Summary: यह सामग्री जीएसटी अनुपालन की बदलती चुनौतियों पर आधारित एक काल्पनिक संवाद के माध्यम से बताती है कि जीएसटी पोर्टल पहले की तुलना में बेहतर हुआ है, लेकिन अब पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के मिलान, तकनीकी त्रुटियों और उनसे उत्पन्न नोटिसों को लेकर व्यापारियों तथा कर सलाहकारों की परेशानी सामने आती है। इसमें उदाहरण दिया गया है कि विक्रेता द्वारा बिल नंबर, जीएसटी पहचान संख्या, तारीख, कर राशि या अन्य विवरण गलत दर्ज करने का असर खरीदार के कर क्रेडिट पर पड़ सकता है, जबकि लेन-देन वास्तविक, माल प्राप्त और भुगतान किया हुआ हो। सामग्री यह भी रेखांकित करती है कि हर डेटा अंतर कर चोरी या हर तकनीकी गलती धोखाधड़ी नहीं होती। छह महीने तक शून्य विवरणी दाखिल करने वाली फर्मों को पंजीकरण रद्द करने संबंधी नोटिसों के संदर्भ में भी वास्तविक रूप से अस्थायी रूप से बिना कारोबार वाली फर्म और फर्जी फर्म के बीच अंतर करने की आवश्यकता बताई गई है। लेख जीएसटी पोर्टल को केवल त्रुटियां पकड़ने के बजाय उन्हें सुधारने में सहायता करने वाला बनाने और वास्तविक लेन-देन में तकनीकी अंतर के मामलों में करदाता को स्थिति स्पष्ट करने का अवसर देने की बात रखता है।
सपने में अरुण जेटली जी आए… बोले-अब तो जीएसटी पोर्टल सही है ना?
रविवार की सुबह थी। छुट्टी का दिन होने के कारण मैं कुछ देर और सोने के मूड में था।
आंखें बंद थीं और दिमाग में रोज की तरह जीएसटी के आंकड़े, बिल, विवरणी और नोटिस घूम रहे थे।
पता नहीं कब नींद गहरी हो गई।
अचानक मुझे लगा कि कोई मुझे आवाज दे रहा है—
“पापा…पापा…”
मैंने आंखें खोलीं।
सामने स्वर्गीय अरुण जेटली जी खड़े थे।
मैं एकदम चौंक गया।
मैंने हाथ जोड़कर कहा—
“जेटली जी! आप?”
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा—
“हां भाई, मैं ही हूं। काफी समय से तुमसे जीएसटी के बारे में कुछ पूछना चाहता था।”
मैंने कहा—
“जी जेटली जी, पूछिए।”
जेटली जी बोले—
“जब जीएसटी लागू हुआ था, तब तो मुझे देशभर के व्यापारियों और कर सलाहकारों की बहुत शिकायतें सुनने को मिलती थीं। सबसे बड़ी शिकायत जीएसटी पोर्टल को लेकर थी।”
मैंने कहा—
इसकेलिए जेटली जी आपने मुझे ही क्यों चुना
जेटली जी बोले –
जब जीएसटी लागु हुआ था तब तुमने एक आर्टिकल लिखा था की “पल्ले नहीं देल्ला करदी है मेला मेला” तो मैंने आज तुमसे ही मिलने का और पूछने का फैसला किया।
“जी, वह समय तो हमें भी अच्छी तरह याद है।”
जेटली जी मुस्कुराए और बोले—
“लेकिन अब तो जीएसटी को लागू हुए कई साल हो गए हैं। अब तो पोर्टल बिल्कुल ठीक हो गया होगा?”
मैंने कहा—
“जी जेटली जी, अब पोर्टल पहले की तुलना में काफी बेहतर है।”
उनके चेहरे पर संतोष दिखाई दिया।
उन्होंने पूछा—
“तो अब व्यापारियों और कर सलाहकारों की परेशानी भी कम हो गई होगी?”
मैं थोड़ा चुप रहा।
फिर मैंने कहा—
“जेटली जी… यही तो असली कहानी है।”
उन्होंने पूछा—
“क्या हुआ?”
मैंने कहा—
“पहले परेशानी थी कि पोर्टल चल नहीं रहा था।
अब परेशानी यह है कि पोर्टल चल रहा है!”

जेटली जी मेरी तरफ देखने लगे।
मैंने कहा—
“पहले पोर्टल नहीं चलता था तो रिटर्न भरने की चिंता रहती थी। अब पोर्टल चलता है तो उसके आंकड़ों का मिलान होता है, अंतर निकलता है और फिर सूचना या नोटिस आ जाता है।”
जेटली जी बोले—
“अच्छा! तो अब समस्या पोर्टल के न चलने की नहीं, पोर्टल पर दिखाई देने वाली जानकारी की है?”
मैंने कहा—
“जी, कुछ हद तक ऐसा ही समझ लीजिए।”
गलती विक्रेता करे, परेशानी खरीदार को हो
जेटली जी ने पूछा—
“लेकिन इसमें ऐसी क्या बड़ी समस्या है?”
मैंने कहा—
“जेटली जी, मान लीजिए एक व्यापारी ने दूसरे व्यापारी को माल बेचा। बिल बनाया। माल पहुंचा। खरीदार ने बिल अपनी किताबों में दर्ज किया। भुगतान किया और जीएसटी सहित पूरी रकम विक्रेता को दे दी।”
“अब विक्रेता ने विवरणी में बिल का नंबर गलत डाल दिया।”
जेटली जी बोले—
“तो विक्रेता को उसे ठीक कर देना चाहिए।”
मैंने कहा—
“बिल्कुल। लेकिन समस्या यह है कि विक्रेता की गलती का असर कई बार खरीदार के कर क्रेडिट पर पड़ता है।”
जेटली जी बोले—
“मतलब गलती किसी और की और परेशानी किसी और की?”
मैंने कहा—
“जी!”
“विक्रेता ने गलत बिल नंबर डाला—खरीदार परेशान।”
“विक्रेता ने गलत जीएसटी पहचान संख्या डाल दी—खरीदार परेशान।”
“विक्रेता ने गलत तारीख डाल दी—खरीदार परेशान।”
“विक्रेता ने गलत कर राशि डाल दी—खरीदार परेशान।”
“विक्रेता ने बिल समय पर नहीं डाला—खरीदार परेशान।”
जेटली जी ने माथे पर हाथ रखते हुए कहा—
“तो क्या खरीदार को अब अपना व्यापार चलाने के साथ-साथ अपने विक्रेता की जीएसटी विवरणी भी देखनी पड़ती है?”
मैंने कहा—
“कई मामलों में तो स्थिति ऐसी ही बन जाती है।”
बिल सही, माल सही, भुगतान सही… फिर भी सवाल
मैंने जेटली जी को समझाते हुए कहा—
“मान लीजिए खरीदार के पास मूल बिल है। माल वास्तव में खरीदा गया है। माल उसके पास आया है। भुगतान बैंक से हुआ है। जीएसटी भी विक्रेता को दे दिया गया।”
“लेकिन विक्रेता ने जीएसटी पोर्टल पर बिल की जानकारी गलत भर दी।”
“अब खरीदार के सामने सवाल खड़ा हो जाता है कि उसके कर क्रेडिट का क्या होगा?”
जेटली जी कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले—
“लेकिन कर तो विक्रेता ने खरीदार से ले लिया?”
मैंने कहा—
“जी।”
“और सरकार को जमा करने की जिम्मेदारी भी विक्रेता की है।”
“फिर भी खरीदार को अपने कर क्रेडिट के लिए सफाई देनी पड़ती है।”
जेटली जी बोले—
“यह तो बड़ी विचित्र स्थिति है।”
मैंने कहा—
“इसीलिए तो हम कहते हैं कि जीएसटी की असली चुनौती अब केवल कर की दर नहीं है। असली चुनौती है—अनुपालन की जटिलता।”
एक अंक की गलती और कई दिनों की परेशानी
मैंने कहा—
“जेटली जी, कई बार गलती इतनी छोटी होती है कि सुनकर आपको भी आश्चर्य होगा।”
“बिल में जीएसटी पहचान संख्या के 15 अंकों में से एक अंक गलत हो गया।”
“या बिल संख्या में एक अंक आगे-पीछे हो गया।”
“या किसी महीने का बिल अगले महीने में चला गया।”
“या कर योग्य मूल्य में थोड़ी गलती हो गई।”
“अब दोनों पक्ष कहते हैं कि लेन-देन तो वास्तविक है।”
“लेकिन पोर्टल कहता है—जानकारी का मिलान नहीं हो रहा।”
जेटली जी ने पूछा—
“फिर?”
मैंने कहा—
“फिर शुरू होती है मिलान की कहानी।”
“बही देखो।”
“बिल देखो।”
“विक्रेता का विवरण देखो।”
“खरीदार का विवरण देखो।”
“कर विवरणी देखो।”
“माल प्राप्ति देखो।”
“भुगतान देखो।”
“और अंत में नोटिस का जवाब तैयार करो।”
जेटली जी हंसते हुए बोले—
“अभिषेक जी, आपने तो जीएसटी को पूरा पारिवारिक कार्यक्रम बना दिया!”
मैं भी हंस पड़ा।
पहले पोर्टल का डर था, अब नोटिस का डर है
मैंने कहा—
“जेटली जी, पहले कर सलाहकारों को डर रहता था कि आज पोर्टल चलेगा या नहीं।”
“अब डर रहता है कि कल पोर्टल से कौन-सा अंतर निकलकर सामने आ जाएगा।”
“पहले विवरणी भरना चुनौती था।”
“अब विवरणी भरने के बाद उसका मिलान करना बड़ी चुनौती है।”
“पहले पोर्टल खुलने का इंतजार रहता था।”
“अब नोटिस खुलने का डर रहता है।”
जेटली जी ने पूछा—
“इतने नोटिस क्यों आते हैं?”
मैंने कहा—
“क्योंकि अब व्यवस्था आंकड़ों के मिलान पर बहुत अधिक निर्भर हो गई है।”
“अलग-अलग विवरणों के आंकड़ों का आपस में मिलान होता है। जहां अंतर दिखाई देता है, वहां करदाता से स्पष्टीकरण मांगा जाता है।”
“यह व्यवस्था कर चोरी रोकने के लिए अच्छी है।”
“लेकिन हर अंतर कर चोरी नहीं होता।”
जेटली जी ने तुरंत कहा—
“यही बात महत्वपूर्ण है।”
मैंने कहा—
“जी। हर अंतर चोरी नहीं होता और हर गलती धोखाधड़ी नहीं होती।”
अब शून्य विवरणी भरने वाले भी सवालों के घेरे में
मैंने कहा—
“जेटली जी, एक और नई परेशानी सामने आ गई है।”
उन्होंने पूछा—
“अब क्या हुआ?”
मैंने कहा—
“अब ऐसी फर्मों को भी पंजीकरण रद्द करने के लिए नोटिस मिल रहे हैं, जो पिछले छह महीने से लगातार शून्य विवरणी भर रही हैं।”
जेटली जी ने आश्चर्य से पूछा—
“लेकिन अगर फर्म का कारोबार नहीं है, तो वह शून्य विवरणी ही तो भरेगी?”
मैंने कहा—
“जी बिल्कुल।”
“यदि किसी फर्म का कुछ समय से कारोबार नहीं हुआ, बिक्री नहीं है और कर देयता नहीं है, तो वह शून्य विवरणी भर रही है।”
“लेकिन अब कई मामलों में ऐसी फर्मों को यह बताने के लिए नोटिस मिल रहा है कि उनका पंजीकरण रद्द क्यों न कर दिया जाए।”
जेटली जी बोले—
“तो इसमें परेशानी क्या है? यदि कारोबार बंद हो गया है तो पंजीकरण रद्द करवा दें।”
मैंने कहा—
“यही तो बात है जेटली जी।”
“हर शून्य विवरणी वाली फर्म बंद नहीं हुई होती।”
“कई बार व्यापार कुछ महीनों के लिए बंद रहता है।”
“कभी कारोबार मौसमी होता है।”
“कभी आर्थिक परिस्थितियों के कारण खरीद-बिक्री रुक जाती है।”
“कभी व्यापारी नए काम की प्रतीक्षा कर रहा होता है।”
“और कई बार व्यापारी भविष्य में फिर से कारोबार शुरू करना चाहता है।”
जेटली जी बोले—
“तो क्या छह महीने तक शून्य विवरणी भरना अपने-आप में यह साबित करता है कि व्यवसाय हमेशा के लिए बंद हो गया?”
मैंने कहा—
“नहीं जेटली जी। यही तो बात है।”
“शून्य कारोबार और फर्जी कारोबार एक बात नहीं हैं।”
जेटली जी मुस्कुराए और बोले—
“मतलब अब व्यापारी के सामने एक नया सवाल है—”
‘व्यापार करो तो हिसाब दो और व्यापार मत करो तो भी बताओ कि व्यापार क्यों नहीं किया!’
मैंने कहा—
“जी जेटली जी!”
शून्य कारोबार और फर्जी कारोबार में अंतर जरूरी
मैंने कहा—
“जेटली जी, फर्जी फर्मों के खिलाफ कार्रवाई बिल्कुल होनी चाहिए।”
“जो लोग बिना कारोबार के फर्जी बिल बनाते हैं, गलत कर क्रेडिट लेते हैं या सरकार को नुकसान पहुंचाते हैं, उन पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।”
“लेकिन जिस व्यापारी का वास्तविक व्यवसाय है और कुछ समय से कारोबार नहीं हुआ, उसे केवल शून्य विवरणी भरने के आधार पर संदेह की नजर से देखना उचित नहीं होना चाहिए।”
“पहले उससे सरल तरीके से पूछा जाए कि कारोबार की स्थिति क्या है।”
“यदि वह बता देता है कि व्यवसाय बंद नहीं हुआ है, केवल वर्तमान में कारोबार नहीं है और वह नियमानुसार शून्य विवरणी दाखिल कर रहा है, तो वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए।”
जेटली जी बोले—
“मतलब व्यवस्था में जोखिम के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए?”
मैंने कहा—
“जी।”
“जहां फर्जीवाड़े या कर चोरी के स्पष्ट संकेत हों, वहां कठोर जांच हो।”
“लेकिन जहां केवल शून्य विवरणी है, वहां पहले करदाता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिलना चाहिए।”
जीएसटी पोर्टल को केवल गलती पकड़ने वाला नहीं, गलती सुधारने वाला भी बनना होगा
जेटली जी ने पूछा—
“तो फिर समाधान क्या है?”
मैंने कहा—
“समाधान यह है कि जीएसटी पोर्टल केवल गलती पकड़ने वाला नहीं, बल्कि गलती सुधारने में मदद करने वाला भी बने।”
“यदि विक्रेता ने बिल गलत डाला है, तो पोर्टल दोनों पक्षों को स्पष्ट सूचना दे।”
“विक्रेता को सुधार का सरल अवसर मिले।”
“खरीदार को वास्तविक लेन-देन के दस्तावेज प्रस्तुत करने की सुविधा मिले।”
“जहां दस्तावेजों से लेन-देन वास्तविक साबित हो जाए, वहां केवल तकनीकी अंतर के कारण खरीदार को दोषी नहीं माना जाना चाहिए।”
जेटली जी ने कहा—
“अच्छा सुझाव है।”
मैंने कहा—
“और सबसे जरूरी बात—छोटे व्यापारी के लिए जीएसटी जितना सरल होगा, व्यवस्था उतनी ही सफल होगी।”
हर अंतर कर चोरी नहीं होता
मैंने कहा—
“यदि कोई व्यापारी जानबूझकर गलत बिल बनाता है, नकली खरीद दिखाता है, बिना माल के बिल बनाता है या फर्जी कर क्रेडिट लेता है, तो उस पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।”
“लेकिन यदि वास्तविक व्यापार हुआ है और केवल विवरण भरने में तकनीकी गलती हो गई है, तो उस मामले को उसी नजर से नहीं देखना चाहिए।”
जेटली जी बोले—
“मतलब व्यवस्था में गलती और धोखाधड़ी के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए?”
मैंने कहा—
“जी बिल्कुल।”
“क्योंकि व्यापारी को सबसे ज्यादा डर कर की राशि से नहीं, बल्कि इस बात से लगता है कि कहीं एक छोटी तकनीकी गलती को बड़ी गलती न मान लिया जाए।”
तभी रेयांश ने मुझे उठाया
अचानक किसी ने मुझे जोर से हिलाया—
“पापा… पापा… उठो!”
मैंने आंखें खोलीं।
सामने मेरा बेटा रेयांश कालड़ा खड़ा था।
मैंने उनींदी आंखों से पूछा—
“जेटली जी कहां गए?”
रेयांश मुझे देखकर हंसने लगा।
“कौन जेटली जी?”
मैंने कहा—
“अरे, अभी तो मैं उनसे जीएसटी पर बात कर रहा था!”
रेयांश बोला—
“पापा, आप फिर जीएसटी का सपना देख रहे थे?”
मैंने घड़ी देखी।
सुबह हो चुकी थी।
मैं कुछ देर चुपचाप बैठा रहा।
फिर मेरे मन में एक सवाल आया—
क्या सचमुच जीएसटी पोर्टल अब ठीक हो गया है?
शायद हां।
लेकिन अगला सवाल उससे भी बड़ा है—
क्या जीएसटी सचमुच आसान हुआ है?
क्योंकि पहले शिकायत थी—
“पोर्टल नहीं चल रहा।”
अब शिकायत है—
“पोर्टल चल रहा है, लेकिन किसी और की गलती का जवाब हमें देना पड़ रहा है!”
और कभी-कभी तो—
“व्यापार नहीं किया तो शून्य विवरणी भरो,
शून्य विवरणी भरो तो बताओ कि व्यापार क्यों नहीं किया!”
मैंने रेयांश से कहा—
“बेटा, मम्मी को बालो की चाय पिलाओ… आज लगता है जीएसटी पर फिर कुछ लिखना पड़ेगा।”
रेयांश बोला—
“पापा, आप जीएसटी पर लिखते ही क्यों रहते हो?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“क्योंकि बेटा, जिस दिन जीएसटी सचमुच आसान हो जाएगा, उस दिन शायद मेरे पास लिखने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं।”
और मन ही मन मैंने अरुण जेटली जी से कहा—
“जेटली जी, पोर्टल तो काफी सुधर गया है…
अब बस जीएसटी को थोड़ा और सरल करना बाकी है।”
क्योंकि असली मंजिल केवल डिजिटल जीएसटी नहीं है।
असली मंजिल ऐसा जीएसटी है जिसमें व्यापारी व्यापार करे,
कर सलाहकार सलाह दे,
विभाग कर चोरी पकड़े,
और ईमानदार करदाता अपना समय नोटिस और मिलान में नहीं, अपने कारोबार को आगे बढ़ाने में लगाए।
क्योंकि कर व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने नोटिस निकले—
बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि कितने ईमानदार करदाता बिना डर और अनावश्यक परेशानी के अपना कारोबार कर पाए।



