अभिव्यक्ति (expression) “माल या सेवाओं की निर्यात के दौरान सप्लाई” में तीन चीजें महत्वपूर्ण हैं। ये तीन चीजें  निम्नप्रकार हैं:–

(1) माल या सेवाओं की सप्लाई;

(2) माल या सेवाओं का निर्यात; और

(3) निर्यात के दौरान सप्लाई।

माल या सेवाओं की सप्लाई में माल या सेवाओं का आपूर्तिकर्ता किसी मूल्यवान प्रतिफल के किये किसी दूसरे व्यक्ति को माल या सेवाओं की आपूर्ति करता है।  निर्यात शब्द एक से अधिक अर्थों में जाना जाता है।  साधारणतः इस शब्द का आशय माल या सेवाओं का किसी देश से उस देश के बाहर किसी स्थान पर भेजने या ले जाने से होता है। व्यापार या वाणिज्य (trade or commerce) के सन्दर्भ में माल के निर्यात का आशय माल का एक देश से दूसरे देश को भेजने या जाने से होता है। जिस देश से माल भेजा जाता है वह कंट्री ऑफ़ ओरिजिन (Country of origin) कहलाता है, तथा माल जिस देश को भेजा जाता है वह कंट्री ऑफ़ डेस्टिनेशन (country of destination) कहलाता है। माल का व्यापार या वाणिज्य से संबंधित निर्यात गंतव्य देश में माल के आयात के साथ समाप्त होता है। इस दॄष्टि से निर्यात तथा आयात को एक दूसरे का पूरक कहा जा सकता है।

भारत के राज्यक्षेत्र (territory of India) से माल के निर्यात के दौरान होने वाली माल की बिक्री के सन्दर्भ में माननीय उच्चतम न्यायालय के पांच माननीय न्यायाधीशों की पीठ द्वारा Burmah Shell Oil Storage And Distributing Company of India Limited & Another vs Commercial Tax Officer And Others, Judgment dated: September 27, 1960 में “sale of goods in the course of the export of the goods out of the territory of India” के अंतर्गत होने वाले निर्यात के सन्दर्भ में निम्नलिखित मत व्यक्त किया गया है :–

“In the earlier cases, it was not necessary to explain the meaning of the word “export”, because there was always a foreign buyer to whom the goods were ultimately sent. In none of the cases the facts found here were present. Here, the buyer does not export the goods to a foreign country, but purchases them for his own use on the journey of the aircraft to foreign countries. This difference is vital, and makes the position of the appellant-companies, if anything, weaker. It is for this reason that the appellant-companies depend on a wide meaning of the word “export”, which they illustrate from other Acts where the word is tantamount to “taking out of the country”. We are of opinion that this meaning cannot be given to the word “export” in the clause. The word “export” may conceivably be used in more senses than one. In one sense, “export” may mean sending or taking out of the country, but in another sense, it may mean sending goods from one country to another. Often, the latter involves a commercial transaction but not necessarily. The country to which the goods are thus sent is said to import them, and the words “export” and “import” in this sense are complementary. An illustration will express this difference vividly. Goods cannot be said to be exported if they are ordered by the health authorities to be destroyed by dumping them in the sea, and for that purpose are taken out of the territories of India and beyond the territorial waters and dumped in the open sea. Conversely, goods put on board a steamer bound for a foreign country but jettisoned can still be said to have been “exported”, even though they do not reach their destination. In the one case, there is no export, and in the other, there is, though in either case the goods go to the bottom of the sea. The first would not be within the exemption even if a sale was involved, while any sale in the course of the second taking out would be. In both, the goods were taken out of the country. The difference lies in the fact that whereas the goods, in the first example, had no foreign destination, the goods, in the second example, had. It means, therefore, that while all exports involve a taking out of the country, all goods taken out of the country cannot be said to be exported. The test is that the goods must have a foreign destination where they can be said to be imported. It matters not that there is no valuable consideration from the receiver at the destination end. If the goods are exported and there is sale or purchase in the course of that export and the sale or purchase occasions the export to a foreign destination, the exemption is earned. Purchases made by philanthropists of goods in the course of export to foreign countries to alleviate distress there, may still be exempted, even though the sending of the goods was not a commercial venture but a charitable one. The crucial fact is the sending of the goods to a foreign destination where they would be received as imports. The two notions of export and import, thus, go in pairs.”

माल या सेवाओं की निर्यात के दौरान सप्लाई पर विचार करने पर हम पाते हैं कि यह या तो ऐसी सप्लाई है जो निर्यात के बिना पूरी नहीं हो सकती या यह माल या सेवाओं का ऐसा निर्यात है जिसके बीच में माल या सेवाओं की  सप्लाई  होती है। कहने का तात्पर्य यह है माल या सेवाओं की निर्यात के दौरान होने वाली सप्लाई ऐसी सप्लाई है जिसके अनुबंध में माल या सेवाओं के निर्यात की शर्त निहित है जिसकी अनुपस्थिति में सप्लाई पूरी नहीं हो सकती, अथवा  माल या सेवाओं की निर्यात के दौरान होने वाली सप्लाई ऐसी सप्लाई है जो निर्यातक देश से माल या सेवाओं की निर्यात यात्रा प्रारम्भ होने और गंतव्य देश में ऐसी यात्रा समाप्त होने के बीच के समय में होती है। ऐसी सप्लाई माल के हक़ दस्तावेजों के अंतरण के माध्यम से की जाती है।

माल या सेवाओं की निर्यात के दौरान होने वाली सप्लाई में माल या सेवाओं की सप्लाई की गतिविधि और निर्यात की गतिविधि, दोनों मिलकर सप्लाई के एकल संव्यवहार की रचना करतीं है। माल या सेवाओं या दोनों की आपूर्ति निर्यात के दौरान होने के मामले में, माल या सेवाओं की आपूर्ति की गतिविधि और माल या सेवाओं के निर्यात की गतिविधि, दोनों क्रियाएं एक-दूसरे से इतनी घनिष्ठता से जुड़ीं है कि उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। दोनों क्रियाएं माल या सेवाओं के निर्यात के दौरान होने वाली आपूर्ति का एकल संव्यवहार (single transaction) बनाती हैं। दोनों क्रियाओं को अटूट रूप से जुड़ा हुआ (inextricably linked) कहा जाता है।

माननीय उच्चतम न्यायलय द्वारा State of Travancore-Cochin and Others v. The Bombay Co. Ltd. निर्णय दिनांक अक्टूबर 16, 1952 मामले में माल की निर्यात के दौरान बिक्री  (sale of goods in the course of export of goods) के मामले में शब्दों “in the course of (निर्यात के दौरान) ” के संभावित अर्थ पर विचार किया गया था।  इस संबंध में माननीय न्यायालय ने निम्नलिखित मत व्यक्त किया था:–

“A sale by export thus involves a series of integrated activities commencing from the agreement of sale with a foreign buyer and ending with the delivery of the goods to a common carrier for transport out of the country by land or sea. Such a sale cannot be dissociated from the export without which it cannot be effectuated, and the sale and resultant export form parts of a single transaction. Of these two integrated activities, which together constitute an export sale, whichever first occurs can well be regarded as taking place in the course of the other.”

माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने द्वारा व्यक्त किये गए उपर्युक्त प्रेक्षणों (observations) की व्याख्या, State of Travancore-Cochin and Others v. Shanmugha Vilas Cashew-nut Factory and Others, judgment dated May 08, 1953 में, करते हुए निम्नलिखित मत व्यक्त किया है:–

“The phrase “integrated activities’ was used in the previous decision to denote that ‘such sale’ (i.e. a sale which occasions the export) ‘cannot be dissociated from the export without which it cannot be effectuated, and the sale and the resultant export form parts of a single transaction’. It is in that sense that the two activities – the sale and the export – were said to be integrated. A purchase for the purpose of export like production or manufacture for export, is only an act preparatory to export and cannot, in our opinion, be regarded as an act done ‘in the course of the export of the goods out of the territory of India’ any more than the other two activities can be so regarded.”

 माननीय उच्चतम न्यायलय के उपर्युक्त मत से यह भी स्पष्ट है कि निर्यात के उद्देश्य से किये गए  माल के  निर्माण या उत्पादन की गतिविधि, और उत्पादित या निर्मित माल का निर्यात, अथवा उत्पादित या निर्मित माल की निर्यात के दौरान बिक्री दो अलग-अलग गतिविधियां हैं। मेरे विचार से इसी कारण से केंद्रीय आबकारी अधिनियम में निर्यात किये जाने वाले माल के निर्माण या उत्पादन पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी से छूट सशर्त दी जाती है।  सेन्ट्रल एक्साइज ड्यूटी की टैक्सेबल इवेंट (taxable event) निर्मित माल के अनुमोदित परिसर से माल बाहर निकलने से समय समाप्त हो जाती है।  इसका सम्बन्ध माल के निर्यात करने से नहीं होता है।  किन्तु बिक्री कर या जीएसटी में माल के निर्माण या उत्पादन पर कोई कर नहीं होता है।  सप्लाई और निर्यात मिलकर एक संव्यवहार (single transaction)  “निर्यात के दौरान माल या सेवाओं की सप्लाई” का बनाते हैं। केवल माल के निर्यात की गतिविधि (activy of export of goods) माल की बिक्री या माल की आपूर्ति नहीं है।

माल या सेवाओं की निर्यात के दौरान होने वाली सप्लाई में ऊपर उल्लिखित तीन चीजों के अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण चीज यह भी होती है कि माल या सेवाओं का निर्यात किस देश के अंदर से किया जा रहा है। भारत से होने वाला निर्यात भारत के राज्यक्षेत्र के अंदर से किया जाता है।

माल की बिक्री भी माल की सप्लाई है।  निर्यात के दौरान होने वाली माल की बिक्री, निर्यातक द्वारा, निर्यात प्रारम्भ होने के बाद और निर्यात समाप्त होने से पूर्व, माल के हक़ दस्ताबेजों के अंतरण (transfer of documents of title to goods) से भी की जा सकती है।  ऐसी स्थिति में निर्यातक माल के हक़ दस्ताबेज, यथा शिपिंग डॉक्यूमेंट, अपने नाम में प्राप्त करता है और जब माल के निर्यात की अनुमति कस्टम विभाग से मिल जाती है, निर्यातक माल के हक़ दस्ताबेज आयातकर्ता अथवा उसके प्रतिनिधि के पक्ष में इंडोर्स कर उसे हस्तगत करा देता है। इस प्रकार भारत राज्य क्षेत्र से माल या सेवाओं की निर्यात के दौरान होने वाली सप्लाई के बारे कहा जा सकता है कि▬

(i) यह माल या सेवाओं की सप्लाई है,

(ii) यह माल या सेवाओं के निर्यात के दौरान होने वाली सप्लाई है;

(iii) सप्लाई के अंतर्गत माल या सेवाएं भारत राज्यक्षेत्र से अन्य देश के लिए निर्यात होते हैं।

ऐसी सप्लाई के लिए अभिव्यक्ति (expression) “supply of goods or services or both in the course of the export of the goods or services or both out of the territory of India” का प्रयोग किया का सकता है। संविधान के 101बें संशोधन द्वारा संविधान का अनुच्छेद 286 माल या सेवाओं या दोनों की सप्लाई पर लागू हुआ है।  पूर्व में यह अनुच्छेद माल के क्रय या विक्रय पर लागू था।  वर्तमान में  अनुच्छेद  286  के खंड (1) का उपखण्ड (ख) निम्नप्रकार है :-

“286. (1) No law of a State shall impose, or authorise the imposition of, a tax on the supply of goods or of services or both, where such supply takes  place—

(a) ***

(b) in the course of the import of the goods or services or both into, or export of the goods or services or both out of, the territory of India.”

माल या सेवाओं या दोनों की अंतरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के दौरान होने वाली सप्लाई और भारत में माल या सेवाओं या दोनों की आयात के दौरान होने वाली सप्लाई पर कर उद्ग्रहण के लिए संसद द्वारा एकीकृत माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 (जिसे यहां आगे आईजीएसटी एक्ट कहा गया है) बनाया गया है।  इस अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (5) के खंड (क) में माल या सेवाओं या दोनों की एक्सपोर्ट सप्लाई का उल्लेख निम्न प्रकार किया गया है :-

“माल या सेवा या दोनों की पूर्ति जब पूर्तिकार भारत में अवस्‍थित है और पूर्ति का स्‍थान भारत के बाहर है”

“Supply of goods or services or both when location of supplier is in India and place of supply is outside India.”

माल या सेवाओं या दोनों की सप्लाई जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है में पूर्तिकर्ता के भारत में अवस्थित होते हुए भी किसी अन्य देश में अवस्थित ऐसे माल के आपूर्तिकर्ता को माल सप्लाई आदेश देकर ऐसे देश से सीधे किसी तीसरे देश में आयातक को सप्लाई किया जा सकता है।  ऐसी स्थिति में माल का भारत से निर्यात नहीं होगा।  कठिनाई अनुभव किये जाने पर केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 की अनुसूची तृतीय में नयी प्रवृष्टि 7  निम्न प्रारूप में जोड़ कर भारत देश के बाहर  अन्य देश से सीधे किसी तीसरे देश को निर्यात के मामलों को शब्दसप्लाईकी परिभाषा से निकाला गया है।

“7. Supply of goods from a place in the non-taxable territory to another place in the non-taxable territory without such goods entering into India.”

आईजीएसटी एक्ट की धारा – 2 के खंड (5) और (6) में “माल का निर्यात” और “निर्यात सेवाओं” की परिभाषाएं निम्न प्रकार दीं गयीं हैं:–

“(5)  ‘‘माल का निर्यात’’ से उसके व्‍याकरणिक रूप भेदों और सजातीय पदों के साथ भारत से माल को भारत के बाहर किसी स्‍थान पर ले जाना अभिप्रेत है;”

“(6)  ‘‘निर्यात सेवाओं” से किसी सेवा का ऐसा प्रदाय अभिप्रेत है, जब,-

(i)  सेवा का पूर्तिकार भारत में अवस्थित है ;

(ii)  सेवा का प्राप्तकर्ता भारत के बाहर अवस्थित है ;

(iii)  सेवा के प्रदाय का स्थान भारत के बाहर है ;

(iv) सेवा के पूर्तिकार द्वारा ऐसी सेवा के लिए संदाय संपरिवर्तनीय विदेशी मु्द्रा में प्राप्त् किया गया है ; और

(v) सेवा का पूर्तिकार और सेवा का प्राप्तिकर्ता धारा 8 के स्पष्टीकरण के अनुसार मात्र किसी विशेष व्यक्ति के स्थापन नहीं हैं;”

उक्त परिभाषाओं का अंग्रेजी टेक्स्ट निम्नप्रकार है:–

(5) “export of goods” with its grammatical variations and cognate expressions, means taking goods out of India to a place outside India;

(6) “export of services” means the supply of any service when,—

(i) the supplier of service is located in India;

(ii) the recipient of service is located outside India;

(iii) the place of supply of service is outside India;

(iv) the payment for such service has been received by the supplier of service in convertible foreign exchange; and

(v) the supplier of service and the recipient of service are not merely establishments of a distinct person in accordance with Explanation 1 in section 8;

आईजीएसटी एक्ट की धारा 7 की उपधारा (5)) के खंड (क) में “export of goods” और “export of services” अभिव्यक्तियों (expressions) का प्रयोग नहीं हुआ है। इन अभिव्यक्तियों (expressions) का प्रयोग आईजीएसटी एक्ट की धारा 16 की उपधारा (1) के खंड (क) में निम्न प्रकार हुआ है:–

“शून्य दर पूर्ति ।

16. (1) ‘‘शून्य दर पूर्ति” से माल या सेवाओं या दोनों की निम्नलिखित पूर्तियां अभिप्रेत हैं, अर्थात् :–

(क) माल या सेवा या दोनों का निर्यात (export of goods or services or both) ; या

(ख) ***।

अभिव्यक्ति (expression) “export of goods” का प्रयोग आईजीएसटी एक्ट के किसी अन्य प्राविधान में नहीं हुआ है। अभिव्यक्ति “एक्सपोर्ट ऑफ़ गुड्स” की परिभाषा आईजीएसटी की धारा 2 के खंड (5) में जिस रूप में दी गयी है वह माल की आपूर्ति नहीं है। आईजीएसटी एक्ट की धारा 16 की उपधारा (1) के खंड (क) में प्रयुक्त हुयी अभिव्यक्ति “export of goods or services or both”, और इसी अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (5) के खंड (क) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति “supply of goods or services or both when location of supplier is in India and place of supply is outside India” न तो स्वरुप में समान हैं और न ही उनका अर्थ या आशय एक है। दोनों ही अभिव्यक्तियों का प्रयोग त्रुटिपूर्ण है। अन्यथा भी जब आईजीएसटी लगाने के लिए अभिव्यक्ति supply of goods or services or both when location of supplier is in India and place of supply is outside India प्रयोग की गयी है तब शून्य दर आपूर्ति में भी इसी आपूर्ति को शामिल किया जाना चाहिए था। दोनों ही स्थानों पर अभिव्यक्ति “supply of goods or services or both in the course of export of the goods or services or both out of the territory of India” उचित रहा होता। यही अभिव्यक्ति (expression) संविधान के अनुच्छेद 286 के खंड (1) के उपखण्ड (ख) में प्रयोग हुयी हैं। माल और सेवाओं के निर्यात के संबंध में उपयुक्त एक्सप्रेशन प्रयोग न किये जाने से समस्या उत्पन्न होने पर केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 की अनुसूची तृतीय में प्रविष्टि 7, जिसका उल्लेख यहां ऊपर किया गया है,  अधिनियम बनाने के लगभग एक वर्ष  बाद जोड़ी गयी है।

मेरे विचार से भारत के राज्यक्षेत्र से अन्य देशों को निर्यात के दौरान होने वाली माल या सेवाओं या दोनों की आपूर्ति  के लिए जिस रूप में आपूर्ति का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 286 के खंड (1) के उपखण्ड (ख) में किया गया है के रूप में आईजीएसटी एक्ट की 7 की उपधारा (5) के खंड (क) तथा धारा 16 की उपधारा (1) के खंड (क) किया जाना चाहिए। यह निम्नप्रकार हो सकता है:-

“Supply of goods or services or both where such supply takes place in the course of the export of goods or services or both out of the territory of India”

आईजीएसटी एक्ट की धारा 16 जीरो रेटेड सप्लाई से संबंधित है।  मेरा व्यक्तिगत विचार है कि धारा 16 के प्राविधान आपूर्ति को जीरो रेटेड सप्लाई नहीं बनाते। इस विषय विस्तार से चर्चा अलग से की जा सकती है।

*****

अस्वीकरण: प्रस्तुत आर्टिकल में व्यक्त किये गए विचार मेरे निजी हैं, कोई विधिक राय नहीं है।  प्रबुद्ध पाठकों से अनुरोध है कि वे यहां व्यक्त किये गए किसी विचार को प्रयोग में लाने से पूर्व अपने विधिक सलाहकार से परामर्श ले लें।  किसी भी प्रकार की छति की भरपाई के लिए मैं स्वयं या इस आर्टिकल के प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे। 

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