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वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017 में ब्याज हेतु धारा 50 का मनमाना प्रयोग

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वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017 के अंतर्गत ब्याज का मुद्दा एक विवाद का विषय है। खास तौर पर आजकल वित्तीय वर्ष 2017-18 और वित्तीय वर्ष 2018-19 के अंतर्गत जीएसटी विभाग ने करयोग्य करदाता के द्वारा प्रस्तुत रिटर्न में कर्मियों को इंगित करते हुए  ।बिना सोचे समझे कर के साथ ब्याज की मांग की जा रही है।इस सुविधा का अध्ययन इस तथ्य से और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। कि अधिकांश मामलों में, ब्याज  नोटिस में मांगे गए कर से अधिक होता है। जबकि हर कोई समझता है कि ब्याज लगाना स्वचालित और अनिवार्य है, ?ऐसे ब्याज की मात्रा निर्धारित करने के लिए अंकगणितीय अभ्यास की आवश्यकता होती है।और वास्तविक मुद्दा  मूल राशि का निर्धारण है ।जिस पर ब्याज की दर और अवधि के लिए लागू की जानी है। .

वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017 की धारा 73 और 74 क्रमशः गैर-धोखाधड़ी और धोखाधड़ी के मामलों में भुगतान न किए गए या कम भुगतान किए गए या गलती से वापस किए गए या गलत तरीके से उपयोग किए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट के निर्धारण से संबंधित हैं । हालाँकि, यह समझना सबसे महत्वपूर्ण है कि धारा 73 और 74 की रूपरेखा भी, ब्याज लगाने का अधिकार देते समय, विशेष रूप से धारा 50 से संदर्भ लेती है। इसी तरह,  वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017 की विभिन्न धाराओं जैसे धारा 16, 21 में उल्लिखित अन्य  प्रावधान भी शामिल हैं। सैक्शन 37, 38, 39, 51, 52, 60, और 67 में धारा 50 से ही एकसा संदर्भ लेते हैं।

प्रारंभ से ही यह, मूल मुद्दा धारा 50 के  अंतर्गत केवल कर के विलंबित ‘नकद’ पर ब्याज लगाना रहा है, न कि ‘आईटीसी’  पर और न्यायिक अधिकारी कई न्यायिक घोषणाओं में इस सिद्धांत को दोहराते रहे हैं। माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में। कुमारन फिलामेंट्स (पी) लिमिटेड वी. केंद्रीय जीएसटी और केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्त रिट पिटीशन संख्या 11113 वर्ष 2020 दिनांक 14 सितंबर 2021केंद्रीय आयुक्त में उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच द्वारा की गई निम्नलिखित टिप्पणियों को उद्धृत करता है। कि उत्पाद शुल्क, पुडुचेरी-I बनाम। सेस्टैट , चेन्नई 2017 (346 ELT 80);

बेंच ने Note किया। कि 30.06.2017 तक विभाग के पास पर्याप्त क्रेडिट उपलब्ध था और उठाई गई मूल मांग ऐसे क्रेडिट के समायोजन से ही उत्पन्न हुई थी। यह समायोजन स्वत: हो सकता था ।और खंडपीठ का कहना था।कि ऐसे समायोजन पर कोई ब्याज नहीं लगेगा। जो किसी भी समय किया जा सकता था, क्योंकि कर की राशि विभाग के पास उपलब्ध थी। इस संदर्भ में, बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘जब करदाता के खाते में क्रेडिट उपलब्ध था , तो विभाग को इस तरह की मांग नहीं करनी चाहिए।’

दिनांक 22 दिसंबर 2018 को आयोजित  31वीं जीएसटी परिषद की बैठक में जीएसटी अधिनियम की धारा 50 में संशोधन करने को मंजूरी दी गई ।ताकि यह प्रावधान किया जा सके। कि स्वीकार्य इनपुट टैक्स को ध्यान में रखते हुए करदाता की ‘शुद्ध कर देनदारी’ पर ही ब्याज लगाया जाना चाहिए। क्रेडिट, यानी, ब्याज केवल ‘इलेक्ट्रॉनिक कैश लेजर’ के माध्यम से देय राशि पर लगाया जाएगा। अनुवर्ती कार्रवाई में, दिनांक 21 जून 2019 को 35वीं जीएसटी परिषद की बैठक की सिफारिशों के आधार पर, धारा 50 के प्रावधानों को वित्त  अधिनियम, 2019 के माध्यम से संशोधित किया गया। कि ताकि ब्याज लगाने का प्रावधान किया जा सके । ‘शुद्ध कर देनदारी।’ इसके अलावा, दिनांक 14 मार्च 2020 की 39वीं जीएसटी परिषद की बैठक में, शुद्ध कर देनदारी पर ‘पूर्वव्यापी प्रभाव से’ ब्याज देनदारी लगाने की सिफारिश की गई थी।

01/07/2017 से शुद्ध कर देयता पर ब्याज की वसूली को स्पष्ट करने के लिए प्रेस विज्ञप्ति दिनांक 26 अगस्त 2020और निर्देश दिनांक18 सितंबर 2020 में जारी किए गए थे । पूर्वव्यापी  इस मुद्दे को अंततः अधिसूचना संख्या द्वारा अधिसूचित वित्त अधिनियम, 2021 दिनांक 28 मार्च 2021के खंड 112 के अन्तर्गत सुलझा लिया गया। अधिसूचना संख्या 16/2021-केन्द्रीय कर दिनांक 1 जून 2021

फिर भी, यह देखा जा रहा है ।कि कर अधिकारी, हाल ही में जारी किए गए अधिकांश नोटिसों में, आईटीसी  पर भी ब्याज की मांग कर रहे हैं,। जो कि खंड 112 के अंतर्गत ब्याज के प्रभार को नियंत्रित करने वाले विधि के प्रावधानों के विशेष पूर्वव्यापी संशोधन का पूर्ण उल्लंघन है। वित्त अधिनियम , 2021 दिनांक  28 मार्च 2021अधिसूचना संख्या के माध्यम से अधिसूचित किया गया। अधिसूचना संख्या 16/2021-केन्द्रीय कर दिनांक 1 जून 2021, जिसने जीएसटी परिषद की बैठकों की सिफारिशों और समय-समय पर CBIC द्वारा जारी स्पष्टीकरणों को लागू किया। अधिकांश नोटिस/आदेशों में, नियम 88 B के साथ सपठित धारा 50 के प्रावधानों की गलत व्याख्या की जाती है,। जिसके परिणामस्वरूप बिना किसी विधि के अंतर्गत  मनमाने ढंग से ब्याज की मांग की जाती है। इससे कर योग्य व्यक्तियों को उनकी व्यावसायिक कार्यशील पूंजी(working capital)पर अवैध दावे के कारण वास्तविक कठिनाई हो रही है ।और उन्हें अनावश्यक रूप से वाद विवाद में में धकेल दिया गया है।

लेखक का सुझाव

वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017 के अंतर्गत कर योग्य व्यक्तियों को सलाह दी जाती है ।कि वे हाल ही में मैकेनिकल रूप से जारी किए गए कारण बताओ नोटिस के माध्यम से ब्याज की किसी भी अवैध मांग का दृढ़ता से विरोध करें। लेख में उल्लेखित अधिसूचनाओं  का संदर्भ ग्रहण करते हुए। अपने वाद में उनका उल्लेख किया जाना अत्यंत आवश्यक है। जैसे मूलधन से अधिक ब्याज का होना एक गलत सिद्धांत है। तथा जो ब्याज 1 जुलाई 2017 से प्रभावी नहीं था। उसे वित्तीय वर्ष 2017-18 में क्यों मांग की जा रही है? जो आईटीसी के रूप में कर है उसे पर ब्याज क्यों? इस पर विचार किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

यह लेखक के निजी विचार हैं।

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