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जीएसटी विवाद मार्गदर्शन: प्री-डिपॉजिट रिफंड अधिकार, धारा 74 दंड पर सुप्रीम कोर्ट की सीमित राहत और 100% जुर्माने से बचने की अनिवार्य शर्तें

हाल के न्यायिक निर्णयों ने जीएसटी से जुड़े कई व्यावहारिक विवादों पर महत्वपूर्ण स्पष्टता प्रदान की है। प्रथम मुद्दे में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अपील दाखिल करते समय जमा किया गया वैधानिक प्री-डिपॉजिट सामान्य रिफंड नहीं है और इसे धारा 54 के तहत नहीं देखा जा सकता। इसकी वापसी जीएसटी अधिनियम की धारा 107(6) और धारा 115 के तहत एक विशेष प्रक्रिया के अनुसार की जानी चाहिए तथा सफल अपील की स्थिति में इसे ब्याज सहित लौटाया जाना चाहिए। दूसरे मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उच्च न्यायालय ने तथ्यों के छिपाने (Suppression of Facts) के आधार पर धारा 74 के तहत लगाए गए दंड को सही ठहराया है, तो ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करता और विशेष अनुमति याचिका खारिज की जा सकती है। तीसरे मामले में उच्च न्यायालय ने कहा कि केवल टैक्स जमा कर देने से धारा 74 के दंड से राहत नहीं मिलती; इसके लिए नोटिस से पहले टैक्स, ब्याज और 15% स्वैच्छिक दंड का भुगतान आवश्यक है।

समस्या 1-

क्या Ist अपील स्वीकार  होने के बाद भी आपके प्री-डिपॉजिट रिफंड को सामान्य रिफंड (धारा 54) मानकर जटिल प्रक्रियाओं में उलझाया जा रहा है?

उत्तर –

यह कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैधानिक पूर्व-जमा (Statutory Pre-deposit) की वापसी धारा 107 (6) और 115 के तहत एक विशिष्ट प्रक्रिया है, जिसके लिए धारा 54 की सामान्य व्याख्या अनावश्यक है।

संदर्भ-

In the Supreme Court of India Hon’ble Sanjay Kumar & K. Vinod Chandran, JJ.

State of Jharkhand & Ors. Vs. BLA Infrastructure Private Limited

C.A. No. 000170 / 2026 SLP(C) No. 001410 / 2026 Diary No. 56452/2025 January 9, 2026

विचाराधीन विषय –

क्या पूर्व-जमा (Pre-deposit) की वापसी धारा 54 के तहत सामान्य रिफंड मानी जानी चाहिए या धारा 107 (6) और धारा 115 के तहत एक विशिष्ट प्रक्रिया ?

मेसर्स बीएलए इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड ने अपील दाखिल करने के लिए वैधानिक पूर्व-जमा राशि जमा की। प्रतिवादी अपील की कार्यवाही में सफल रहा।  झारखंड उच्च न्यायालय ने जेजीएसटी अधिनियम की धारा 54 की व्याख्या करते हुए धनवापसी राहत प्रदान की। झारखंड राज्य ने उच्च न्यायालय की व्याख्या को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।  सर्वोच्च न्यायालय ने अपील का निपटारा करते हुए माना कि धनवापसी धारा 107(6) के साथ धारा 115 से संबंधित है और चार सप्ताह के भीतर ब्याज सहित धनवापसी का आदेश दिया।

निर्णय –

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने करदाता के पक्ष में निर्णय दिया।

लेखक की टिप्पणी –

यह कि टैक्स प्रोफेशनल  को ध्यान देना चाहिये Iकि जब क्लाइंट की अपील स्वीकार हो। तो प्री-डिपॉजिट रिफंड के लिए धा 107(6) और धारा 115 के विशिष्ट प्रावधानों का ही हवाला दें। तथा धारा 54 के तहत अनअवेलेबल या अनुचित रिफंड की दलीलों से बचें, क्योंकि प्र डिपॉजिट रिफंड एक स्वतः अधिकार (Statutory Right) है । जिस पर जो ब्याज भी मिलना चाहिए ।

समस्या 2-

क्या उच्च न्यायालय द्वारा धारा 74 के तहत पुष्टि किए गए भारी शास्ति के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय से राहत मिलने की कोई उम्मीद है?

उत्तर –

नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि तथ्यों को छिपाने (Suppression) के आधार पर शास्ति अधिरोपण को सही ठहराया गया है, तो हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता और स्पेशल लीव पेटिशन को खारिज कर दिया जाएगा।

संदर्भ –

In the Supreme Court of India Hon’ble J.B. Pardiwala & R. Mahadevan, JJ.

Sriba Nirman Company Vs. The Commissioner (Appeals), Guntur, Central Tax and Customs & Ors. May 16, 2025 Petition for Special Leave to Appeal (C) No.14270/2025

विचाराधीन विषय-

Determination of tax – Section 74 of CGST Act, 2017 – The SC held that there was no good reason to interfere with the impugned order, effectively upholding the dismissal of the challenge regarding penalties u/s 74 and interest u/s 50 of the CGST Act Consequently, the Court dismissed the petition.

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा 29 जनवरी, 2025 को पारित निर्णय।दंड को बरकरार रखते हुए। सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (सी) संख्या 14270/2025 दायर की गई। मामले की सुनवाई 16 मई, 2025 को खंडपीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता को सुना गया और न्यायालय द्वारा अभिलेखों की जांच की गई। उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण न होने के कारण विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है।

निर्णय –

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने SLP को खारिज किया।

लेखक की टिप्पणी –

यह कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस एसएलपी(SLP )को खारिज किया जाना यह संकेत देता है कि जीएसटी के तहत तथ्यों को छिपाना(Suppression of Facts)  के मामलों में उच्च न्यायालय के विवेकाधीन निष्कर्षों को चुनौती देना बेहद कठिन है। करदाता को सलाह दी जाती है कि वे विवाद को उच्च न्यायालय के स्तर पर ही तथ्यों के आधार पर मजबूती से लड़े, क्योंकि कानून के स्पष्ट उल्लंघन या प्रक्रियात्मक खामी के बिना सर्वोच्च न्यायालय Impugned Order में हस्तक्षेप करने से बचता है ।

समस्या 3-

क्या नोटिस जारी होने से पहले केवल टैक्स जमा कर देने मात्र से आप धारा 74 के तहत भारी शास्ति (Penalty) से बच सकते हैं?

उत्तर –

नहीं, धारा 74 (5) के तहत राहत पाने के लिए नोटिस से पहले टैक्स के साथ-साथ ब्याज (धारा 50) और 15% स्वैच्छिक शास्ति का भुगतान अनिवार्य है, अन्यथा विभाग 100% तक शास्ति अधिरोपण कर सकता है।

संदर्भ

In the High Court of Andhra Pradesh Hon’ble R. Raghunandan Rao & Maheswara Rao Kuncheam, JJ.

Sriba Nirman Company Vs. The Commissioner Appeals and Others Writ Petition No.: 25826 of 2023 January 29, 2025

विचाराधीन विषय-

Determination of tax – Section 74 of CGST Act, 2017 – The HC dismissed the writ petition, holding that the non-filing of monthly returns and non-payment of tax amounts to suppression of facts u/s 74 of the CGST Act The Court further clarified that the petitioner could not seek immunity u/s 74(5) because they failed to pay the required interest u/s 50 and the 15% penalty before the issuance of the show cause notice.

यह कि वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए GSTR-3B दाखिल न करना और GST का भुगतान न करना  31.07.2018 को DGGI द्वारा निरीक्षण, जिसके बाद सितंबर 2018 तक किश्तों में कर का भुगतान किया गया। 03.09.2020 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें धारा 74 के तहत ब्याज और जुर्माने की मांग की गई। न्यायनिर्णय आदेश में मांग की पुष्टि की गई; अपीलीय प्राधिकरण ने 26.07.2022 को जुर्माने को बरकरार रखा। धारा 74 के लागू होने की वैधता के खिलाफ उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई।मासिक रिटर्न दाखिल न करना जानबूझकर जानकारी छिपाने के बराबर मानते हुए रिट याचिका खारिज कर दी गई।

लेखक की टिप्पणी-

यह कि  केवल मूल टैक्स (Base Tax) का भुगतान कर देना।विभाग की दंडात्मक कार्यवाही को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि विभाग ने जांच शुरू कर दी है, तो धारा 74 (5) का लाभ लेने के लिए गणना किए गए ब्याज और 15% शास्ति का भुगतान कारण बताओ नोटिस जारी होने से पहले ही कर देना चाहिए । मासिक रिटर्न न भरना तथ्यों को छिपाने (Suppression) की श्रेणी में माना जा सकता है, जिससे विभाग को 5 साल तक की विस्तारित अवधि (Extended Period) के भीतर नोटिस जारी करने का अधिकार मिल जाता है।

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डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं।

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