 2018-19 की तारीख को आप 30 जून 2020 अभी से कर दें ताकि इस सम्बन्ध में कोई असमंजस और भ्रम नहीं रहे.

आप पहले इस वार्षिक रिटर्न का फॉर्म और उसकी सुविधा जीएसटी नेटवर्क पर जारी करें और इसके बाद व्यापार एवं उद्योग को 90 दिन का समय दें ताकि वे इस रिटर्न को आसानी से समझ बूझ कर भर सकें.

10. जीएसटी सरलीकरण अब तो प्रारम्भ करें :-

(जीएसटी सरलीकरण के लिए ही लाया गया था लेकिन अब यह उद्देश्य पीछे रह गया है )

जीएसटी भारत में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल बनाने के लिए लाया गया एक बहुत ही महत्वकांक्षी और साहसिक कदम था लेकिन इस समय जो जीएसटी की स्तिथी चल रही है उससे ऐसा लगता है कि जीएसटी का यह मुख्य उद्देश्य काफी पीछे चला गया है या यों कहे कि अदृश्य ही हो गया है और इस समय जिस तरह से जीएसटी की प्रावधानों को व्यापार एवं उद्योग के विरुद्ध काम में लिया गया है उससे लगता है कि अब सरलीकरण के सिद्दांत को पूरी तरह से छोड़ दिया गया है इसलिए आपसे निवेदन है कि प्रक्रियाओं को आसान बनाये और अव्यवहारिक प्रावधानों को हटाने का कार्य अब शुरू कर दें तो देश के व्यापार, उद्योग एवं अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छा वातावरण तैयार होगा जिसका वादा जीएसटी लाते समय किया गया था.

जीएसटी की प्रक्रियाएं बहुत ही मुश्किल है इन्हें आसान किये बिना जीएसटी की सफलता को पाना काफी मुश्किल है अत: अब आप सरलीकरण की प्रक्रिया शीघ्र ही प्रारम्भ करने का कष्ट करें

11. क्या अर्थ व्यवस्था बिना लघु और मध्यम व्यापार के चल सकती है :-

(भारतीय उद्योग एवं व्यापार को जीएसटी की परेशानियों से मुक्त कराएं ताकि वे भारतीय अर्थ व्यवस्था में अपना योगदान दे सकें )

भारत की अर्थव्यवस्था बिना लघु और मध्यम उद्योग और व्यापार के नहीं चल सकती है इसलिए चूँकि यह वर्ग इस समय जीएसटी के कारण संकट में है अत; आपसे निवेदन है कि आप जीएसटी से जुडी समस्याओं का निवारण करें और आप इस और भी ध्यान दें कि इस वर्ग को लगातार जीएसटी नोटिस मिल रहे हैं जो कि इनकी मुश्किलें और भी बढ़ा रहे हैं अत; आप इस बात की जाँच करवाने का कष्ट करें की तकनीकी कारणों से जारी नोटिसों की संख्या कम करवाएं और यदि इस गति से नोटिस जारी हो रहें है आप यह मान लें कि व्यापारी बहुत अधिक संख्या में आपके इस कानून का पालन नहीं कर पा रहें हैं और कानून में जो अव्यहारिक प्रावधान है उन्हें हटाने का कष्ट करें क्यों कि आप भी मानेंगे कि इतनी बड़ी सख्यां में यदि गलतियां हो रही है तो फिर खामी कानून में ही है और इसें सुधार की अतिशीघ्र आवश्यकता है.

जिस संख्या में जीएसटी नोटिस जारी हो रहें हैं उसी से आप मान लीजिये कि प्रक्रियाएं कठिन है और इनका पालन करने में कई तकनीकी गलतियां हुई है अब आप उन गलतियों को सुधरने का मौक़ा दें तभी यह कर सफलता पूर्वक लागू हो सकेगा वरना उलझने सुलझनें की जगह और भी उलझती चली जायेगी और इस प्रकार जीएसटी डीलर्स के बहुत सारे मामलें अदालतों में भी जायेंगे जो कि किसी भी सरल कर प्रणाली के लिए उचित बात नहीं है.

आशा है इन सुझावों पर आप सकारात्मक सोच के साथ विचार करेंगे और इसी भावना के साथ भारत के उद्योग एवं व्यापार की जीएसटी से जुडी समस्याओं को हल करने का आदेश देकर भारत के उद्योग एवं व्यापार को भारत की अर्थ व्यवस्था में योगदान देने का पूरा अवसर देंगे.

– आदर सहित
भवदीय
सुधीर हालाखंडी
sudhirhalakhandi@gmail.com

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