जब 1 जुलाई 2017 को GST लागू हुआ था, तब इसे देश की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में एक ऐतिहासिक सुधार बताया गया था। इसका सबसे आकर्षक वादा था—व्यापार की पूरी श्रृंखला में Input Tax Credit अर्थात ITC का निर्बाध प्रवाह। कहा गया था कि एक व्यापारी द्वारा चुकाया गया GST अगले व्यापारी को क्रेडिट के रूप में मिलेगा और कर के ऊपर कर लगने की पुरानी समस्या समाप्त हो जाएगी।
लेकिन GST लागू होने के बाद पिछले लगभग नौ वर्षों का अनुभव बताता है कि ITC का यह सपना पूरी तरह साकार नहीं हो पाया। इसके विपरीत, ITC ही GST व्यवस्था में सबसे अधिक विवाद, नोटिस, ब्याज, कर मांग और मुकदमेबाजी का कारण बन गई।
इस पूरी समस्या का सबसे दुखद पक्ष यह रहा कि कई बार एक ईमानदार खरीदार को उस गलती की सजा दी गई, जो उसने की ही नहीं थी।
खरीदार ने सब कुछ किया, फिर भी ITC संकट में
एक सामान्य व्यापारिक व्यवहार को समझिए।
खरीदार ने किसी GST में पंजीकृत विक्रेता से माल या सेवा खरीदी। उसने सही टैक्स इनवॉइस प्राप्त किया, माल या सेवा ली, अपने खातों में खरीद दर्ज की और विक्रेता को माल की कीमत के साथ GST का भी पूरा भुगतान कर दिया।
विक्रेता का GST रजिस्ट्रेशन सरकार ने जारी किया था। खरीदार के पास उसके रजिस्ट्रेशन की सत्यता जांचने के लिए GST पोर्टल उपलब्ध था। खरीदार ने उपलब्ध साधनों के आधार पर पूरी सावधानी रखी।
इसके बाद विक्रेता की जिम्मेदारी थी कि वह इनवॉइस को अपने रिटर्न में दिखाए और खरीदार से प्राप्त GST सरकार के पास जमा करे।
लेकिन यदि विक्रेता ने टैक्स जमा नहीं किया, गलत रिटर्न भर दिया, रिटर्न भरने में देरी की अथवा उसका GST रजिस्ट्रेशन बाद में पिछली तारीख से रद्द कर दिया गया, तो विभाग ने कई मामलों में खरीदार की ITC रोक दी।अर्थात माल खरीदार ने लिया, टैक्स विक्रेता को दिया और गलती भी विक्रेता ने की, लेकिन टैक्स की वसूली दोबारा खरीदार से की गई।
यह स्थिति प्रारंभ से ही न्यायपूर्ण नहीं थी।
क्या खरीदार विक्रेता को टैक्स जमा करने के लिए मजबूर कर सकता है?
GST व्यवस्था में वर्षों से यह माना जाता रहा है कि खरीददार की ITC तभी सुरक्षित होगी, जब विक्रेता संबंधित टैक्स सरकार के पास जमा करेगा।
लेकिन यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—क्या खरीददार के पास विक्रेता को टैक्स जमा करने के लिए मजबूर करने की कोई कानूनी या व्यावहारिक शक्ति है?
इसका उत्तर है—नहीं।
खरीदार विक्रेता से यह पूछ सकता है कि उसने रिटर्न भरा है या नहीं। वह उसे फोन कर सकता है, ईमेल भेज सकता है अथवा भुगतान रोकने की चेतावनी दे सकता है। लेकिन यदि खरीदार पहले ही पूरा भुगतान कर चुका है, तो उसके पास बहुत सीमित विकल्प रह जाते हैं।
खरीददार यह भी नहीं देख सकता कि विक्रेता ने अपने GSTR-3B में उस विशेष इनवॉइस का टैक्स वास्तव में जमा किया है या नहीं। GSTR-2B में इनवॉइस दिखाई देने से यह पता चलता है कि विक्रेता ने विवरण अपलोड किया है,लेकिन इससे हमेशा यह निश्चित नहीं होता कि उस इनवॉइस का टैक्स सरकार के पास पहुंच गया है।
दूसरी ओर सरकार के पास विक्रेता का रजिस्ट्रेशन विवरण, रिटर्न, ई-इनवॉइस, ई-वे बिल, इलेक्ट्रॉनिक लेजर, बैंक खाते और कारोबार से जुड़ी अनेक जानकारियां होती हैं। टैक्स नहीं जमा करने वाले विक्रेता से वसूली करने की कानूनी शक्तियां भी सरकार के पास हैं फिर भी कई मामलों में वास्तविक डिफॉल्टर से टैक्स वसूल करने के बजाय खरीदार की ITC रोकना आसान रास्ता माना गया।
GST में खरीददार के अधिकारों के प्रति संवेदनहीनता
GST को व्यवहार में बहुत अधिक विक्रेता-आधारित कर बना दिया गया है।
खरीदार की ITC इस बात पर निर्भर करती है कि विक्रेता इनवॉइस सही समय पर अपलोड करता है या नहीं, रिटर्न भरता है या नहीं, टैक्स जमा करता है या नहीं और उसका रजिस्ट्रेशन भविष्य में वैध बना रहता है या नहीं।
इन सभी परिस्थितियों पर खरीदार का कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं होता।
इसके बावजूद खरीदार से यह अपेक्षा की गई कि वह केवल अपने व्यापार और खातों की ही नहीं, बल्कि अपने प्रत्येक सप्लायर के टैक्स व्यवहार की भी निगरानी करे।
बड़े कारोबार में एक व्यापारी के सैकड़ों या हजारों सप्लायर हो सकते हैं। क्या वह हर महीने प्रत्येक सप्लायर का टैक्स भुगतान जांच सकता है? क्या वह प्रत्येक इनवॉइस के बदले यह प्रमाणपत्र ले सकता है कि संबंधित टैक्स सरकार को जमा हो गया है? और यदि सप्लायर ऐसा प्रमाणपत्र दे भी दे, तो खरीदार उसकी सच्चाई की स्वतंत्र पुष्टि कैसे करेगा?
व्यवहार में यह जिम्मेदारी निभाना लगभग असंभव है।
एक कर व्यवस्था तभी न्यायपूर्ण मानी जा सकती है, जब वह किसी व्यक्ति को केवल उन्हीं कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहराए, जो उसके नियंत्रण में हों। विक्रेता द्वारा सरकार को टैक्स जमा करना खरीदार के नियंत्रण में नहीं है। इसलिए विक्रेता की गलती के लिए खरीदार को दंडित करना मूलभूत न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है।
वर्षों से चली आ रही कठिनाई
इस समस्या ने हजारों व्यापारियों को प्रभावित किया है।
कई ईमानदार खरीददारों को वर्षों बाद नोटिस मिले कि उनके सप्लायर ने टैक्स जमा नहीं किया, उसका रजिस्ट्रेशन पिछली तारीख से रद्द हो गया अथवा वह अपने पते पर उपलब्ध नहीं है। इसके आधार पर खरीदार से ITC वापस मांगी गई। ITC के साथ ब्याज भी मांगा गया और कुछ मामलों में जुर्माने की कार्यवाही भी प्रारंभ कर दी गई।
खरीददार के सामने दो ही रास्ते बचे—या तो वह टैक्स दोबारा जमा करे अथवा वर्षों तक अपील और मुकदमेबाजी में फंसा रहे। इससे व्यापारियों की कार्यशील पूंजी प्रभावित हुई। वास्तविक व्यापारिक लेन-देन को प्रमाणित करने के लिए उन्हें इनवॉइस, बैंक भुगतान, परिवहन दस्तावेज, स्टॉक रजिस्टर, ई-वे बिल और सप्लायर से पत्र जैसे अनेक प्रमाण देने पड़े। इसके बावजूद कई बार केवल इस आधार पर राहत नहीं मिली कि विक्रेता ने सरकार को टैक्स जमा नहीं किया था।
अब सामने आया राहत का प्रस्ताव
अब हाल में एक सकारात्मक खबर सामने आई है।
बताया जा रहा है कि GST व्यवस्था में ऐसा बदलाव करने पर विचार किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत वास्तविक और ईमानदार खरीदार की ITC केवल इसलिए नहीं रोकी जाएगी कि संबंधित विक्रेता ने टैक्स सरकार के पास जमा नहीं किया।
प्रस्ताव के अनुसार यदि संबंधित इनवॉइस खरीददार की GSTR-2B में दिखाई दे रही है और खरीदार यह प्रमाणित कर देता है कि उसने विक्रेता को माल या सेवा की कीमत के साथ GST का भी पूरा भुगतान कर दिया है, तो उसकी ITC सुरक्षित रखी जा सकती है।
ऐसी स्थिति में टैक्स की वसूली उस विक्रेता से की जाएगी, जिसने खरीददार से GST प्राप्त करने के बाद भी उसे सरकार के पास जमा नहीं किया।
यह प्रस्ताव निश्चित रूप से स्वागत योग्य है।
यह पहली बार इस मूल प्रश्न को स्वीकार करता हुआ दिखाई देता है कि ईमानदार खरीददार को विक्रेता की गलती के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
सपना अच्छा है, लेकिन अभी केवल प्रस्ताव है
यह राहत अभी कानून नहीं बनी है। इसलिए व्यापारियों को यह समझना होगा कि फिलहाल मौजूदा कानूनी व्यवस्था ही लागू है।
समाचारों में किसी प्रस्ताव का सामने आना और उसका कानून बन जाना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। प्रस्ताव पर आगे विचार होगा, GST Council के स्तर पर निर्णय लिया जाएगा और उसके बाद आवश्यकता के अनुसार कानून, नियम, अधिसूचना या प्रक्रिया में बदलाव करना होगा और कितनी राहत मिलेगी यह भी इस प्रस्ताव को वास्तविक कानून बनने के बाद ही पता लगेगा.
इसलिए इस खबर से उम्मीद अवश्य जागी है, लेकिन अभी इसे लागू राहत नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि इस विषय में तीन शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं—सपना, प्रस्ताव और संभावना।
सपना यह है कि ईमानदार खरीदार की ITC सुरक्षित हो।
प्रस्ताव यह है कि GSTR-2B और विक्रेता को किए गए वास्तविक भुगतान के आधार पर खरीददार को राहत दी जाए।
और संभावना यह है कि आने वाले समय में GST कानून अधिक न्यायपूर्ण और खरीदार के अधिकारों के प्रति संवेदनशील बने।
फर्जी ITC और वास्तविक खरीद में अंतर जरूरी
सरकार की एक वास्तविक चिंता फर्जी बिल और बिना माल या सेवा की प्राप्ति के ITC लेने की है। ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन फर्जी ITC लेने वाले व्यक्ति और वास्तविक खरीददार को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।
यदि खरीदार के पास टैक्स इनवॉइस है, माल की वास्तविक प्राप्ति है, ई-वे बिल है, भुगतान बैंक के माध्यम से हुआ है, खरीद खातों में दर्ज है और इनवॉइस GSTR-2B में दिखाई दे रही है, तो ऐसे मामले को केवल विक्रेता की गलती के कारण फर्जी नहीं माना जाना चाहिए।
कानून को जांच की उचित व्यवस्था बनानी चाहिए, लेकिन जांच का उद्देश्य वास्तविक लेन-देन की पहचान करना होना चाहिए, न कि प्रत्येक खरीददार को संदेह की दृष्टि से देखना।
कुछ लोगों द्वारा कानून का दुरुपयोग किए जाने के आधार पर सभी ईमानदार करदाताओं को दंडित करना न्यायसंगत नहीं है।
पुराने मामलों का क्या होगा?
इस प्रस्ताव से जुड़ा सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यह कानून बनता है, तो क्या इसका लाभ केवल भविष्य के मामलों में मिलेगा या पुराने लंबित विवादों में भी?
वर्ष 2017 से अब तक बड़ी संख्या में खरीदार इस समस्या के कारण नोटिस, कर मांग और अपीलों में उलझे हुए हैं। कई व्यापारियों ने दबाव में ITC वापस कर दी। कई मामलों में खरीदार ने पहले विक्रेता को GST दिया और बाद में वही राशि सरकार को भी चुकाई।
यदि नई व्यवस्था केवल भविष्य की तारीख से लागू होती है, तो पुराने वास्तविक खरीददारों के साथ हुआ अन्याय बना रहेगा।
सरकार को ऐसे मामलों के लिए भी समाधान पर विचार करना चाहिए, जहां वास्तविक खरीद, माल या सेवा की प्राप्ति, टैक्स इनवॉइस और बैंक भुगतान के प्रमाण उपलब्ध हैं।
पुराने लंबित मामलों को समाप्त करने के लिए स्पष्ट और सरल व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। अन्यथा नई राहत आने के बाद भी वर्षों पुराने विवाद अदालतों और अपीलों में चलते रहेंगे।
स्पष्ट प्रक्रिया भी आवश्यक
केवल कानून में एक सामान्य राहत लिख देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्पष्ट प्रक्रिया भी बनानी होगी।
यह बताया जाना चाहिए कि खरीददार को कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। क्या केवल GSTR-2B और बैंक भुगतान पर्याप्त होगा अथवा माल की प्राप्ति, परिवहन दस्तावेज और स्टॉक रिकॉर्ड भी देना होगा? यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि खरीददार से ITC मांगने से पहले विभाग को विक्रेता के विरुद्ध क्या कार्रवाई करनी होगी। यह एक स्वचालित प्रक्रिया के अधीन होना चाहिए जिसमें मानव हस्तक्षेप और विवेकाधिकार कम से कम हो.
यदि बाद में विक्रेता से टैक्स वसूल हो जाता है, तो खरीददार से पहले वसूल की गई राशि और ब्याज का क्या होगा? बिना स्पष्ट प्रक्रिया के एक अच्छा प्रस्ताव भी नए विवादों का कारण बन सकता है।
उम्मीद की एक नई शुरुआत
GST एक तकनीक आधारित कर व्यवस्था है। सरकार के पास टैक्स डिफॉल्ट करने वाले विक्रेता को पहचानने और उससे वसूली करने के लिए पर्याप्त सूचनाएं तथा कानूनी शक्तियां हैं।
खरीददार से उचित सावधानी की अपेक्षा की जा सकती है। उसे सही GST रजिस्ट्रेशन वाले व्यक्ति से खरीद करनी चाहिए, टैक्स इनवॉइस लेना चाहिए, माल या सेवा की प्राप्ति का प्रमाण रखना चाहिए, बैंक के माध्यम से भुगतान करना चाहिए और अपने रिटर्न समय पर भरने चाहिए। खरीददार का खुद का व्यवहार भी संदेह के परे होना चाहिए और उसके द्वारा कानून का पूरा पालन किया जाना चाहिए व्यवहार से भी और भावना से भी.
लेकिन खरीददार को सप्लायर का निजी टैक्स अधिकारी नहीं बनाया जा सकता। ईमानदार खरीदार को विक्रेता की गलती की सजा नहीं मिलनी चाहिए। यह कोई विशेष रियायत नहीं, बल्कि साधारण न्याय की मांग है।
आइए उम्मीद करें कि यह प्रस्ताव केवल समाचारों तक सीमित नहीं रहेगा और शीघ्र ही कानून का रूप लेगा। साथ ही इसका लाभ उन पुराने वास्तविक मामलों को भी मिलेगा, जिनमें खरीदार वर्षों से बिना अपनी गलती के संघर्ष कर रहे हैं।
जिस दिन GST व्यवस्था यह स्वीकार कर लेगी कि वास्तविक खरीदार की ITC किसी दूसरे व्यक्ति की गलती के कारण नहीं छीनी जा सकती, उस दिन निर्बाध ITC का सपना वास्तव में साकार होने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
आइये जीएसटी के एक बड़े सुधार के लिए उम्मीद करें.

