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1 अगस्त 2026 से ई-वे बिल प्रणाली में प्रस्तावित बदलाव

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सारांश:जीएसटीएन द्वारा जारी एफएक्यू के अनुसार 1 अगस्त 2026 से ई-वे बिल प्रणाली में दो प्रमुख बदलाव प्रस्तावित हैं। पहला, बील-टू/शीप-टू तथा कॉम्बिनेशन ट्रांजैक्शन में, जहाँ वास्तविक शीप-टू पार्टी जीएसटी में पंजीकृत है, वहाँ उसका शीप-टू जीएसटीआईएन दर्ज करना अनिवार्य होगा, जबकि जीएसटीआईएन उपलब्ध न होने पर लागू स्थिति में “यूआरपी” दर्ज किया जा सकेगा। यह व्यवस्था नियमित, एक्सपोर्ट, मर्चेंट एक्सपोर्टर तथा विभिन्न ई-वे बिल जनरेशन माध्यमों पर भी लागू होगी। जीएसटीएन ने स्पष्ट किया है कि शीप-टू जीएसटीआईएन ई-वे बिल पर प्रिंट नहीं होगा, टैक्सपेयर, ट्रांसपोर्टर या एपीआई के माध्यम से प्रदर्शित नहीं होगा तथा केवल अधिकृत अधिकारियों को ही दिखाई देगा। दूसरा, माल की डिलीवरी पूर्ण होने के बाद ई-वे बिल को स्वैच्छिक रूप से “क्लोज़्ड” चिन्हित करने की सुविधा उपलब्ध होगी, जो डिलीवरी की तिथि या उसके अगले दिन उपयोग की जा सकती है तथा ई-वे बिल की वैधता समाप्त होने के एक दिन बाद तक उपलब्ध रहेगी। व्यवसायों को 1 अगस्त 2026 से पूर्व मास्टर डेटा, ईआरपी/एपीआई सिस्टम अपडेट करने, संबंधित टीमों को प्रशिक्षित करने तथा आवश्यक आंतरिक प्रक्रियाएँ तैयार करने की सलाह दी गई है।

नीचे क्लाइंट्स की जानकारी एवं आवश्यक तैयारी के लिए संक्षिप्त प्रश्नोत्तर दिए जा रहे हैं।

भाग A — शीप-टू जीएसटीआइएन (GSTIN) दर्ज करने की अनिवार्यता

प्रश्न: ये बदलाव कब से लागू होंगे?

उत्तर: दोनों बदलाव 1 अगस्त 2026 से लागू किए जाने प्रस्तावित हैं।

प्रश्न: मुख्य अनिवार्य बदलाव क्या है?

उत्तर: बील-टू/शीप-टू तथा कॉम्बिनेशन ट्रांजैक्शन में, जहाँ वास्तविक शीप-टू पार्टी जीएसटी के अंतर्गत रजिस्टर्ड है, वहाँ उसका जीएसटीआइएन अनिवार्य रूप से दर्ज करना होगा।

जहाँ शीप-टू पार्टी का जीएसटीआइएन उपलब्ध नहीं है, वहाँ लागू स्थिति में यू आर पी” दर्ज किया जा सकता है।

प्रश्न: किन ट्रांजैक्शन में शीप-टू जीएसटीआइएन आवश्यक होगा?

उत्तर:

ट्रांजैक्शन का प्रकार शीप-टू जीएसटीआइएन की आवश्यकता
रेगुलर ट्रांजैक्शन — माल सीधे खरीददार को भेजा जाता है आवश्यक नहीं
बील-टू/शीप-टू — बिल खरीददार को जारी होता है, लेकिन माल किसी तीसरी पार्टी को भेजा जाता है अनिवार्य
बील-फ्रॉम/डिस्पैच-फ्रॉम — माल किसी तीसरी पार्टी के स्थान से भेजा जाता है, लेकिन डिलीवरी खरीददार को होती है आवश्यक नहीं
कॉम्बिनेशन ट्रांजैक्शन — माल किसी तीसरी पार्टी के स्थान से भेजकर किसी अन्य पार्टी को डिलीवर किया जाता है अनिवार्य

प्रश्न: बील-टू/शीप-टू ट्रांजैक्शन क्या होता है?

उत्तर: यह ऐसा ट्रांजैक्शन है जिसमें इनवॉइस खरीददार के नाम पर जारी किया जाता है, लेकिन खरीददार के निर्देश पर माल किसी अन्य व्यक्ति को भेजा जाता है।

उदाहरण: ए लिमिटेड द्वारा बी लिमिटेड के नाम पर इनवॉइस जारी किया गया, लेकिन बी लिमिटेड के निर्देश पर माल सीधे सी लिमिटेड को भेजा गया। ऐसी स्थिति में सी लिमिटेड का जी एस टी आइ एन, शीप-टू जीएसटीआइएन के रूप में दर्ज करना होगा।

प्रश्न: क्या बील-टू जीएसटीआइएन और शीप-टू जीएसटीआइएन समान हो सकते हैं?

उत्तर: नहीं। बील-टू/शीप-टू ट्रांजैक्शन में बील-टू पार्टी और शीप-टू पार्टी अलग-अलग व्यक्ति होने चाहिए।

यदि माल खरीददार के ही गोदाम या उसी जीएसटीआइएन के अंतर्गत रजिस्टर्ड अतिरिक्त व्यवसाय स्थल पर भेजा जा रहा है, तो इसे सामान्यतः बील-टू/शीप-टू ट्रांजैक्शन नहीं माना जाएगा।

ऐसे ट्रांजैक्शन को रेगुलर ट्रांजैक्शन के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए तथा वास्तविक डिलीवरी एड्रेस को संबंधित एड्रेस या प्लेस ऑफ डिलीवरी फील्ड में दर्ज किया जा सकता है।

प्रश्न: यदि शीप-टू पार्टी अनरजिस्टर्ड हो तो क्या दर्ज किया जाए?

उत्तर: जहाँ शीप-टू पार्टी के पास जीएसटीआइएन उपलब्ध नहीं है, वहाँ लागू स्थिति में यू आर पी” दर्ज किया जा सकता है।

प्रश्न: सप्लायर द्वारा ई-वे बिल बनाए जाने पर शीप-टू जीएसटीआइएन कैसे दर्ज किया जाएगा?

उत्तर: जहाँ बील-टू/शीप-टू ट्रांजैक्शन में सप्लायर ई-वे बिल जनरेट करता है, वहाँ खरीददार द्वारा शीप-टू जीएसटीआइएन उपलब्ध कराए जाने पर सप्लायर उसे ई-वे बिल में दर्ज कर सकता है।

प्रश्न: यदि खरीददार गोपनीयता के कारण शीप-टू जीएसटीआइएन सप्लायर को नहीं बताना चाहता तो क्या किया जा सकता है?

उत्तर: ऐसी स्थिति में खरीददार स्वयं ई-वे बिल जनरेट कर सकता है और शीप-टू जीएसटीआइएन सीधे सिस्टम में दर्ज कर सकता है।

खरीददार द्वारा इस प्रकार ई-वे बिल को इनवर्ड ई-वे बिल के रूप में जनरेट किया जा सकता है। इससे शीप-टू पार्टी की जानकारी सप्लायर के साथ साझा करने की आवश्यकता नहीं होगी।

प्रश्न: क्या ट्रांसपोर्टर बील-टू/शीप-टू ट्रांजैक्शन में ई-वे बिल जनरेट कर सकता है?

उत्तर: हाँ। यदि आवश्यक जानकारी ट्रांसपोर्टर को उपलब्ध करा दी गई है, तो ट्रांसपोर्टर ई-वे बिल जनरेट कर सकता है।

लेकिन यदि खरीददार गोपनीयता के कारण शीप-टू जीएसटीआइएन ट्रांसपोर्टर को भी नहीं बताना चाहता, तो खरीददार स्वयं ई-वे बिल जनरेट कर सकता है।

प्रश्न: क्या शीप-टू पार्टी को मूल सप्लायर या खरीददार की जानकारी दिखाई देगी?

उत्तर: जीएसटीएन के अनुसार सिस्टम को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि व्यावसायिक रूप से संवेदनशील जानकारी की गोपनीयता बनी रहे।

शीप-टू जीएसटीआइएन:

  • ई-वे बिल पर प्रिंट नहीं होगा;
  • टैक्सपेयर या ट्रांसपोर्टर को प्रदर्शित नहीं होगा;
  • गेट ई-वे बिल ए पी आई के माध्यम से उपलब्ध नहीं होगा; तथा
  • केवल अधिकृत अधिकारियों को वेरिफिकेशन एवं एनफोर्समेंट के उद्देश्य से दिखाई देगा।

प्रश्न: एक्सपोर्ट ट्रांजैक्शन में क्या व्यवस्था होगी?

उत्तर: जहाँ माल पोर्ट, एयरपोर्ट, आई सी डी, सी एफ एस, कस्टम्स एरिया, फ्रेट फॉरवर्डर या किसी अन्य एक्सपोर्ट-लिंक्ड लोकेशन पर भेजा जा रहा है और वहाँ कोई घरेलू रजिस्टर्ड शीप-टू जीएसटीआइएन लागू नहीं है, वहाँ यू आर पी” दर्ज किया जा सकता है।

इसके साथ संबंधित पोर्ट, आई सी डी, सी एफ एस अथवा अन्य एक्सपोर्ट-लिंक्ड लोकेशन का वास्तविक भारतीय एड्रेस और पिन कोड सही रूप से दर्ज किया जाना चाहिए।

केवल “यू आर पी” दर्ज करने से ट्रांजैक्शन को किसी घरेलू अनरजिस्टर्ड व्यक्ति को की गई सप्लाई नहीं माना जाएगा। एक्सपोर्ट की प्रकृति निम्न डॉक्यूमेंट्स के आधार पर निर्धारित होगी:

  • एक्सपोर्ट इनवॉइस;
  • शिपिंग बिल;
  • कस्टम्स डॉक्यूमेंट्स;
  • ट्रांसपोर्ट डॉक्यूमेंट्स; तथा
  • अन्य संबंधित रिकॉर्ड्स।

प्रश्न: मर्चेंट एक्सपोर्टर के मामले में क्या व्यवस्था होगी?

उत्तर: जहाँ माल किसी रजिस्टर्ड मर्चेंट एक्सपोर्टर को बिल किया गया है, लेकिन माल सीधे पोर्ट, एयरपोर्ट, आई सी डी, सी एफ एस, कस्टम्स एरिया या किसी अन्य एक्सपोर्ट-लिंक्ड लोकेशन पर भेजा जाता है:

  • बील-टू जीएसटीआइएन के रूप में मर्चेंट एक्सपोर्टर का जीएसटीआइएन दर्ज होगा;
  • जहाँ शीप-टू लोकेशन रजिस्टर्ड है, वहाँ उसका जीएसटीआइएन दर्ज करना अनिवार्य होगा; तथा
  • जहाँ शीप-टू जीएसटीआइएन उपलब्ध नहीं है, वहाँ लागू स्थिति में “यू आर पी” दर्ज किया जा सकता है।

प्रश्न: क्या शीप-टू जीएसटीआइएन ई-वे बिल पर दिखाई देगा?

उत्तर: नहीं। शीप-टू जी एस टी आइ एन:

  • ई-वे बिल पर प्रिंट नहीं होगा;
  • गेट ई-वे बिल ए पी आई के माध्यम से उपलब्ध नहीं होगा; तथा
  • केवल अधिकृत अधिकारियों को वेरिफिकेशन के उद्देश्य से दिखाई देगा।

हालाँकि, शीप-टू एड्रेस और पिन कोड पहले की तरह ई-वे बिल पर दिखाई देते रहेंगे।

प्रश्न: क्या यह नियम ई-इनवॉइस से बनाए गए ई-वे बिल पर भी लागू होगा?

उत्तर: हाँ। यह अनिवार्यता निम्न सभी माध्यमों पर लागू होगी:

  • स्टैंडअलोन ई-वे बिल जनरेशन;
  • आई आर एन और ई-वे बिल एक साथ जनरेट करने पर; तथा
  • आई आर एन के माध्यम से ई-वे बिल जनरेट करने पर।

ई आर पी, जी एस पी, ए एस पी या ए पी आई आधारित सिस्टम का उपयोग करने वाले व्यवसायों को 1 अगस्त 2026 से पहले अपने सॉफ्टवेयर, मास्टर डाटा और ए पी आई पेलोड को अपडेट करना चाहिए।

भाग B — ई-वे बिल का स्वैच्छिक क्लोज़र

प्रश्न: ई-वे बिल क्लोज़र सुविधा क्या है?

उत्तर: इस सुविधा के माध्यम से माल की डिलीवरी पूरी होने के बाद ई-वे बिल को क्लोज़्ड के रूप में चिन्हित किया जा सकेगा।

इसका उद्देश्य सिस्टम में यह रिकॉर्ड करना है कि संबंधित माल की आवाजाही और डिलीवरी पूरी हो चुकी है।

प्रश्न: क्या ई-वे बिल क्लोज़ करना अनिवार्य है?

उत्तर: नहीं। वर्तमान में ई-वे बिल क्लोज़र सुविधा स्वैच्छिक है।

हालाँकि, व्यवसाय इसे डिलीवरी पूरी होने की पुष्टि तथा बेहतर आंतरिक नियंत्रण के रूप में अपना सकते हैं।

प्रश्न: ई-वे बिल कब क्लोज़ किया जाना चाहिए?

उत्तर: जी एस टी एन द्वारा ई-वे बिल क्लोज़ करने की सलाह निम्न समय पर दी गई है:

  • माल की डिलीवरी की तारीख को; या
  • डिलीवरी के तुरंत अगले दिन।

क्लोज़र सुविधा ई-वे बिल की वैलिडिटी समाप्त होने के एक दिन बाद तक उपलब्ध रहेगी।

क्लोज़र डेट के रूप में माल की वास्तविक रिसीप्ट या डिलीवरी डेट दर्ज की जानी चाहिए। यह तारीख ई-वे बिल की जनरेशन डेट से लेकर उसकी एक्सपायरी डेट के बीच की होनी चाहिए।

1 अगस्त 2026 से पहले आवश्यक कार्रवाई

क्लाइंट्स को निम्नलिखित तैयारी करने की सलाह दी जाती है:

1. बील-टू/शीप-टू तथा कॉम्बिनेशन ट्रांजैक्शन की पहचान करें।

2. तीसरी पार्टी के कन्साइनी का सही जीएसटीआइएन प्राप्त करके मास्टर डाटा में दर्ज करें।

3. जहाँ खरीददार शीप-टू जीएसटीआइएन गोपनीय रखना चाहता है, वहाँ खरीददार द्वारा स्वयं ई-वे बिल जनरेट करने की प्रक्रिया निर्धारित करें।

4. “यू आर पी” का उपयोग केवल उचित और लागू स्थिति में करें।

5. शीप-टू एड्रेस, स्टेट कोड तथा पिन कोड की जाँच करें।

6. ई आर पी, बिलिंग सॉफ्टवेयर तथा ए पी आई सिस्टम को अपडेट करें।

7. अकाउंट्स, डिस्पैच और लॉजिस्टिक्स टीम को नए बदलावों के संबंध में प्रशिक्षित करें।

8. डिलीवरी पूरी होने के बाद ई-वे बिल को स्वेच्छा से क्लोज़ करने की आंतरिक प्रक्रिया तैयार करें।

मुख्य निष्कर्ष

बील-टू/शीप-टू तथा कॉम्बिनेशन ट्रांजैक्शन में लागू स्थिति में शीप-टू जीएसटीआइएन दर्ज करना अनिवार्य होगा, जबकि माल की डिलीवरी के बाद ई-वे बिल को क्लोज़ करना वर्तमान में स्वैच्छिक रहेगा। दोनों बदलाव 1 अगस्त 2026 से लागू किए जाने प्रस्तावित हैं।

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संकलन : सीए सतीश गिरधरलाल सारडा | प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड अकाउंटेंट | EMAIL: satishsardanagpur@gmail.com

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