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आयकर समाप्त हो या व्यवस्था में सुधार? बदलते भारत में कर प्रणाली की नई बहस

Summary: भारत में आयकर व्यवस्था को समाप्त करने या उसमें व्यापक सुधार करने की बहस के बीच करदाताओं को राहत देने, सरकारी राजस्व बनाए रखने और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने का प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है। एक ओर मध्यम वर्ग, वेतनभोगी नागरिक, छोटे व्यापारी और पेशेवर करों तथा अनुपालन की जटिलताओं में कमी चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण के लिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता है। इसी पृष्ठभूमि में 1 अप्रैल 2026 से लागू आयकर अधिनियम, 2025 से कानूनी भाषा, नियमों और प्रक्रियाओं के सरल होने की उम्मीद बढ़ी है। हालांकि, केवल कानून की संरचना बदलना पर्याप्त नहीं है; वास्तविक सुधार का मूल्यांकन आसान रिटर्न प्रक्रिया, समयबद्ध रिफंड, निष्पक्ष जांच, प्रभावी शिकायत निवारण और कम अनुपालन लागत के आधार पर होना चाहिए। आयकर समाप्त करने से नागरिकों की उपलब्ध आय और क्रयशक्ति बढ़ सकती है, लेकिन राजस्व की भरपाई के लिए अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता कम आय वाले परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है। इसलिए कर सुधार में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का संतुलन, निवेश और रोजगार को प्रोत्साहन, डिजिटल कर प्रशासन की विश्वसनीयता तथा कर चोरी एवं काले धन पर नियंत्रण महत्वपूर्ण हैं। लेख में आयकर समाप्त करने के पक्ष और विपक्ष के तर्कों, वैकल्पिक राजस्व स्रोतों, करदाता-अनुकूल प्रशासन और एक सरल, पारदर्शी तथा न्यायसंगत कर व्यवस्था की आवश्यकता का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।

कालाधन, कर चोरी और जटिल नियमों पर लगेगा अंकुश, यदि…

आयकर समाप्त करने की मांग के बीच नए आयकर अधिनियम से बढ़ी उम्मीदें; राजस्व, रोजगार, निवेश और आम आदमी की क्रयशक्ति के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती

भारत में आयकर व्यवस्था को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। एक ओर आम नागरिक और मध्यम वर्ग अपनी मेहनत की कमाई पर लगने वाले कर को कम करने तथा कर प्रणाली को सरल बनाने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार के सामने देश के विकास, सामाजिक कल्याण और बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त राजस्व जुटाने की चुनौती है।

इस बहस के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश में आयकर को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए, या फिर ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए जिसमें करदाता को राहत मिले, कर चोरी पर अंकुश लगे और सरकार को विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध हों।

आयकर केवल सरकार की आय का साधन नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक नीतियों, सामाजिक न्याय और संसाधनों के वितरण से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए आयकर समाप्त करने या उसमें व्यापक सुधार करने का निर्णय केवल कर की दरों के आधार पर नहीं लिया जा सकता। इसके लिए देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, व्यापार, निवेश, राजकोषीय स्थिति और आम नागरिक की क्रयशक्ति का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।

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छह दशक पुराने कानून की जगह नया आयकर अधिनियम

भारत की प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में 1 अप्रैल 2026 से एक महत्वपूर्ण बदलाव लागू हुआ। इसी दिन आयकर अधिनियम, 2025 ने छह दशक पुराने आयकर अधिनियम, 1961 का स्थान लिया।

नए कानून का मुख्य उद्देश्य कर नीति में बड़े बदलाव किए बिना कानूनी भाषा को सरल बनाना, प्रावधानों को व्यवस्थित करना और कर अनुपालन को अधिक सहज बनाना है। नए अधिनियम में 536 धाराएं और 16 अनुसूचियां हैं, जबकि पुराने कानून में 819 धाराएं और 14 अनुसूचियां थीं। कानून की संरचना को अधिक व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया है, ताकि करदाता और कर प्रशासन दोनों के लिए प्रावधानों को समझना आसान हो सके।

यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से डिजिटल हो रही है। बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान, व्यवसायिक लेन-देन और सरकारी सेवाओं में डिजिटल माध्यमों का उपयोग बढ़ने से कर प्रशासन के लिए भी नई संभावनाएं पैदा हुई हैं।

हालांकि, किसी कानून का सरल होना और उसका व्यवहार में सरलता से लागू होना अलग-अलग बातें हैं। नए अधिनियम की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि क्या सामान्य करदाता को रिटर्न भरने, कर की गणना करने, रिफंड प्राप्त करने और विभागीय कार्यवाही का सामना करने में पहले की तुलना में कम परेशानी होती है।

यदि कानून की भाषा सरल होने के बावजूद करदाता को नियमों की व्याख्या के लिए बार-बार विशेषज्ञों की सहायता लेनी पड़े, तो सुधार का उद्देश्य पूरी तरह प्राप्त नहीं माना जा सकता।

आयकर समाप्त करने की मांग के पीछे क्या है तर्क?

आयकर समाप्त करने की मांग के पीछे सबसे प्रमुख तर्क यह है कि नागरिक अपनी आय पर कर भुगतान करने के बाद बची हुई राशि से ही परिवार की आवश्यकताओं, बचत और निवेश का प्रबंधन करता है।

वेतनभोगी व्यक्ति के लिए मकान की किस्त, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी खर्च, घरेलू आवश्यकताएं और भविष्य की बचत महत्वपूर्ण दायित्व होते हैं। ऐसे में आयकर का भुगतान उसकी उपलब्ध आय और खर्च करने की क्षमता को प्रभावित करता है।

व्यापारी और पेशेवर वर्ग की शिकायत यह भी रहती है कि आयकर की गणना, रिकॉर्ड रखने, रिटर्न भरने और विभिन्न कानूनी प्रावधानों का पालन करने में समय और धन दोनों खर्च होते हैं।

यदि कर व्यवस्था अत्यधिक जटिल हो, तो छोटे व्यवसायियों के लिए अनुपालन की लागत उनके व्यवसाय के आकार की तुलना में अधिक हो सकती है। इससे आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

आयकर समाप्त करने के पक्ष में यह तर्क भी दिया जाता है कि नागरिकों के हाथ में अधिक पैसा रहने से बाजार में मांग बढ़ सकती है। लोग अधिक खर्च करेंगे, व्यवसायों को अधिक ग्राहक मिलेंगे और उत्पादन तथा रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।

लेकिन इन तर्कों के साथ यह देखना भी जरूरी है कि आयकर समाप्त करने से सरकार की आय में कितनी कमी आएगी और उसकी भरपाई किस माध्यम से की जाएगी।

आयकर समाप्त होने पर सरकार की आय का क्या होगा?

किसी भी देश में सरकार को सार्वजनिक सेवाओं और विकास कार्यों के लिए बड़े स्तर पर धन की आवश्यकता होती है। भारत जैसे विशाल देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, सड़क, रेलवे, सिंचाई, ग्रामीण विकास, सामाजिक सुरक्षा और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करना सरकार की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है।

इन कार्यों के लिए सरकार को स्थायी और भरोसेमंद राजस्व स्रोतों की आवश्यकता होती है।

आयकर समाप्त होने की स्थिति में सरकार को राजस्व की कमी की भरपाई के लिए अन्य स्रोतों पर निर्भर होना पड़ेगा। इसके लिए अप्रत्यक्ष करों, सीमा शुल्क, संपत्ति से जुड़े करों, सरकारी उपक्रमों के लाभांश और अन्य राजस्व स्रोतों का विस्तार करना पड़ सकता है। लेकिन केवल अप्रत्यक्ष करों पर अधिक निर्भरता से कर का वास्तविक बोझ कम आय वाले परिवारों पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी वस्तु पर कर की दर समान है, तो कम आय वाला परिवार अपनी कुल आय का बड़ा हिस्सा उस वस्तु को खरीदने में खर्च कर सकता है। दूसरी ओर, अधिक आय वाले परिवार के लिए उसी वस्तु पर किया गया खर्च उसकी कुल आय का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा होता है।

इसलिए आयकर समाप्त करने के बाद यदि राजस्व की भरपाई के लिए उपभोग पर कर बढ़ाए जाते हैं, तो इसका प्रभाव आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर अधिक पड़ सकता है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के बीच संतुलन क्यों जरूरी?

भारत की कर व्यवस्था में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के कर महत्वपूर्ण हैं। प्रत्यक्ष करों में आयकर और कॉरपोरेट कर जैसे कर शामिल होते हैं, जिनका भुगतान संबंधित व्यक्ति या संस्था अपनी आय अथवा लाभ के आधार पर करती है। अप्रत्यक्ष करों में वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाला जीएसटी तथा सीमा शुल्क जैसे कर शामिल हैं। इनका भुगतान उपभोग और लेन-देन के माध्यम से होता है। दोनों प्रकार के करों की अपनी विशेषताएं हैं। प्रत्यक्ष कर भुगतान क्षमता के आधार पर कर लगाने का अवसर प्रदान करते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से व्यापक स्तर पर राजस्व जुटाया जा सकता है। यदि सरकार प्रत्यक्ष करों का हिस्सा अत्यधिक कम कर देती है और अप्रत्यक्ष करों पर अधिक निर्भर हो जाती है, तो कर प्रणाली में समानता का प्रश्न उठ सकता है।

इसके विपरीत, यदि प्रत्यक्ष करों की दरें बहुत अधिक हों और कर अनुपालन जटिल हो, तो निवेश, बचत और स्वैच्छिक कर भुगतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए देश के लिए ऐसी कर प्रणाली अधिक उपयोगी होगी जिसमें दोनों प्रकार के करों का संतुलित मिश्रण हो और कर का भार नागरिकों की वास्तविक भुगतान क्षमता के अनुरूप हो।

मध्यम वर्ग की क्रयशक्ति और आर्थिक विकास

मध्यम वर्ग किसी भी अर्थव्यवस्था में उपभोग और घरेलू मांग का महत्वपूर्ण आधार होता है। इस वर्ग की आय में वृद्धि होने पर इसका प्रभाव बाजार, व्यापार, सेवा क्षेत्र और उत्पादन पर पड़ सकता है। यदि कर व्यवस्था में ऐसे सुधार किए जाएं जिनसे मध्यम वर्ग के हाथ में अधिक उपलब्ध आय रहे, तो वह अपनी आवश्यकताओं के साथ-साथ बचत और निवेश भी बढ़ा सकता है। इससे आवास, वाहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और अन्य क्षेत्रों में मांग को प्रोत्साहन मिल सकता है। हालांकि, केवल कर में राहत देने से आर्थिक विकास की गारंटी नहीं मिलती। इसके लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि, महंगाई पर नियंत्रण, निवेश के अनुकूल वातावरण और सरकारी खर्च की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण हैं। यदि कर राहत के कारण सरकार के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन न रहें, तो उसका प्रभाव भी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए कर राहत का वास्तविक लाभ तभी स्थायी होगा जब उसके साथ आर्थिक गतिविधियों और उत्पादक निवेश में भी वृद्धि हो।

छोटे व्यापारियों और पेशेवरों की समस्याएं

छोटे व्यापारियों, स्वतंत्र पेशेवरों और स्वरोजगार करने वाले व्यक्तियों के लिए आयकर का अनुपालन कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इन व्यवसायों में लेखांकन, बिलिंग, बैंकिंग, आय-व्यय का रिकॉर्ड और कर संबंधी दस्तावेजों का रखरखाव स्वयं करना पड़ता है या इसके लिए बाहरी सहायता लेनी पड़ती है। कर कानूनों में बार-बार बदलाव, अलग-अलग कटौतियों की शर्तें और रिटर्न से जुड़ी तकनीकी आवश्यकताएं उनके लिए कठिनाई पैदा कर सकती हैं। कई बार व्यवसाय का वास्तविक लाभ सीमित होने के बावजूद अनुपालन की लागत अपेक्षाकृत अधिक हो जाती है। ऐसे में छोटे व्यापारियों के लिए सरल कर व्यवस्था, स्पष्ट नियम, आसान डिजिटल प्रक्रियाएं और समय पर रिफंड की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। कर प्रशासन को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि छोटे व्यवसायों की हर तकनीकी त्रुटि को जानबूझकर कर चोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक कर चोरी और सामान्य मानवीय त्रुटि के बीच अंतर करना आवश्यक है।

करदाता और कर प्रशासन के बीच भरोसा

किसी भी कर प्रणाली की सफलता का आधार करदाता और सरकार के बीच विश्वास होता है। करदाता यह अपेक्षा करता है कि उसका रिटर्न समय पर प्रोसेस हो, अतिरिक्त कर की वापसी में अनावश्यक विलंब न हो, विभागीय नोटिस स्पष्ट हों और किसी विवाद की स्थिति में उसे निष्पक्ष सुनवाई मिले। दूसरी ओर, सरकार की अपेक्षा होती है कि नागरिक अपनी वास्तविक आय का सही विवरण प्रस्तुत करें और निर्धारित कर का समय पर भुगतान करें। यदि ईमानदारी से कर भुगतान करने वाले व्यक्ति को बार-बार नोटिस और दस्तावेजी औपचारिकताओं का सामना करना पड़े, जबकि कर चोरी करने वाले व्यक्ति पर प्रभावी कार्रवाई न हो, तो करदाता का विश्वास कमजोर हो सकता है।

इसलिए कर प्रशासन को सुविधा और जवाबदेही दोनों पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए। एक बेहतर व्यवस्था में सामान्य करदाता को अनावश्यक जांच से बचाया जाना चाहिए, जबकि गंभीर कर चोरी और जानबूझकर आय छिपाने के मामलों में प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए।

डिजिटल कर प्रशासन: सुविधा के साथ पारदर्शिता

डिजिटल तकनीक ने आयकर प्रशासन में कई संभावनाएं पैदा की हैं। ऑनलाइन रिटर्न, डिजिटल भुगतान, सूचना का इलेक्ट्रॉनिक आदान-प्रदान और डेटा आधारित जांच से कर अनुपालन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। डिजिटल व्यवस्था से करदाता को कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता कम हो सकती है। दस्तावेजों की उपलब्धता, रिटर्न की स्थिति और विभागीय संचार को भी अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है। लेकिन डिजिटल प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह उपयोगकर्ता के लिए कितनी सरल और भरोसेमंद है। यदि पोर्टल में तकनीकी समस्याएं हों, सामान्य करदाता को आवश्यक जानकारी समझने में कठिनाई हो या किसी त्रुटि के सुधार की प्रक्रिया जटिल हो, तो डिजिटल व्यवस्था भी परेशानी का कारण बन सकती है। इसलिए डिजिटल कर प्रशासन के साथ सहायता केंद्र, स्पष्ट निर्देश और समयबद्ध शिकायत निवारण की व्यवस्था भी जरूरी है।

कर चोरी और काले धन पर नियंत्रण

आयकर व्यवस्था में सुधार का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कर चोरी और काले धन पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए। कर चोरी से सरकार के राजस्व को नुकसान होता है और ईमानदारी से कर भुगतान करने वाले नागरिकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका रहती है। यदि कुछ व्यक्ति अपनी वास्तविक आय छिपाकर कर भुगतान से बचते हैं, तो इससे कर प्रणाली में असमानता पैदा होती है। इस समस्या के समाधान के लिए केवल कर दरों को कम करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए पारदर्शी लेन-देन, प्रभावी सूचना प्रणाली, उचित जांच और कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है। कर प्रशासन को ऐसे मामलों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जिनमें जानबूझकर आय छिपाने या गलत विवरण प्रस्तुत करने के संकेत हों। साथ ही, सामान्य करदाता को छोटी तकनीकी त्रुटियों के कारण अनावश्यक विवादों में नहीं उलझाया जाना चाहिए। एक प्रभावी कर प्रणाली वही है जिसमें ईमानदार करदाता को सुविधा मिले और कर चोरी करने वाले के लिए कानून का पालन न करना कठिन हो।

आयकर और निवेश के बीच संबंध

कर नीति का प्रभाव केवल सरकारी राजस्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह निवेश और बचत के निर्णयों को भी प्रभावित करती है। व्यक्ति अपनी आय का कितना हिस्सा खर्च करेगा, कितना बचाएगा और कितना निवेश करेगा, यह उसकी उपलब्ध आय, भविष्य की आवश्यकताओं और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कर व्यवस्था में स्थिरता और स्पष्टता होने से निवेश संबंधी निर्णय लेना आसान हो सकता है। इसके विपरीत, बार-बार नियम बदलने और जटिल प्रावधानों से निवेशकों के लिए भविष्य की योजना बनाना कठिन हो सकता है। इसलिए कर प्रणाली में सुधार करते समय यह आवश्यक है कि नियम स्पष्ट हों, कर नीति में अनावश्यक अनिश्चितता न हो और निवेश के लिए उचित वातावरण उपलब्ध कराया जाए। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि केवल कर राहत से निवेश नहीं बढ़ता। बाजार की मांग, आधारभूत सुविधाएं, वित्तीय उपलब्धता और आर्थिक स्थिरता भी निवेश के महत्वपूर्ण निर्धारक हैं।

क्या वैकल्पिक कर प्रणाली आयकर का स्थान ले सकती है?

आयकर समाप्त करने की मांग के साथ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या कोई वैकल्पिक कर प्रणाली देश की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। सैद्धांतिक रूप से सरकार विभिन्न कर स्रोतों के माध्यम से राजस्व जुटा सकती है। लेकिन किसी भी वैकल्पिक व्यवस्था को लागू करने से पहले उसके आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का आकलन आवश्यक है। यदि आयकर समाप्त करके उपभोग पर अधिक कर लगाया जाता है, तो इससे कम आय वाले परिवारों पर अधिक प्रभाव पड़ सकता है। यदि संपत्ति आधारित करों का विस्तार किया जाता है, तो उनके मूल्यांकन, प्रशासन और वसूली की प्रक्रिया को प्रभावी बनाना होगा। यदि अन्य स्रोतों से राजस्व बढ़ाने का प्रयास किया जाता है, तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि उससे व्यापार और निवेश पर अनावश्यक बोझ न पड़े। इसलिए आयकर का कोई भी विकल्प तभी व्यावहारिक माना जा सकता है जब वह पर्याप्त राजस्व जुटाने के साथ-साथ आर्थिक समानता और विकास के उद्देश्यों को भी पूरा करे।

कर सुधार में सरकार की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए?

आयकर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान देना आवश्यक है। पहला, कर कानूनों की भाषा और संरचना को सरल बनाया जाए, ताकि सामान्य करदाता भी अपनी देनदारी समझ सके। दूसरा, कर रिटर्न भरने और कर भुगतान की प्रक्रिया को अधिक सहज बनाया जाए। छोटे व्यापारियों और पेशेवरों के लिए अनुपालन की लागत कम करने पर विशेष ध्यान दिया जाए। तीसरा, कर रिफंड और विभागीय कार्यवाही के लिए समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।चौथा, कर विवादों को कम करने के लिए नियमों की स्पष्ट व्याख्या और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली विकसित की जाए। पांचवां, कर चोरी पर नियंत्रण के साथ ईमानदार करदाताओं को अनावश्यक जांच और औपचारिकताओं से बचाया जाए। छठा, कर नीति में स्थिरता रखी जाए, ताकि नागरिक और व्यवसाय भविष्य की आर्थिक योजना बना सकें। सातवां, सरकार को कर से प्राप्त राजस्व के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए, ताकि नागरिकों को यह विश्वास हो कि उनका योगदान सार्वजनिक हित में खर्च किया जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में भारत के लिए आयकर को पूरी तरह समाप्त करने की तुलना में कर प्रणाली को अधिक सरल, पारदर्शी और न्यायसंगत बनाना अधिक व्यावहारिक विकल्प दिखाई देता है। नया आयकर अधिनियम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन कानून में बदलाव अपने आप में अंतिम समाधान नहीं है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि करदाता को कितनी राहत मिलती है, विवादों में कितनी कमी आती है और कर प्रशासन कितना जवाबदेह बनता है। भारत जैसे विशाल देश में सरकार को विकास कार्यों, सामाजिक कल्याण और सार्वजनिक सेवाओं के लिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता बनी रहेगी। इसलिए कर प्रणाली को ऐसा बनाया जाना चाहिए जिसमें राजस्व संग्रह और नागरिकों की आर्थिक स्वतंत्रता के बीच उचित संतुलन हो। आयकर पर बहस का वास्तविक उद्देश्य कर को समाप्त करना या बनाए रखना मात्र नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना होना चाहिए जिसमें ईमानदार करदाता को सम्मान मिले, कर चोरी पर प्रभावी नियंत्रण हो और सरकार को विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन प्राप्त हों। एक न्यायपूर्ण, सरल और पारदर्शी कर व्यवस्था ही नागरिकों का विश्वास मजबूत कर सकती है और देश की अर्थव्यवस्था को अधिक स्थिर तथा समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

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