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भारत में जीएसटी लाया गया था एक सुविधाजनक और सरल अप्रत्यक्ष कर कानून करदाताओं को सुलभ उपलब्ध करवाने के लिए लेकिन प्रारम्भ से ही इस कानून में कुछ ऐसे प्रावधान लाये गए थे जिनके  बारे में विशेषज्ञों ने प्रारम्भ में ही आगाह कर दिया था कि ये प्रावधान जीएसटी को सरल कानून तो बनने नहीं देंगे बल्कि इसे करदाताओं के लिए भारी मुसीबत भी खड़ी करेंगे.

रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म जिसे आम तौर पर RCM के नाम से जाना जाता है यह भी एक ऐसा ही प्रावधान है जो प्रारम्भ से ही विवादों का विषय रहा और इसीलिये पहले जब यह व्यापक रूप से लागू किया गया था उसे कुछ ही माह बाद इसका बहुत बड़ा हिस्सा वापिस ले लिया गया था लेकिन इसका जो हिस्सा बच गया था वह भी अपने आप में कोई तार्किक या व्यवहारिक प्रावधान नहीं था और कई डीलर्स के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है .

Read in English: Problem of GST RCM and Suggestion

देखिये समस्या क्या है कि जीएसटी मुख्य रूप से एक विक्रेता या सप्लाई करने वाले द्वारा भुगतान करने वाला कर है. माल या सेवा प्राप्त करने वाला इस कर का भुगतान करे यह एक अपवाद है और किसी नए कर में इस तरह के अपवादों का पालन करने में गलती होना या भूल होना कोई विशेष बात नहीं है और रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म को लेकर भी कई डीलर्स से इस तरह की भूलें हुई है .

आइये देखें कि अधिकाँश रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के प्रावधानों में होता क्या है ? जिन सेवाओं और माल के लिए रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत कर के भुगतान  को अधिसूचित किया गया है उनमें माल या सेवा प्राप्त करने वाला रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत कर का भुगतान करता है और इसके भुगतान के बाद उसकी इनपुट क्रेडिट ले लेता है और इस प्रकार से इस प्रकार के रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत भुगतान किये जाने वाले कर का कोई वित्तीय प्रभाव नहीं होता है . आइये इसे एक उदहारण के जरिये समझने का प्रयास करें :-

X and Company एक मिनरल का व्यवसायी है और एक माइंस उनके पास है. इस कंपनी ने मार्च 22 में 10 लाख रूपये की बिक्री की है और उस पर 5 प्रतिशत की दर से 50 हजार रूपये कर बनता है .

इसी माह में X and Company ने राज्य सरकार को रोयल्टी के रूप में 2 लाख रूपये का भुगतान किया जिसपर उसे रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत 18 प्रतिशत की दर से कुल 36 हजार रुपये का भुगतान करना था और यदि वह इस कर का भुगतान करता तो फिर उसी माह में उसको 36 हजार रूपये की इनपुट क्रेडिट मिल जाती और इसे 50 हजार रूपये का कर इस तरह चुकाना होता :-

1. रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत 36000.00 रूपये (रिवर्स चार्ज का भुगतान हमेशा रोकड़ में करना होता है )

2. शेष कर 14000.00 रूपये का रोकड़ भुगतान

इस प्रकार से X and Company ने कुल रोकड़ भुगतान 50000.00 किया गया है .

आइये अब हम ये देखें कि X and Company ने रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत कर का भुगतान नहीं किया तब वह कर का भुगतान किस तरह से करेगा .

यदि X and Company ने रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत 36000.00 रूपये का भुगतान नही किया है तो फिर उसे इसकी इनपुट क्रेडिट भी नहीं मिलेगी और यदि इनपुट क्रेडिट नहीं मिलेगी तो उसे 50000.00 रूपये का भुगतान करना होगा.

दोनों ही परिस्तिथियों में X and Company ने 50000.00 रूपये का भुगतान किया है और सरकार को भी इस परिस्तिथि में 50000.00 रूपये कर मिला ही है और इस तरह से यह रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म का कर बिना वित्तीय प्रभाव का कर होता और अधिकाँश हालात में इसका सरकार के राजस्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.

अगर यह रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म कर बिना वित्तीय प्रभाव नहीं है और सरकार को भी पूरा कर मिल रहा है तो फिर इस प्रावधान को पूरा नहीं करने पर इस भूल को माफ़ कर दिया जाना चाहिए. इसका सीधा सा नियम होना चाहिए :-

रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म कर का भुगतान किया है तो उसका इनपुट क्रेडिट मिल जायगा और यदि इसका भुगतान नहीं किया है तो फिर इसकी इनपुट क्रेडिट नहीं मिलेगी तो फिर इसके लिए जहां इसकी इनपुट क्रेडिट मिलनी है वहां इस प्रावधान का पालन नहीं हो तो वित्तीय रूप से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है तो फिर इसके कोई विपरीत प्रभाव करदाता पर नहीं होना चाहिए .

यहाँ आप ध्यान रखें कि “क्या होना चाहिए” किसी भी एक कानून का तार्किक पक्ष होता है लेकिन जीएसटी में कई जगह और विशेष तौर पर रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म में तर्क का कोई बहुत अधिक स्थान नहीं है तो आइये इस भूल का खामियाजा X and Company को क्या भुगतना होगा :-

X and Company ने रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के कर का भुगतान नहीं किया है और यह रकम 36000.00 रूपये थी और इस समय X and Company को 36000.00 रुपया जमा करवाने का आदेश दिया जाता है तो फिर इस समय उसे 36000.00 रुपया जमा करवाना पडेगा और उस पर ब्याज भी भरना होगा. चलिए यहाँ तक भी ठीक हो सकता है लेकिन सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि अब उसकी इनपुट क्रेडिट भी नहीं मिलेगी क्यों मार्च 22 को समाप्त वर्ष की इनपुट क्रेडिट लेने का अंतिम समय 30 नवम्बर को समाप्त हो गया है .

यहाँ ध्यान से देखिये कि वितीय रूप से X and Company ने कोई बहुत बड़ा या छोटा भी अपराध नही किया है उसने किया सिर्फ इतना ही है कि जो कर उसे रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म कर सहित कर जमा करना था वो भी उसने ईमानदारी से और समय पर जमा कराया भी है लेकिन इसे अपना रिटर्न भरते समय रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत नहीं दिखाया था जिसे आप एक तकनीकी गलती या भूल कह सकते हैं. लेकिन सिर्फ इस गलती के कारण उसे यह रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत बनने वाला कर अभी जमा करवाया जाए और जिस तरह से रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म में जमा कर की इनपुट क्रेडिट मिलनी थी वह भी नहीं दी जाए.

इस तरह से यह ब्याज सहित दिया जाने वाला वह दंड होता जो कि X and Company के द्वारा की गई एक तकनीकी भूल के कारण था और जीएसटी कानून की यही सख्ती इस कानून को अव्यवहारिक बनाती है.

यदि इस तरह की भूल या गलती 2017 से हुई है और अभी तक भी चल रही है तो फिर आप सोच लीजिये डीलर्स के लिए इस नुक्सान की क्या सीमा होगी !!!!

यह तो एक उदाहरण हमने माइनिंग रॉयल्टी का दिया है इसी तरह की गलतियां या भूलें ट्रांसपोर्ट खर्च , कपास की खरीद एवं अन्य माल अथवा सेवाओं जिन पर रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत कर लागू है उनके सम्बन्ध में भी हुई है और उनके परिणाम भी इसी तरह से है .

अब सरकार को क्या करना चाहिये

इस तरह के करदाताओं को राहत देने के लिए अब क्या होना चाहिए ?

यदि करदाता ने अपना कर पूरी तरह से चुका दिया है और केवल रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत कर को नहीं दिखाया है तो ऐसे में पूरे कर की वसूली ब्याज सहित करने और फिर उसकी इनपुट क्रेडिट भी रोक लेने से ऐसे डीलर्स पर एक अनावश्यक बोझ पडेगा जो एक तकनीकी गलती या भूल को देखते हुए एक बहुत ही अव्यवहारिक दंड है .

वास्तव में रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत मिलने वाला कर सरकार का राजस्व तब हो सकता है जब कि डीलर एक ऐसी सेवा और माल खरीदता है और इसे एक ऐसी माल या सेवा को बनाने या सप्लाई करने के लिए करता है जी करमुक्त है यदि रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म का भुगतान के बाद करयोग्य माल या सेवा की सप्लाई की जाए तो फिर ऐसे रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के कर का प्रभाव शून्य हो जाएगा.

इस समय की सबसे बड़ी जरुरत है कि सरकार इस मुद्दे पर गौर करे और इस तरह के वित्तीय प्रभाव रहित रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म कर से राहत दे ताकि इस अनावश्यक बोझ से व्यापर जगत बच सके.

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