देश के निर्माण एवं विकास में प्रत्येक वर्ग और नागरिक की बराबर का भागीदारी और दायित्व रहता है। देश के विकास में वैज्ञानिक नये-नये अविष्कार करते हैं, मैकेनिकल एवं सिविल अभियंतागण देश के बुनियादी ढांचा खड़ा करते हैं, लेकिन इन सब विकास मंे सबसे महत्वपूर्ण भागीदारी निभाता है देश का ‘करदाता’ और ‘टैक्स एडवोकेट’। क्योंकि जब तक सरकार को राजस्व के रुप में टैक्स नहीं मिलेगा तब तक कोई विकास की बात करना बेमानी ही कही जाएगी।

लेकिन हमारे देश में दोनों ही वर्ग प्रताड़ित और शोषण के पात्र बन चुके हैं। करदाता, इसलिए कि देश का ‘करदाता’ प्रत्यक्ष और ‘अप्रत्यक्ष कर’ का भुगतान कर देश के आर्थिक विकास करता है और ‘टैक्स एडवोकेट’ करदाता को अधिक से अधिक टैक्स जमा करने के लिए प्रेरित करता है। अब आप कह सकते हैं कि देश में न्याय और सामाजिक समानता के लिए सभी प्रकार के अधिवक्ता काम करता है कि लेकिन विचार कर स्वीकारना ही होगा कि केवल ‘टैक्स एडवोकेट’ अपने पे्रक्टिस में करदाता के खातों को संवारना और उनको टैक्स को सरकारी खजाने में जमा करने के लिए प्रेरित करता है।

अब आप प्रश्न करेंगे कि करदाता के साथ टैक्स एडवोकेट का उत्पीड़न कैसे हो रहा है। तो हम यही कहेंगे कि देश सभी दिशा में तेजी से प्रगति कर रहा है। देश की इस प्रगति में सबसे महत्वपूर्ण ‘भाग’ है कि ‘सूचना प्रौद्योगिकी तकनीकी’ का। क्योंकि आज देश का प्रत्येक विभाग और मंत्रालय प्रौद्योगिक तकनीकी आधारित कम्प्यूटराईजेश की ओर तेजी से काम करते हुए अपने आप को व्यवस्थित कर रहा है,जिसके चलते आम जनता सीधे घर बैठे विभाग के कार्यो का लाभ प्राप्त कर रहा है।

इसी प्रकार केन्द्र और राज्यों सरकारों के राजस्व विभाग भी अपने विभाग को कार्यो के साथ ‘राजस्व संग्रह’ में अपने कार्यो को ‘कम्प्यूटर बेस’ का मजबूत तंत्र के रुप में विकसित कर रहा है। और जनता स्वीकार भी कर रही है। आपको याद होगा कि आज से लगभग 10-15 वर्ष पूर्व प्रत्यक्ष कर यानि ‘आयकर’ के सभी रिटर्न मैन्यूअल ही दाखिल किये जाते थे और दाखिल रिटर्नो में होने वाले रिफंड भी मैन्युअल ही चैक द्वारा प्राप्त होते थे। लेकिन जैसे-जैसे आयकर विभाग ने सूचना प्रौद्योगिकी तकनीकी को अपनाया तो आयकरदाता धीरे-धीरे अपने रिटर्न मैन्युअली के साथ ‘ई-रिटर्न’ की ओर आकर्षित हुए। और आज यदि विभाग का आंकलन करेंगे तो मैन्युअली रिटर्न नगण्य संख्या में दाखिल हो रहे हैं जबकि अच्छी संख्या में ‘ई-रिटर्न’ सशक्त माध्यम बन चुका है। इसी प्रकार अब करदाता को घर बैठे ‘रिफंड’ भी सीधे उसके बैंक खाते में प्राप्त हो रहे हैं।

इसी क्रम में आगे चलेंगे तो राज्य और केन्द्र सरकार के राजस्व मंत्रालय के अन्तर्गत सेन्ट्रल एक्साइज, कस्टम और सेवाकर के रिटर्न भी आॅनलाईन दाखिल होने लगे। और 1 जुलाई 2017 से सेन्ट्रल एक्साइज और सेवाकर को समाहित करते हुए अप्रत्यक्ष कर प्रणाली ‘जीएसटी’ तो बिल्कुल ही ‘सूचना प्रौद्योगिकी तकनीकी’ पर आधरित होते हुए सभी प्रकार काम जैसे टैक्स जमा करना, रिटर्न दाखिल करना, पंजीकृत डीलर के विवरण में कोई संशोधन होना, सभी कार्य विभाग द्वारा प्रस्तुत वेबसाइट पर होने लगे।

इस नयी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का नाम दिया गया ‘वस्तु एवं सेवाकर’ और छोटा नाम ‘जीएसटी’। प्रारम्भ से ही जीएसटी को ‘कम्प्यूटराईजेशन बेस’ बनाया गया। लेकिन जब से देश में जीएसटी लागू हुआ तो आधे-अधूरे तैयारी के साथ लागू हुआ, फिर भी देश के करदाता ने दिल से स्वागत किया। लेकिन धीरे-धीरे समय व्यतीत होता रहा जीएसटी के कम्प्यूटर बेस वेबसाइट, जिसको नाम दिया गया ‘जीएसटीएन’ ने आज तक भी भरपूर मन से साथ देने का मन नहीं बना सका। इसके पीछे हम दोष ‘कम्प्यूटर’ को नहीं दे सकते बल्कि संचालनकत्र्ता सरकार को ही दे सकते हैं क्यांेकि इस वेबसाईट ‘जीएसटीएन’ के संचालन के लिए सरकार ने एक परिषद का गठन किया और नाम दिया ‘जीएसटी परिषद’ लेकिन दुःख स्थिति यह हो रही है कि इस ‘जीएसटीएन’ से करदाता और टैक्स एडवोकेट दोनों ही उत्पीड़न के पात्र बन चुके हैं। और सरकार के साथ सरकारी मशीनरी यह स्वीकार करने के लिए राजी नहीं है कि वह इस व्यवस्था में ‘असफल’ हो चुके हैं।

स्थिति यहां तक आ चुकी है कि एक पक्ष करदाता और उसका प्रतिनिधि एडवोकेट से कोई त्रुटि हो जाती है तो वह पूर्णतया दोषी है लेकिन यदि सरकार से या सरकारी विभाग से कोई त्रुटि हो जाये तो वह ‘तकनीकी एरर’ है सुधार लिया जाएगा।

हमको अच्छी तरह याद है कि 26 जून 2017 को तत्कालीन वित्त मंत्री ;अब स्वर्गीयद्धअरुण जेटली को जीएसटी लागू होने से पूर्व न्यूज चैनल पर साक्षात्कार आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि जीएसटी रिटर्न कोई मुश्किल नहीं है बल्कि केवल ‘जीएसटीआर-1’ को, जिसमंे आउटवर्ड सप्लाई को भरना है और ‘जीएसटीआर-2’ में सप्लाई प्राप्तकत्र्ता द्वारा उसको चेक करना तत्पश्चात आपका ‘जीएसटीआर-3’ स्वतः ही टैक्स की गणना करते हुए तैयार हो जाएगा और देयकर को जमा करते हुए, सभी काम पूरा करने हैं। लेकिन भाई! वह साक्षात्कार तो आधा- अधूरा कहें या ‘दिवास्वप्न’, आज तक पूरा नहीं हुआ।

हां! ‘जीएसटीआर-1’ तो भरा जाने लगा लेकिन आजतक  ‘जीएसटीआर-2’ को कोई अता-पता नहीं केवल दर्शन करने मात्र के लिए सरकारी मशीनरी ने मेहरबानी कर दी और ‘जीएसटीआर-2’ के स्थान पर ‘जीएसटीआर-2ए’ दे दिया या कहें तो झुनझुना कहें तो गलत नहीं होगा क्योंकि ‘आर-2ए’ के आप दर्शनमात्र कर सकते हैं न तो कोई संशोधन और न ही कोई एडीट या एडीशन कर सकेंगे। और देखें सरकारी मशीनरी ने अपनी ‘असफलता’ को छिपाने के लिए सुधार करना तो सीखा ही नहीं है बल्कि नित नये नियम 16;4द्ध और 36;4द्ध तैयार कर लागू कर दिये कि ‘आप भारत में व्यापार कर रहे हैं तो सबसे बड़ा दोषी आप ही हैं और आपको इसी कृत्य के लिए दोषी पाते हुए ब्याज, अर्थदंड और कारावास का भी भागीदार बनना पड़ जाएगा।’ इसलिए हमारे मन में यही विचार आता है ‘कि खून करना छोटा अपराध है लेकिन व्यापार करना बड़ा अपराध’। क्योंकि व्यापारी अपने पूंजी लगाकर, धूल-पसीने को बहाकर सरकार के लिए टैक्स वसूल करे लेकिन इस काम के लिए उसको प्रताड़ित भी होना चाहिए। रही बात ‘टैक्स एडवोकेट’ की तो उसका दोष यही है कि वह सरकार के लिए टैक्स के रुप में राजस्व बढ़ा रहा है तो वह भी दोषी होना चाहिए इसलिए पोर्टल पर काम करोगे तो ‘ढेर सारी टेंशन’ तो होनी ही चाहिए ताकि चैन से कैसे जीवन बिताये! और ‘ळ घर-ै सुख-ज् त्याग करना होगा!

आप देखें, मजाक कहें या क्रूर मजाक। जीएसटी परिषद ने निर्णय किया कि वर्ष 2017-18 के दौरान यदि उसका कुल वार्षिक टर्नओवर 2 करोड़ रुपये कम है तो वह चाहे तो वर्षिक रिटर्न दाखिल करें या नहीं, यह करदाता की मर्जी है, कोई कार्यवाही नहीं होगी, बड़ी मेहरबानी, लेकिन जब वर्ष 2018-19 का दाखिल करोगे तो वर्ष 2017-18 का वार्षिक रिटर्न दाखिल न करने के लिए लेट फीस तो भरनी होगी, नियम तो बनता है।

और, क्या-क्या लिखें, क्या-क्या कहें, जनाब! बड़े धोखे हैं इस ;जीएसटीद्ध की राह में….!!

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