ह्रास  का अर्थ

यदि कोई व्यापर या पेशा किया जाता है तो उसमें आयकर बचाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि  ह्रास के खर्चे को क्लेम किया जाये। हालाँकि ह्रास का खर्चा कैश में किये जाने वाला खर्च नहीं है, लेकिन फिर भी आयकर कानून में इसकी छूट दी जाती है।

लेकिन, बहुत से लोगो को ह्रास की आयकर में मिलने वाली छूटों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी नहीं होती है। इसलिए या तो वह ह्रास को क्लेम नहीं कर पाते या गलत क्लेम करते है।

किसी भी व्यापर या पेशे में जब कोई संपत्ति खरीदी जाती है, तो उसको काम में लेने की वजह से या उसके पुराने होने की वजह से धीरे – धीरे उसका मूल्य कम होता रहता है। और जब यह संपत्ति पूरी तरह से काम करना बंद कर देती है, तो व्यापारी को उसके स्थान पर नई संपत्ति खरीदनी पड़ती है। जिससे उसका बिज़नेस सही तरीके से चल सके।

लेकिन, नई संपत्ति को खरीदने की वजह से उसका काफी पैसा खर्च हो जाता है और साथ ही उस नई संपत्ति को खरीदने की उसको आयकर में छूट भी नहीं मिलती है। इस वजह से उसके बिज़नेस की आर्थिक गतिविधियाँ भी ख़राब हो जाती है।

इसलिए, सरकार द्वारा लोगो के व्यापर और पेशे को प्रोत्साहित करने के लिए ह्रास की छूट दी जाती है कहने का  अर्थ यह है कि एक व्यापारी एक निश्चित प्रतिशत के हिसाब से हर साल अपनी संपत्ति के मूल्य में कमी आने की आयकर में छूट ले सकता है।

यह निश्चित प्रतिशत हर संपत्ति के लिए अलग -अलग होती है, जिसकी लिस्ट आयकर क़ानून में दी गई है। ह्रास की छूट किसी भी संपत्ति की खरीद लागत पर ली जाती है।

किसी भी व्यापर या पेशे की आय में से ह्रास की छूट लेने के लिए कुछ शर्ते  पूरी करना जरुरी है।

संपत्ति का मालिक वह करदाता होना चाहिए जो कि इसकी छूट का लाभ ले रहा है ( चाहे पूरी संपत्ति का मालिक हो या उसके कुछ भाग का )

  • उस सम्पति का प्रयोग उस करदाता के व्यापर या पेशे के लिए होना चाहिए। यदि कोई सम्पति 50 % व्यापर के लिए और 50 % घरेलु काम में आ रही है, तो इसके सिर्फ 50 % भाग के ह्रास की ही छूट प्राप्त होगी।
  • किसी भी जमीन (Land ) पर ह्रास नहीं लगाया जाता है, इसलिए इसकी छूट नहीं ली जा सकती है।
  • यदि, किसी संपत्ति के एक से अधिक मालिक है तो वे अपने -अपने हिस्से के मूल्यहास की छूट ले सकते है।
  • ह्रास की गणना करते समय 180 दिनों का नियम तब लागू होता है जब कोई सम्पति किसी वर्ष के दौरान माह सितम्बर के बाद खरीदी जाती है और उस सम्पति का उपयोग उस वर्ष में 180 दिनों से कम समय के लिए किया जाता है। उस संपत्ति को पूरेवर्ष के ह्रास की छूट का लाभ नहीं दिया जाता है

इसलिए,यदि कोई सम्पति जिस वर्ष में खरीदी जाती है और उस वर्ष में 180 दिन से कम  समय के लिए काम में ली जाती है तो उस संपत्ति पर पूरी दर से ह्रास नहीं मिलेगा बल्कि उस रेट की 50 % से गणना की जायेगी

Written Down Value (अपलिखित मूल्य) क्या होता है ? 

अपलिखित मूल्य किसी भी सम्पति की वास्तविक कीमत होती है, जो कि उसे खरीदने में खर्च की गयी है। अपलिखित मूल्य को निकालने के सम्बन्ध में 2 तरीके होते है –

  • यदि कोई सम्पति चालू वर्ष में खरीदी गयी है तो उसकी लागत को ही उसका अपलिखित मूल्य माना जायेगा

और कोई सम्पति पहले के वर्षो में खरीदी गयी थी तो उसकी लागत में से आयकर कानून के हिसाब से स्वीकृत किये गए ह्रास को घटाया जायेगा और बची राशि को उस सम्पति का अपलिखित मूल्य माना जायेगा

संपत्तियों का खण्ड

ऐसी मूर्त संपत्तिया जो एक ही वर्ग की हो ( जैसे भवन,मशीनरी,सयंत्र,आदि) अथवा अमूर्त संपत्तिया (तकनीकी ज्ञान, पेटेंट, ट्रेडमार्क आदि) तथा जिन पर ह्रास की एक ही दर लागु हो सम्पतियो का एक खण्ड (Block Of Assets)  कहलाता है ह्रास सम्पतियो के एक खण्ड (Block Of Assets) के आधार पर स्वीकृत होता है जो उस खण्ड के अपलिखित मूल्य पर निर्धारित दर से घटाया जाता है

Author Bio

More Under Income Tax

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Search Posts by Date

June 2021
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930