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जीएसटी कानून हमारे देश मे लागू हुए अब लगभग  साढ़े चार साल हो चुके है। इस  दौरान हमने इस कानून मे कई बदलाव देखे है।सरकार निरंतर नित नए सर्कुलर, अधिसूचना, इंस्ट्रक्शंस ,प्रेस रिलीजेज जारी करती जा रही है। आज वास्तविक्ता यह है की इन नए सर्कुलर, अधिसूचना, इंस्ट्रक्शंस ,प्रेस रिलीजेज की संख्या  कानून की धाराओं से कई गुना ज्यादा हो गई है। अब तो इस कानून मे हुए बदलावों को ढूंढना और समझना न सिर्फ कर सलाहकारों के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया है बल्कि करदाताओं के लिए तो यह नामुमक़िन सा लगता है। सरकार की हमेशा यह भरपूर कोशिस रहती है की इस कानून का सरलीकरण हो लेकिन इसी प्रयास मे कहीं न कहीं और अधिक उलझने पैदा होती जा रही है। अगर हम जीएसटी मे होने वाले बदलावों की बात करे तो इनका नाता 1 जनवरी की तारीख से विशेष रहा है। सरकार हर वर्ष नए साल की शुरुवात की तारीख से ही बहुत से बदलावों को लागू करती है और यह सिलसिला पिछले कुछ वर्षों से लगातार चला आ रहा है। अब तो  ऐसा लगता है की मानो सरकार इन बदलावों के माध्यम से करदाताओं को हर साल नववर्ष का तोहफा दे रही है इसी क्रम  मे साल 2022 भी अपवाद नहीं है और सरकार ने फिर से एक बार 1 जनवरी 2022 की तारीख को चुना और इस तिथि से कई बदलाओं को लागू करने की घोषणा कर डाली। कुछ बदलाव तो बजट 2021 के समय ही बतला दिए गए थे तो कुछ बदलाव सरकार ने पिछले  दिनों अधिसूचना जारी कर बतलाये है।  लेकिन इन सारे बदलावों  को लागू करने की तिथि 1 जनवरी 2022 ही रखी गई है। लेखक इस आलेख के जरिये कुछ बड़े बदलावों का विस्लेषण कर समझाने की कोशिश कर रहे है। प्रमुख बदलाव इस प्रकार है:-

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1. ईनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) लेने हेतु  नियमों में बड़े बदलाव:

ईनपुट टैक्स क्रेडिट को जीएसटी का हृदय व आत्मा माना जाता रहा है। परन्तु पिछले कुछ वर्षों मे कर चोरों ने इसका खूब अनुचित लाभ उठाया और सरकार को करोड़ों रुपयों की चपत लगाई। अब एक बार फिर सरकार ने  ईनपुट टैक्स क्रेडिट के नियमों मे बदलाव कर एक नई शर्त क़ानूनी तौर पर  ईनपुट के साथ लगा दी है।अब तक  ईनपुट लेने हेतु  धारा 16(2) के तहत सिर्फ चार शर्तें हुआ करती थी जो की इस प्रकार है –

  • वस्तु एवं सेवाएं पाने वाले क्रेता/ खरीददार के पास विक्रेता द्वारा जारी टैक्स ईनवॉइस हो
  • वस्तु एवं सेवाओं का वास्तविक रूप मे प्राप्त होना
  • ईनपुट टैक्स का क्लेम मासिक GSTR-3B रिटर्न के माध्यम से क्रेता द्वारा लेना
  • वस्तु एवं सेवा प्रदाता द्वारा जारी किये गए टैक्स ईनवॉइस का कर सरकार के खाते मे जमा करवा देना

इन चार शर्तों के आलावा नियम 36(4)  के तहत जो  ईनपुट करदाता अपने टैक्स रिटर्न मे ले रहा है वो ज्यादा से ज्यादा जीएसटी पोर्ट्ल में दर्शाये गए GSTR-2A फार्म के  ईनपुट से 5% अधिक हो सकता है। कुल मिलाकर अगर इन शर्तों का पालन किया गया है तो अब तक  ईनपुट लिया जा सकता था।हांला की इनमे से कुछ शर्तें सरकार ने ऐसी रखी है जो की करदाताओं के बश से बाहर है जैसे की विक्रेता द्वारा टैक्स ईनवॉइस मे दर्शाये गए  ईनपुट को सरकार के खाते में समय पर जमा करवाना किसी भी क्रेता ( जो की उस ईनवॉइस की  ईनपुट ले रहा है) के बश मे कतई नहीं है।अतः व्यावाहरिक दृष्टिकोण से इस शर्त का पालन करना नामुमकीन सा लगता है। नियम 36(4) की अगर बात करें तो यह नियम पहली बार अक्टूबर ,2019 से 20%  की सीमा के साथ लागू हुआ था।एक जनवरी 2020 से सरकार ने इस सीमा को 20% से घटाकर 10% कर दिया था। फिर पुनः 1 जनवरी 2021 से इस सीमा को 10% से घटाकर 5% कर दिया गया। हालां की यह नियम शुरू से ही विवादों से घिरा हुआ था । कई न्यायालयों  मे भी इसे चुनौती दी जा चुकी है एवं मामले लंबित है। कानून के जानकारों के अनुसार इसका मुख्य कारण यह है की इस नियम का किसी धारा के आधीन  न होना।

अब नए वर्ष 1 जनवरी 2022 से सरकार ने  ईनपुट लेने की शर्तों मे उपरोक्त  चार शर्तों के आलावा पाँचवी एक नई शर्त और जोड़ दी है। अब धारा 16(2) मे एक नई उप-धारा (aa) जोड़ दी गई है जिसके तहत अब  ईनपुट सिर्फ और सिर्फ तभी लिया जा सकेगा जब आपूर्तिकर्ता ( विक्रेता) द्वारा उस  ईनपुट को अपने GSTR-1 मे अपलोड  किआ गया हो और क्रेता के GSTR-2A /2B मे वो दिख रहा हो। हांलां की कर विभाग बहुत पहले से ही  ईनपुट मिसमैच ( GSTR-3B  vs. GSTR-2A) के नोटिसेस  करदाताओं को भेज रहा था लेकिन अब इस नई उपधारा का आना कहीं ना कहीं इस बात को और अधिक  पुख्ता करता है की 1 जनवरी 2022 से पहले कानून मे इस तरह का कोई प्रावधान नहीं था की विक्रेता द्वारा बेचे गए माल का  ईनपुट खरीदार के पोर्टल पर आना जरुरी है। इस बात की पुष्टी कई कर एवं  कानूनी विशेषज्ञ  भी कर चुके है। इसका मतलब यह हुआ की अब तक करदाताओं को बेवजह ही मिसमैच नोटिसेस भेजकर परेशान किया जा रहा था।

लेकिन अब 1 जनवरी 2022 से परिस्थिति बदल जाएगी और करदाताओं को इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा की ईनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) उतना ही ले जितना पोर्टल मे दिख रहा है  नहीं तो मिसमैच के नोटिसेस आना अनिवार्य है अब आप अपने खातों के अनुसार  ईनपुट नहीं ले सकते है। नियम 36(4) जो की 5% तक के डिफरेंस की अनुमति देता है वो भी अब स्वतः ही निरस्त हो जायेगा। अतः अब यह अतिआवश्यक हो गया है की सभी वस्तु एवं सेवा प्राप्तकर्ता ( क्रेता ) इस बात को सुनिश्चित करे की वो जिस ईनवॉइस का  ईनपुट ले रहे है उसका आपूर्तिकर्ता ( विक्रेता) अपना GSTR-1 रिटर्न समय पर लगाया हो। नहीं तो  ईनपुट उस महीने में नहीं मिलेगा और आपकी जेब से वो पैसा फिर से भरना पड़ जायेगा। इस नए नियम को लागू करने के पिछे सरकार की यही मंशा रही होगी की कहीं न कहीं अनुसाशन लाया जाए, कर अनुपालना मे वृद्धि हो और फर्जीवाड़े को रोका जा सके।

इस नए नियम के लागू होने के पश्चात करदाताओं के मन मे कई प्रकार के प्रश्न  एवं जिज्ञासाएं अवश्य ही आएगी। लेखक ने अपनी समझ के अनुसार कुछ प्रश्न तैयार किये  है तथा करदाताओं की सुविधा के लिए उन प्रश्नों के उत्तर भी देने की कौशिश की है। आईये जानते है क्या -क्या प्रश्न इस नए नियम लगने के पश्चात आपके मन मे आने वाले है?

Q1: सबसे पहला सवाल यह आता है की क्या यह नया नियम prospectively लगेगा या retrospectively?

A: जब भी किसी कानून मे कोई बदलाव किये जाते है तो वह हमेशा prospectively ही लागू होते है बशर्ते उस कानून की धारा मे specifically इस बात का उल्लेख न हो की यह retrospectively लगेंगे। चूँकि सरकार ने इस नए उपनियम16(2)(aa) मे ऐसी कोई बात नहीं बतलाई है की यह retrospectively लागू होगा तो यह बहुत स्पष्ट है की यह प्रावधान prospectively ही लगेगा।

Q2: दूसरा प्रश्न यह आता है की क्या यह नया नियम December’2021 के मासिक/ त्रिमासिक रिटर्न पर लगेगा या JANUARY’2022 के रिटर्न से लगेगा ?

A: लेखक का मानना है की चूँकि यह नियम 01 जनवरी 2022 की तारीख से पहली बार लागू हुआ है तो इस नए नियम के अनुसार जो ट्रांसेक्शन्स 01 जनवरी onwards होंगे उन्ही पर यह लागू होगा न की 01 जनवरी 2022 से पहले के transactions पर भी। अतः दिसंबर महीने का रिटर्न पुराने नियमानुसार ही लगेगा और जनवरी के GSTR-3B रिटर्न को नए नियम से भरना पड़ेगा जो की फ़रबरी 2022 मे भरना है।

Q3: जो ईनवॉइस आपूर्तिकर्ता (विक्रेता ) द्वारा 1 जनवरी २०२२ से पहले जारी किये गए है और उनका ईनपुट अगर जनवरी महीने मे या उसके बाद लिया जाता है तो क्या नया नियम उन ईनवॉइस पर भी लगेगा ?

A: लेखक के अनुसार ऐसे इन्वॉइसेस पर पुराना नियम जो की दिसंबर 2021 तक था वो ही लागू होना चाहिए।

Q4: क्या यह नियम RCM के ईनपुट पर भी लगेगा?

A: RCM का ईनपुट self-invoicing के आधार पर लिया जाता है तो यह नियम RCM ईनपुट पर नहीं लगेगा।

Q5: क्या यह नियम आपूर्तिकर्ता द्वारा जारी Debit Notes पर भी लगेगा ?

A: जी हाँ ,यह नियम invoice और Debit Note दोनों पर ही लगेगा।

Q6: इस नए नियम में किस फार्म के आधार पर (GSTR-2A या GSTR-2B) ईनपुट मिलेगा?

A: इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले हमें यह समझना जरुरी है की GSTR-2A एवं GSTR-2B मे क्या फर्क है? GSTR-2A एक गतिशील फार्म है जो की हर समय बदलता रहता है जैसे जैसे आपूर्तिकर्ता ईनवॉइस अपलोड करते है GSTR-2A मे आते जाते है। लेकिन इसके ठीक विपरीत GSTR-2B फार्म जो की जुलाई 2020 से चालू हुआ एक स्थिर फार्म है यह फॉर्म 13 तारीख तक तो बदलता रहता है लेकिन इस तिथि के बाद यह फ्रीज हो जाता है। इसका मतलब ये हुआ की GSTR-1 की देय तिथि के बाद अगर आपूर्तिकर्ता ईनवॉइस अपलोड करता है तो ऐसे ईनवॉइस उस माह के GSTR-2B में नहीं आएंगे।  अब जीएसटी में  ईनपुट GSTR-3B फॉर्म के जरिये लिया जाता है तथा इस फॉर्म को भरने की अंतिम तिथि अगले महीने की 20 तारीख है तो ऐसे मे प्रश्न यह आता है की धारा 16(2)(aa) का पालन GSTR-2A देखकर किया जाए या फिर GSTR-2B? लेखक का ऐसा मानना है की यहाँ पर हमे GSTR-2B को   ही मानना पड़ेगा क्यों की इसी फॉर्म से ही auto-populated figures अब GSTR-3B मे आएंगे।

इस नए नियम के लागू होने के पश्चात करदाताओं को कुछ और समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है जिसका स्टीक हल एवं उत्तर आज के दिन न सरकार के पास, न कर विशेज्ञों के पास और न ही करदाताओं के पास है। अतः सरकार को निम्मलिखित बातों का अतिशीघ्र स्पष्टीकरण देना चाहिए-

  • कई बार ईनवॉइस महीने के अंत मे जारी किये जातें है और माल व सेवा की वास्तविक प्राप्ति अगले महीने में होती है ऐसी स्थिति मे आपूर्तिकर्ता ( विक्रेता) तो उस ईनवॉइस को पिछले महीने के GSTR-1 मे ही अपलोड कर देगा लेकिन क्रेता उस ईनवॉइस का ईनपुट धारा 16(2) के तहत अगले महीने में ही लेगा जब माल की प्राप्ति होगी। ऐसे मे क्रेता को पिछ्ले महीने मे तो पोर्टल पर ज्यादा ईनपुट दिखेगा और अगले महीने मे कम।  साथ ही टैक्स रिटर्न ( GSTR-3B) मे पोर्टल के मुकाबले ज्यादा  ईनपुट रहेगा तो ऐसी स्थिति मे मिसमैच नोटिस आने की संभावनाएं बढ़ जाएगी।
  • सरकार ने इस नियम को बनाते समय मानवीय भूल को ध्यान मे नहीं रखा है जिसके फलस्वरूप आपूर्तिकर्ता द्वारा किसी भी माह के GSTR-1 में अगर GST number भूलबश गलत या किसी और पार्टी के भर दिए जाते है तो उस महीने में क्रेता को ईनपुट पोर्टल पर उपलब्ध नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति मे खरीदार के पास उस महीने में उस  ईनपुट का टैक्स अपनी जेब से पुनः भरने के आलावा कोई चारा नहीं रहेगा क्यों की GSTR-1 मे भूल सुधार सिर्फ अगले महीने के GSTR-1 द्वारा ही की जा सकती है। ऐसे मे तो करदाताओं पर आपूर्तिकर्ता की भूल के कारण दोहरी मार पड़ जाएगी ।

उपरोक्त नियम से एक बात साफ़ है की अब व्यापारियों को अपना GSTR-1 रिटर्न समय पर लगाना पड़ेगा साथ ही बहुत सावधानी एवं सतर्कता बरतनी पड़ेगी जिससे की कोई भूल न रह जाये अन्यथा खरीददार को  ईनपुट नहीं मिलेगा।

2. क्लब एवं एसोसिएशन भी अब जीएसटी के दायरे में:

अब तक कोई भी क्लब, एसोसिएशन या सोसाइटी अपने सदस्यों को किसी प्रकार की वस्तु एवं सेवाएं प्रदान करती था, जो की पैसों के एवज में होती थी तो ऐसी संस्थाएं जीएसटी के कर दायरें में पड़ती है या नहीं इस पर पुरे देश में बहस छिड़ी थी । इन गतिविधियों पर जीएसटी नहीं लगने का मुख्य कारण था की ऐसी स्थिति में पारस्परिकता का सिद्धांत ( Principle of Mutuality ) लगता था। ठीक उसी प्रकार अगर कोई सदस्य भी क्लब या एसोसिएशन को किसी प्रकार की वस्तु  एवं सेवाएं प्रदान करता है , जो की पैसों के एवज में होती थी तब भी सदस्य जीएसटी से इसी सिद्धांत को मानकर मुक्त समझे जाते थे । अगर सीधी सी भाषा मे बात की जाये तो कोई भी अपने आप को आपूर्ति ( Supply) नहीं कर सकता है। क्लब और उसके सदस्य एक ही माने जाते है। इस बात का उल्लेख माननीय उच्चतम न्यायलय ने भी कलकत्ता स्पोर्ट्स क्लब लिमिटेड मामले में किया है एवं Principle of Mutuality को सही ठहराया।

लेकिन अब 1 जनवरी 2022 से सरकार ने जीएसटी कानून की धारा 7(1) मे एक नई उपधारा (aa) जोड़ दी  है जिसके कारण अब कोई भी क्लब, एसोसिएशन इत्यादि अपने सदस्यों को या कोई भी सदस्य उस क्लब या एसोसिएशन को अगर किसी प्रकार की वस्तु एवं सेवाएं जो  की  पैसों के एवज में देती है तो अब ऐसी गतिविधियों को  आपूर्ति (Supply) मान लिया जायेगा। साथ ही इस बाबत Schedule -II मे उल्लेखित एंट्री सीरियल नंबर 7 को भी अब हटा दिया गया है। सबसे बड़ी बात यह है की इस धारा को पूर्वव्यापी ( retrospectively) 01 जुलाई 2017 से ही लागू कर दिया गया है जिसका मतलब यह हुआ की अब सभी क्लब एवं एसोसिएशन  से कर विभाग बेझिझक पिछले साढ़े चार वर्षों की कर  देनदारी उगाही कर सकता है। यहाँ अब कुछ प्रश्न खड़े हो जाते है –

  • क्या क्लब और एसोसिएशन को पुराने ईनपुट क्रेडिट मिलेंगे ?
  • क्या पुरानी देनदारी ब्याज के साथ माँगी जा सकती है ?

लेखक का मानना है की जब सरकार आज के दिन कानून में बदलाव करके पुरानी देनदारी वसूलना चाहती है तो ऐसे में तो करदाता की  कोई गलती नजर नहीं आ रही है।ऐसी स्थिति में पुराने कर मामलों का हवाला देते हुए ब्याज की देनदारी से बचा जा सकता है।

इस संसोधन का Resident Welfare Association (RWA) जो की पहले से ही कर दायरे में है पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा साथ ही उनको जो 7500/- प्रतिमाह पर फ्लैट के मैंटेनस चार्ज में छूट मिलती है उसे भी सरकार ने बरकरार रखा है। इसके अलावा जो चैरिटेबल सोसाइटीज़ आयकर की धारा 12A में पंजीकृत है और उसकी आय चैरिटेबल गतिविधियों से है तो उनको दी गयी छूट मे भी कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

3. सेल्फ असेसमेंट टैक्स का दायरा बढ़ाया गया:

अब तक हम यही जानते एवं मानते थे की self-assessment टैक्स का मतलब GSTR-3B के तहत भरे जाने वाले मासिक /त्रिमासिक रिटर्न की देनदारी ही है। इस बात का उल्लेख धारा 75(12) में भी किया गया है। इसका मतलब यह हुआ की अगर किसी ने GSTR-3B रिटर्न नहीं भरा है तो उसकी self-assessed देनदारी निर्धारित नहीं की जा सकती है। जीएसटी की इसी खामी का कर चोरों ने बखूबी फायदा उठाया और सिर्फ अपना GSTR-1 रिटर्न भरकर बिना कर चुकाए ( अगर GSTR-3B नहीं भरा तो कर चुकाने का प्रश्न ही नहीं आता) फर्जी  ईनपुट के खेल को खेला। अब सरकार ने फर्जीवाड़ा करने वालों के मंसूबों पर पानी फेरते हुए जीएसटी कानून में एक नया प्रावधान बना दिया है। इस नए प्रावधान के अन्तर्गत धारा 75(12) मे एक एक्सप्लनेशन डाल दिया गया है जिसमें बताया है की अगर किसी ने सिर्फ अपना GSTR-1 रिटर्न भरा है बिना GSTR-3B रिटर्न भरे या भरे गए GSTR-1 रिटर्न की देनदारी GSTR-3B रिटर्न से ज्यादा आ रही है तो ऐसे में अब GSTR-1 मे दर्शाये गए outward supply की  tax liability को ही self-assessed टैक्स मान लिया जायेगा। साथ ही यह टैक्स बिना किसी रोकटोक के और बिना नोटिस जारी किये करदाता से सीधा वसूला जायेगा।

इस  नियम के पीछे के उद्देश्य की बात करे तो यह जाली इन्वॉइसिंग एवं फेक  ईनपुट पर रोक लगाने के लिए लाया गया है। लेकिन सरकार ने इस नियम को बनाते समय एक बार फिर मानवीय भूल को ध्यान में नहीं रखा जिसके तहत किसी ईमानदार करदाता से GSTR-1 में गलती से या भूलवश ज्यादा outward supply या कर देनदारी रिपोर्ट हो जाती है तो GSTR-1 एवं GSTR-3B में अंतर आना स्वाभाविक है ऐसे में mismatch नोटिस जारी किये बिना ही self-assessed टैक्स मानकर वसूली करना ईमानदार करदाता के साथ ज्यादती हो जाएगी। निश्चित तौर पर सरकार इस परेशानी का हल आने वाले समय में जरूर बतलायेगी।

इसी लाइन मे नियम 59 में भी एक बदलाव किया गया है की अगर किसी करदाता ने  पिछले महीने का GSTR-3B रिटर्न नहीं भरा है तो अब से वह अगले महीने का GSTR-1 रिटर्न भी नहीं भर पायेगा जब तक की पिछला GSTR-3B रिटर्न न भर दे। धाँधली करने वालों की सरकार ने अब मुसीबतें और बढ़ा दी है।

4. कपड़े एवं वस्त्र व्यवसाय में जीएसटी की दरों में वृद्धि:

कपड़ा हर इंसान की महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक है। अक्सर कहा जाता है की किसी भी इंसान को जीवन यापन हेतु कम से कम तीन चीजों की आवश्यक्ता होती है –रोटी, कपड़ा  और मकान। अतः कपड़े को हमेशा से ही अति-आवश्यक सामग्री मे रखा गया है। अगर आंकड़ों की बात करे तो भारत दुनिया में कपड़ा और परिधान का छठा सबसे बड़ा निर्यातक है।कपड़ा उद्योग भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 5% का योगदान देता है। कपड़ा उद्योग भारत की निर्यात आय में 12% का योगदान देता है। शायद इन्ही तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कपड़ा व्यवसाय के लिए  सरकार ने अपने हृदय में एक मुलायम कोना रखा था।

अब तक कपड़ा व्यव्साय में जीएसटी की कर दरें 5% एवं 12% हुआ करती थी। 5% कर दर एक हज़ार रुपयों या उससे कम  कीमतों के वस्त्रों पर लागू थी एवं 12% बाकी अन्य सभी वस्त्रों पर हुआ करती थी। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है की सरकार गरीबी रेखा वाले उपभोक्ताओं और मध्यमवर्गीय  तबके के लिए कपड़े की कीमतें कम रखना चाहती थी इसीलिए कम कीमतों वाले कपड़ों पर जीएसटी की दर 5% रखी गयी थी। अगर हम वैट कानून की बात करे तो अधिकतर राज्यों ने हैंडलूम एन्ड टेक्सटाइल क्षेत्र को पूर्ण रूप से कर दायरे से बाहर रखा था। सिर्फ रेडीमेड वस्त्र और परिधान ही वैट के दायरे मे थे। मुझे याद है जिस समय जीएसटी कानून की कर दरें फाइनल की जा रही थी उस समय कपड़े व्यवसाय पर लगने वाले जीएसटी को लेकर काफी हलचल देखी गई थी। एक और व्यापारी विरोध प्रदर्शन कर हड़ताल पर चले गए थे तो दूसरी और सरकार भी अपने फैसले पर अडिंग थी। अंततः कपड़े व्यवसाय पर जीएसटी लगा दिया गया।

पिछले कुछ दिनों से कपड़े के व्य्वसाय में एक बार फिर हलचल देखने को मिली है। जब से सरकार ने कपड़ा उद्योग में जीएसटी की दरों को बढ़ाने का ऐलान किया है मानो व्यवसायों पर पहाड़ टूट पड़ा। सब अपने -अपने स्तर पर सरकार को ज्ञापन देकर गुजारीश कर रहे है की इस उद्योग में कर दरों में बढ़ोतरी नहीं की जाये। हाल ही मे एक यह भी खबर आई की कपड़ा मंत्रालय भी अभी इस बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं है तथा बताया गया की इस उद्योग की कर दरों में बढ़ोतरी करने से पहले बित्त मंत्रालय को इस उद्योग से जुड़े लोगों से परामर्श लेना चाहिए था। खैर जब सरकार ने नवम्बर महीने मे ही अधिसूचना जारी कर इस बात की घोषणा कर  दी थी की टेक्सटाइल सेक्टर मे कर दरें 1 जनवरी 2022 से बढ़ा दी जाएगी तो ऐसे में अब व्यापारियों के पास सरकार के इस फैसले को स्वीकार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता है।

आइये हम सबसे पहले यह जानने की कोशिश करते है की वर्तमान में (1 जनवरी 2022 से पहले) टेक्सटाइलस क्षेत्र में कर ढांचा क्या है और किन कारणों से सरकार ने कर दरें बढ़ाने का फैसला लिया है? अब तक फाइबर, यार्न एवं फैब्रिक की कर दरें क्रमसः 18%,12% एवं 5% थी। सिर्फ नेचुरल फाइबर की दर 5% रखी गई थी। अब सरकार ने 1 जनवरी 2022 से फाइबर, यार्न एवं फैब्रिक तीनो चीजों की दरें 12% कर दी है। हालाँ की नेचुरल फाइबर की दर पहले के जैसे 5% ही रखी गई है। साथ ही टेक्सटाइल एवं टेक्सटाइल उत्पादकों के डाइंग एवं प्रिंटिंग जॉब वर्क जिसे की पंजीकृत प्रिंसिपल के लिए किया जा रहा हो वहां भी दरें 5% से बढ़ाकर 12% कर  दी गई है। यह निर्णय जीएसटी कौंसिल की 45 वी  बैठक में लिए गए फैसले के बाद लिया गया जो की दिनांक 17 सितम्बर 2021 को हुई थी। इस बैठक में टेक्सटाइल एवं अन्य क्षेत्रों मे “Inverted Duty Structure” को ठीक करने का फैसला हुआ था अतः 12% की एक ही दर रखने का मुख्य उद्देस्य इस “Inverted Duty Structure” की इस चैन मे आ रही विसंगतियों को ठीक करना था जहाँ पर कच्चे माल की कर दर उत्पादित माल से ज्यादा थी। सरकार चाहती तो समूचे ढांचे को 6% मे रख सकती थी लेकिन शायद राजस्व को धयान में रखते हुए ऐसा नहीं किया गया।

कई विशेषज्ञों का मानना है की सरकार के इस 7% कर दर बढ़ोतरी के कदम से सिर्फ 15% उद्योगों में “Inverted duty Structure” की समस्या दूर होगी जब की बचे हुए 85% उद्योगों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। सच पूछे तो इसका उत्तर भविष्य के गर्भ मे छिपा है। टेक्सटाइल सेक्टर के लोगों का मानना है ही सभी दरों को सरकार द्वारा 6% ही बना देना चाहिए था जिससे की “Inverted duty Structure” पूर्ण रूप से खत्म हो जाता तथा कोई समस्या ही नहीं आती।

यह नई दरें उन कारोबारियों पर भारी पड़ने वाली है जो उत्पादन नहीं करते है। सीधे शब्दों मे अगर बात की जाये तो दुकानदारों पर इन नए प्रावधानों के तहत  7% अतिरिक्त वर्किंग कैपिटल का बोझ पड़ने वाला है क्यों की आमतौर पर इस व्यावसाय में थोक विक्रेता द्वारा माल बाकी में ही बेचा जाता है। साथ ही उपभोक्ताओं की जेब पर भी 7% की अतिरिक्त  मार पड़ेगी जो की पहले एक हज़ार रुपयों या उससे कम कीमतों के फैब्रिक आइटम्स पर नहीं थी। इन नई  दरों की घोषणा  के पश्चात कारोबारियों के मन में एक बड़ा सवाल यह भी है की  की 31.12.2021 के  स्टॉक को कम  रखा जाये या इसे और बढ़ा लिया जाये? चूँकि कर दरें 5% से 12% होने वाली है इसलिए कई लोगों का मानना है की 5% में ख़रीदा गया  स्टॉक अगर अधिक होगा तो उन्हें सीधा 7%  का फायदा होने वाला है। लेकिन लेखक के विचार से ऐसा कुछ  भी नहीं होने वाला है। 5% की  ईनपुट खरीदी पे मिलेगी एवं 12% आउटपुट टैक्स बेचने पर भरना पड़ेगा। ये आउटपुट टैक्स जिसको माल बेचा गया है उस व्यापारी या उपभोक्ता से ही संग्रह कर सरकार को अदा किया जायेगा। तो ऐसी सूरत में 7% के फायदा का कोई समीकरण नजर नहीं आता है।

इस नए नियम ने कम्पोजीशन स्कीम (जहाँ मात्र 1% टैक्स भरना पड़ता है) के अन्तगर्त पड़ने वाले दुकानदारों की चिंता और बढ़ा दी है। एक तो वस्त्र व्यापार के छोटे- छोटे दुकानदार पहले से ही ऑनलाइन शॉपिंग से कॉम्पिटिशन की मार झेल रहे है और ऐसे में 7% टैक्स की और बढ़ोतरी उन्हें अब यह सोचने पर मजबूर कर देगी की की वो अब कम्पोजीशन स्कीम में रहे या नॉर्मल स्कीम में आ जाये? अगर कम्पोजीशन स्कीम में रहेंगे तो सामान के दाम अब 7% बढ़ाने पड़ेंगे क्यों की कम्पोजीशन स्कीम में ईनपुट क्रेडिट नहीं मिलता है। यह एक बहुत ही विकट समस्या पैदा होने वाली है। ऐसे में व्यापारियों को अपने कर सलहाकार से इसका गुण-दोष समझते हुए निर्णय लेना चाहिए।

नई दरें लागू होने के पश्चात कुछ अन्य नए प्रश्न भी हमारे सामने आयेंगे जैसे की –

  • 31 दिसंबर या उससे पहले ख़रीदा गया माल अगर जनवरी महीने में या उसके पश्चात व्यापारी वापिस लौटाता है ( रिटर्न कर देता है ) तो ऐसे सूरत में लौटाते बक्त कौनसी कर दर लगेगी -नई 12% या पुरानी 5% ?
  • कोई माल अगर अप्रूवल में दिसंबर माह में या उससे पहले भेजा गया हो और अगर वो माल जनवरी या उसके पश्चात अप्रूव किआ जाता है तो कर दर क्या होगी ?
  • कुछ आर्डर दिसंबर या उससे पहले प्राप्त हुए और फुल पेमेंट भी advance मे ही मिल गया लेकिन माल जनवरी महीने में भेजा जा रहा है तो कर दर कौनसी लगेगी – पुरानी या फिर नई ?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें जीएसटी की धारा 14 का अध्ययन करने पर मिलेंगे एवं साथ ही व्यापारियों को अपने कर सलाहाकर से मिल जिज्ञासाओं का समाधान पहले ही ढूंढ लेना चाहिए।

टेक्सटाइल एवं कपड़े व्यव्साय सम्बंधित कर दरों में बदलाव करने हेतु सरकार ने अधिसूचना संख्या 14/2021-CT(R) एवं 15/2021-CT(R) दिनाँक 18.11.2021 को जारी किये है जहाँ पर सभी वस्तुओं की कर दरें विस्तृत रूप में जानी जा सकती है।

5. जूते चप्पल पर भी जीएसटी दरों में बढ़ोतरी:

अब तक एक हजार रूपए या उससे कम कीमतों के जूते चप्पलों पर 5% की कर दर हुआ करती थी जो की अब 1 जनवरी 2022 से 12% हो जाएगी। इसे बढ़ाने  के पीछे का कारण भी कपड़े की तरह “inverted duty structure” में आ रही विसंगतियों को ठीक करना है।  इन नई दरों के बाबत सरकार  ने अधिसूचना संख्या 14/2021-CT(R) दिनाँक 18.11.2021 को जारी की थी। तो अब 1 जनवरी से कपड़ों के साथ साथ जूते -चप्पल  की कीमतो  में भी 7% का इज़ाफ़ा होना तय  है। गरीब एवं मध्यमवर्गीय लोगों पर इसका अच्छा खासा असर पड़ने वाला है।

6. सरकारी संस्थाओं को works contract service के लिए रियायती दरों और जीएसटी से छूट की वापसी:

एक जनवरी से सरकार ने उन सभी रियायती दरों एवं छूट को वापस लेने का फैसला लिया है जो की पहले सरकारी क्षेत्र मे ‘works contract services’ देने पर मिलती थी। अब सभी प्रकार के सरकारी क्षेत्र के works contract पर 18% टैक्स कर दिया गया है जो की पहले या तो Nil rated था या 5% टैक्स दर थी या 12% दर रखी गई थी। साथ ही ऐसे कामों के लिए sub-contractors पर भी 18% की दर से टैक्स लगाया जायेगा। जो रियायत पहले Governmental Authorities, Central Government, State Government, Local authorities और Government Entities द्वारा दिए गए ठेकों पर थी अब उसे ख़त्म कर दिया गया है। इसका मतलब यह हुआ की इस बढ़ोतरी का सीधा असर बहुत सी बुनयादी ढांचा परियोजनाओं (Infrastructure Projects) की लागत पर पड़ने वाला है। इसके अलावा बिल भुगतान के वक़्त कर दरों को लेकर ठेकेदारों एवं सरकारी संस्थाओं के बिच होने वाले संघर्ष को भी नहीं नाकारा जा सकता है।

इस बाबत सरकार ने अधिसूचना संख्या 15/2021-CT(RATE) & 16/2021-CT(RATE) दिनाँक 18.11.2021 को जारी किये है जिसमे विभिन्न कार्यों की कर दरें विस्तृत रूप में जानी और समझी जा सकती है।

7. खाद्य वितरण एग्रीगेटरस (Food Delivery Aggregators) पर जीएसटी का लगना:

आज का जमाना Swiggy और Zomato का है जो हमें घर बैठे ही मनचाहा स्वादिष्ट व्यंजन एवं खाना उपलब्ध कराते है। ये कम्पनियाँ बहुत से रेस्टॉरेंट एवं होटलों के साथ अनुबंधन रखती है तथा उन नामी गिरामी होटलों और रेस्टॉरेंट का खाना उपभोक्ता के घर तक पहुंचती है। इसके लिए ये कम्पनियाँ एक शुल्क डिलीवरी चार्जेज के रूप में लेती है। इस तरह की कम्पनियाँ जो की एक ऑनलाइन प्लेटफार्म प्रदान करती है इन्हे ‘aggregators’ कहा जाता है।

सरकार ने अधिसूचना संख्या 17/2021 के माध्यम से एक जनवरी से फ़ूड डिलीवरी अग्ग्रेगेटर्स को जीएसटी के दायरे में शामिल कर ई-कॉमर्स ऑपरेटरों के माध्यम  से की गई  आपूर्ति पर जीएसटी लगाने का फैसला किया है। इस प्रावधान के तहत ‘रेस्टॉरेंट सेवा’ की आपूर्ति पर जीएसटी का भुगतान अब  ई-कॉमर्स ऑपरेटर्स द्वारा किया जायेगा जैसे की वह ऐसी सेवाओं का आपूर्तिकर्ता है। यह नया प्रावधान उन रेस्टोरेन्ट एवं ईटिंग जॉइंट्स पर लागु नहीं होगा जो अपने परिसर मे ही खाने की व्यवस्था प्रदान करते है साथ ही आवास /ठहरने की भी व्यवस्था उपलब्ध करते है जहाँ पर रहने का शुल्क प्रतिदिन प्रति कमरे का 7500 रुपयों से ज्यादा हो।

इस प्रावधान को लाने के पीछे सरकार का उद्देस्य यही रहा होगा की जो छोटे रेस्टोरेंट जीएसटी में अपंजीकृत है तथा ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी के लिए उपलब्ध है तो उनके द्वारा की गई आपूर्ति का टैक्स सरकार को पहले नहीं मिल रहा था। लेकिन अब ये टैक्स अग्ग्रेगेटर्स द्वारा पेमेंट किया जायेगा। लेकिन बिडम्बना यह है की इस नए प्रावधान के तहत सभी तरह के रेस्टॉरेंट पड़ेंगे भले ही छोटे हो, बड़े हो, भले ही पंजीकृत हो, अपंजीकृत हो। इन सबके टैक्स भुगतान की जिम्मेदारी अब अग्ग्रेगेटर्स पर ही दे दी गई है।

उपरोक्त प्रावधान पढ़ने के बाद पाठकों के मन में यह प्रश्न आ रहा होगा की क्या अब ऑनलाइन मंगवाया गया खाना ( जो की Swiggy, zomato आदि से मंगाया जाता है ) महंगा होना वाला है ? इस बाबत लेखक का मानना है की अगर ऑनलाइन खाना जीएसटी पंजीकृत रेस्टॉरेंट से मंगवाया गया है तो कोई तरह का फर्क नहीं पड़ेगा जो कीमत पहले चुकाते थे वही रहेगी बशर्ते दामों मे कोई बढ़ोतरी नहीं की गई हो। लेकिन जहाँ पर ऑनलाइन खाना अपंजीकृत रेस्टॉरेंट से आ रहा है तो वहाँ अब जीएसटी लगेगा जिसकी जिम्मेदारी swiggy/zomato आदि पर दे दी गई है और आपका खाना इससे महँगा होने वाला है।

और अधिक जानकारी हेतु अधिसूचना संख्या 16/2021-CT(R) और 17/2021-CT(R) को देखा जा सकता है।

8. ईकॉमर्स ऑपरेटर्स द्वारा संचालित यात्री वाहन का कर दायरा बढ़ा:

सरकार ने 1 जनवरी से ई -कॉमर्स ऑपरेटर्स की कर योग्यता का दायरा बढ़ाने हेतु भी दिनांक 18 नवम्बर 2021 को जारी अधिसूचना संख्या 16/2021-CT(R) और 17/2021-CT(R) मे इसका उल्लेख किया है।

ई -कॉमर्स ऑपरेटर के माध्यम से यात्रियों के परिवहन की सेवाओं की करदेयता का दायरा बढ़ा दिया गया है ताकि “Omnibus” और “Any other motor vehilce” को शामिल किया जा सके। इन सेवाओं पर जो छूट पहले थी उसे भी संसोधित करके टैक्स के दायरे मे  अब लाया गया है। इस बदलाव के साथ अग्ग्रेगेटर्स ( जैसे की Ola,Uber आदि ) का उपयोग करके प्राप्त ऑटो ई-रिक्सा आदि की सेवाएं जीएसटी के आधीन 5% कर दर मे होगी। ऐसे मामलों मे अग्ग्रेगेटर्स ही जीएसटी का भुगतान करने के उत्तरदायी होंगे।

9. आधार सत्यापन /प्रमाणित अब कई और जगह भी अनिवार्य किया गया:

सरकार ने अधिसूचना संख्या 38/2021 दिनाँक 21.12.2021 को जारी कर एक जनवरी 2022 से जीएसटी के नियम 10B को लागू कर दिया है। इस नियम के अन्तगर्त अब किसी भी पंजीकृत करदाता को आधार सत्यापन इन कारणों मे भी करना पड़ेगा –

  • जहाँ पर रिफंड का आवेदन फार्म RFD-01 में नियम 89 के तहत किया जा रहा है।
  • जहाँ पर IGST का रिफंड निर्यात करने पर नियम 96 मे लिया जा रहा है ।
  • जहाँ पर पंजीयन रद्द हुआ हो और उसे revoke करने हेतु आवेदन फॉर्म REG-21 मे नियम 23 के तहत किया जा रहा हो।

ज्ञात हो नए पंजीकरण हेतु आधार सत्यापन सरकार ने पिछले वर्ष से ही लागू कर दिया था। अब उपरोक्त क्षेत्रों मे भी आधार सत्यापन अनिवार्य कर दिया गया है। इससे कहीं न कहीं जालसाजी और फर्जीवाड़े को रोकने मे मदद मिलेगी।

10. अस्थाई सलंगनक (Provisional Attachment) का दायरा बढ़ाया गया:

सरकार ने अब धारा 83 मे बदलाव कर प्रोविजनल अटैचमेंट् का दायरा भी बढ़ा दिया है जिसके आधार पर अब किसी भी लंबित कार्यवाही  जैसे की assessment, inspection, search, seizure ,arrest, summon, demand & recovery के तहत कर विभाग प्रोविजनल अटैचमेंट कर सकता है। इस धारा के तहत आपकी किसी भी सम्पति और बैंक खातों को अटैच किया जा सकता है। यह धारा अमूमन राजस्व सुरक्षा के हित को ध्यान में रखकर कर आयुक्त द्वारा लगाई जाती है। पिछले कुछ महीनो से जीएसटी में जो फर्जीवाड़े उभर कर सामने आ रहे है उसे ध्यान मे रखते हुए तत्पर वसूली के हित को ध्यान में रखकर सरकार ने नियम 83 मे संसोधन किया है। इसके पहले प्रोविजिनल अटैचमेंट कुछ गिने चुने लंबित मामलों मे ही लगाया जा सकता था जिसे अब सरकार ने विस्तारित कर दिया है। उदाहरण के तौर मान लीजिये कर अधिकारी आपको धारा 70 में सिर्फ summon ही जारी करता है तब भी अब टैक्स डिपार्टमेंट आपकी सम्पति का प्रोविजनल अटैचमेंट कर सकता है। लेखक का मानना है की कहीं न कहीं इस प्रावधान को लाने से कर चोरों पर नकेल कसेगी साथ ही कर वसूली में भी तेजी आएगी। अब देखने वाली बात यह होगी की कहीं इस धारा मे दी गई शक्तियों का दुरूपयोग न हो जाये।

प्रोविजनल अटैचमेंट की यह धारा उन व्यक्तियों पर भी लागू होगी जो किसी भी लेनदेन जहाँ पर कर चोरी हुई है और उसका लाभ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उन्हें भी मिला हो या उनकी मिलीभगत से कर चोरी को अंजाम दिया गया है। यह सरकार को धोखाधड़ी वाले लेनदेन एवं बिचौलियों पर नक़ल कशने में तुरुप का इक्का सिद्ध होगा।

11. परिवहन मे माल और वाहनों को रोकना जब्त करना और छोड़ने के नियमों में बदलाव:

अब तक धारा 129(1)(a) के अनुसार रास्ते मे पकड़ें गए माल को 100% टैक्स और 100% पेनल्टी के साथ छोड़ने का प्रावधान था। लेकिन 1 जनवरी 2022 से इसे अब 200% पेनल्टी में संसोधित कर दिया गया है।  इस धारा में बदलाव करने के पीछे कहीं न कहीं सरकार की कुछ कानूनी बाध्यता रही होगी। लेखक का मानना है की जो माल रास्ते में पकड़ा जाता है उसे बिना आपूर्ति ( supply) प्रमाणित किये कर नहीं वसूला जा सकता है क्यों की जीएसटी तो उस राज्य में आपूर्ति होने पर ही लगता है। धारा 129, जिसके अनुसार माल को सिर्फ रास्ते में रोका जा सकता है उसे अब धारा 130 जिसमे की माल को जब्त किया जाता है से अलग कर दिया गया है। जब की पहले सिर्फ धारा 129 में निकाले गए टैक्स एवं पेनल्टी न भरने पर धारा 130 लागू कर माल जब्त कर लिया जाता था। यह बदलाव कुछ न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों के आधार पर विसंगति को दूर करने के मकसद से किया गया है। अब धारा 130  अपने आप में एक स्वतंत्र धारा बन गई है जो की धारा 129 पर निर्भर नहीं रहेगी। इसके अलावा अब ट्रांसपोर्टर भी जब्त किये गए वाहन को या तो पेनल्टी की रकम या फिर एक लाख रुपये जो भी कम हो भरकर छुड़ा सकते है।

12. अपील हेतु अग्रिम जमा राशि को ईवेबिल उलन्घन के मामलों मे बढ़ाया गया:

वर्तमान मे अगर कोई अपील कर आयुक्त (अपील) के समक्ष फाइल की जाती है तो  याचिकाकर्ता को विवादित कर का 10% अग्रिम राशि बतौर जमा करना होता है। यह अपील दाखिल करने हेतु एक शर्त है जिससे की उस मामले में जब तक अपीलीय प्राधिकरण का निर्णय नहीं आता तब तक खुद ब खुद स्टे मिल जाता। यह नियम अब तक सभी प्रकार के मामलों पर लागू होता था। लेकिन 1 जनवरी 2022  से यह राशि जहाँ ई-वेबिल के उलंघन हेतु धारा 129(3) में 200% पेनल्टी लगाई गई हो वहां इसे बढाकर 25% कर दिया गया है। बाकी सभी जगहों पर 10% अग्रिम जमा देने के नियम में यथास्थिति बनी रहेगी।

अब मजे की बात यह है की जब भी रास्ते में ई-वेबिल की कमी बाबत कोई माल पकड़ा जाता है तब कर अधिकारी प्राय:बिना पेनल्टी वसूले माल नहीं छोड़ते है। तो ऐसी स्तिथि में जब करदाता 200% पेनल्टी पहले ही जमा करा चुका होता है तो फिर से 25% जमा कराने का तो कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। इस तरह ऐसे मामलों में यह 25% का नियम अनुपयोगी बन जाता है।

13. कुछ अन्य बदलाव:

वर्तमान में धारा 151 के अनुसार कर आयुक्त केवल अधिसूचना जारी कर जीएसटी सम्बंधित किसी प्रकार का किसी से भी डाटा माँग एवं संग्रह कर सकता है। ऐसे में उस व्यक्ति को माँगी गई जानकारी हर हाल में देनी पड़ती है। अब 1 जनवरी 2022 से अधिसूचना जारी करके जानकारी माँगने के प्रावधान को हटाकर कर आयुक्त को सामान्य  शक्तियाऍं (General Powers) दे दी गई है। अब कर आयुक्त जीएसटी सम्बंधित किसी भी व्यक्ति से कोई भी जानकारी बिना किसी अधिसूचना जारी किये मांग सकता है।

उसी प्रकार धारा 152 जो की सूचना के प्रकटीकरण पर रोक है उसमे कुछ जानकारियां /सूचना जो की किसी व्यक्ति के रिटर्न के सम्बन्ध में धारा 150 या 151 में एकत्रित की गई है वो बिना उस व्यक्ति की सहमति के कहीं भी नहीं दी जा सकती है और किसी भी कारवाही में भी व्यवहार में नहीं लाई जा सकती है। यह नियम पहले सिर्फ व्यक्तिगत रिटर्न्स या उससे सम्बंधित जानकारी पर लगता था। लेकिन अब 1 जनवरी से रिटर्न्स की जानकारी के अलावा कोई भी जानकारी जो की धारा 150 या 151 मे इकट्ठी की गई है तो वो भी प्रकाशित की जा सकती है तथा किसी और कार्यवाही में भी इस्तेमाल की जा सकती है।

इस बदलाव का मुख्य उद्देस्य अंतर बिभागीय जानकारी को साझा कर टैक्स चोरों पर नकेल कसना है।

14. निष्कर्ष (CONCLUSION):

उपरोक्त बदलावों को पढ़ने के बाद एक बात तो पक्की समझ में आती है की सरकार कर चोरी और फर्जीवाड़े में किसी प्रकार की कोई रियायत नहीं देना चाहती है। अगर सही मायने में बात की जाये तो कर चोरों को किसी प्रकार की कोई सुविधा भी नहीं मिलनी चाहिए। यह हमारे देश को आर्थिक रूप से पछाड़ खोखला कर देते है। करदतों के लिए अब समय आ गया है के वे चेत जाएँ और अपने व्यापार करने के तरीकों में बदलाव लावे। सरकार कर मामलों की सही समय पर अनुपालना हर कीमत पर चाहती है। साथ ही यह भी अपेक्षा रखती है की आप उन्ही व्यापारियों से कारोबार करे जो अनुशासित है और जो कर अनुपालना करते है। अन्यथा दूसरे लोगों द्वारा की गई गल्ती एवं लापरवाही के कारण आप ईमानदार करदाता होते हुए भी दण्डित किये जा सकते है।

*****

नोट : इस लेख में दी गयी जानकारी लेखक की खुद की समझ के अनुसार तैयार की गई है। इसके दूसरे मतलब भी हो सकते  है। कृपया इस लेख में लिखी बातों पर अमल करने से पहले कानून के प्रावधानों को एक बार फिर से पढ़ लेवे।

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