शापूरजी पालोनजी एण्ड कंपनी प्रा. ल. वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले (सिविल अपील सं. 3991 व 3992/2023) 13.10.2023 के आईने में “गवर्नमेंटल अथॉरिटी” की परिभाषा पर एक व्यंग्यात्मक विश्लेषण
I. एक सेमीकोलन (;), कोमा (,) तथा “or” की हैसियत
कभी-कभी पूरे कानून का भाग्य एक सेमीकोलन (;) और एक कोमा (,) के बीच लटका रहता है। सुनने में यह किसी भाषा प्रेमी प्रोफेसर की सनक लग सकती है, लेकिन जीएसटी और सर्विस टैक्स की दुनिया में यह ठोस हकीकत है। “गवर्नमेंटल अथॉरिटी” की परिभाषा को पढ़िए तो साफ पता चलता है कि विधायिका ने एक वाक्य में दो शर्तें ठूँस दीं, बीच में एक “or” डाल दिया, और छोड़ दिया अदालतों, विभाग और करदाता को इस बात पर लड़ने के लिए कि आखिर वह लंबी लाइन — जिसमें 90% (या कहीं 51%) भागीदारी की शर्त लिखी है — किस पर लागू होती है: सिर्फ दूसरी शर्त पर, या दोनों पर।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2023 को इस पहेली को सुलझाने की कोशिश की। नतीजा दिलचस्प निकला —इतना दिलचस्प कि खुद सीबीआईसी अपने ही सर्कुलर में इसके ठीक उल्टी बात कह चुका है। यही इस लेख का विषय है, और यही इसकी विडंबना भी।
II. मूल पाठ — जहाँ से यह सारी कहानी शुरू हुई
सेवा कर के दौर में मेगा एग्ज़ेम्पशन नोटिफिकेशन नं. 25/2012-सर्विस टैक्स, दिनांक 20 जून 2012 के क्लॉज़ 2(s) में “गवर्नमेंटल अथॉरिटी” की मूल परिभाषा कुछ इस तरह थी — साफ, सीधी, बिना किसी पहेली के:
“(s) ‘governmental authority’ means a board, or an authority or any other body established with 90% or more participation by way of equity or control by Government and set up by an Act of the Parliament or a State Legislature to carry out any function entrusted to a municipality under article 243W of the Constitution.”
यहाँ कोई झगड़ा नहीं था — 90% वाली शर्त हर हाल में लागू होती थी। Governmental authority’ को की गई आपूर्ति पर कर नहीं लगना चाहिए था। लेकिन 30 जनवरी 2014 को पुराने से पृथक एक नया “क्लैरिफिकेशन नोटिफिकेशन” आया, जिसने इस सीधी-सादी परिभाषा को दो हिस्सों में तोड़ दिया और ठीक वहीं से यह पूरा झमेला शुरू हुआ:
“(s) ‘governmental authority’ means an authority or a board or any other body;
(i) set up by an Act of Parliament or a State Legislature; or
(ii) established by Government,
with 90% or more participation by way of equity or control, to carry out any function entrusted to a municipality under article 243W of the Constitution.”
ध्यान दीजिए — sub-clause (i) के बाद सेमीकोलन (😉, फिर “or”, फिर sub-clause (ii), और उसके बाद कोमा लगाकर वह मशहूर “लॉन्ग लाइन” जोड़ दी गई। विधायिका को शायद यह अंदाज़ा भी नहीं होगा कि यह अल्प विराम-चिह्नों की चुस्ती एक दिन सुप्रीम कोर्ट के गलियारों तक जा पहुँचेगी।
III. मुकदमे की पृष्ठभूमि — संक्षेप में
SPCL ने आईआईटी पटना और एनआईटी राउरकेला के लिए निर्माण कार्य किया, 90% की शर्त पूरी न होने को मानते हुए सेवा कर चुकाया, और वह कर संबंधित संस्थानों से वसूल भी कर लिया। फिर 2015 में ऑडिट आपत्ति आई — यह कहते हुए कि चूँकि ये दोनों संस्थान “गवर्नमेंटल अथॉरिटी” की परिभाषा में आते हैं, इसलिए सेवा कर वसूला ही नहीं जाना चाहिए था, और वसूली/समायोजन होना चाहिए। पटना हाईकोर्ट और उड़ीसा हाईकोर्ट दोनों ने SPCL के पक्ष में फैसला दिया। विभाग सुप्रीम कोर्ट पहुँचा — और वहाँ भी हार गया।
IV. सुप्रीम कोर्ट का फैसला — व्याकरण की जीत, विभाग की हार
अदालत ने कहा कि sub-clause (i) और (ii) “independent disjunctive provisions” हैं, और 90% वाली शर्त केवल sub-clause (ii) पर लागू होती है। यानी, कोई भी बॉडी जो महज “किसी संसदीय अधिनियम या राज्य विधानसभा के अधिनियम से बनी हो” — बस इतना काफी है, उसे यह साबित करने की कोई जरूरत नहीं कि उसमें सरकार की कितनी हिस्सेदारी है। अदालत ने Corporation of Calcutta, Ind-Swift Laboratories और Modi Sugar Mills जैसे पुराने फैसलों का सहारा लेते हुए कहा कि जब शब्द साफ हों तो व्याख्या के औज़ार उठाने की जरूरत ही नहीं — और सेमीकोलन बनाम कोमा के इस्तेमाल को “जानबूझकर किया गया मसौदा-निर्णय” (deliberate drafting choice) करार दिया।
विभाग ने यह भी दलील दी कि Dilip Kumar वाले फैसले के अनुसार, छूट की अस्पष्टता का लाभ हमेशा राजस्व को मिलना चाहिए। अदालत ने बड़ी सहजता से जवाब दिया — यहाँ अस्पष्टता है ही कहाँ? यानी विभाग की यह दलील भी काम नहीं आई।
संक्षेप में: व्याकरण जीता, विराम-चिह्न जीते, और राजस्व विभाग हाथ मलता रह गया।
V. अब इसे जीएसटी पर आज़माते हैं
अब मज़ा यहाँ से शुरू होता है। जीएसटी की अपनी एग्ज़ेम्पशन नोटिफिकेशन सं. 12/2017-केंद्रीय कर (दर), दिनांक 28 जून 2017 में क्लॉज़ 2(zf) “Governmental Authority” और क्लॉज़ 2(zfa) “Government Entity” — दोनों में 30 जनवरी 2014 वाला हूबहू वही ढाँचा दोहराया गया है:
“(zf) ‘Governmental Authority’ means an authority or a board or any other body, —
(i) set up by an Act of Parliament or a State Legislature; or
(ii) established by any Government,
with 90 per cent. or more participation by way of equity or control, to carry out any function entrusted to a Municipality under article 243W of the Constitution or to a Panchayat under article 243G of the Constitution;
(zfa) ‘Government Entity’ means an authority or a board or any other body including a society, trust, corporation,
(i) set up by an Act of Parliament or State Legislature; or
(ii) established by any Government,
with 90 per cent. or more participation by way of equity or control, to carry out a function entrusted by the Central Government, State Government, Union Territory or a local authority.”
जो विवाद सेवा कर में एक बार निपट चुका, वही विवाद जीएसटी में नए रूप में सामने आया है, और किसी ने भी अभी तक इस पर गंभीरता से गौर नहीं किया है
VI. जीएसटी में विवाद का एक उदाहरण — संसद के अधिनियम से बनी कोई भी संस्था लीजिए
मान लीजिए कोई संस्था संसद के किसी विशेष अधिनियम से बनी है, किसी पेशे को विनियमित करने के लिए — ऐसी कई संस्थाएँ देश में मौजूद हैं, जिनमें सरकार की इक्विटी या नियंत्रण 90% तो दूर, शायद 9% भी नहीं। परंपरागत नज़रिए से — जहाँ 90% की शर्त हर हाल में लागू मानी जाती रही — ऐसी संस्था “Governmental Authority” नहीं बनती। लेकिन शापूरजी पालोनजी वाला तर्क लगाइए, तो यही संस्था क्लॉज़ (zf)(i) की शर्त पूरी कर देती है — सिर्फ इसलिए कि वह “संसद के अधिनियम से बनी” है। 90% वाली शर्त, जो कथित तौर पर सिर्फ (ii) पर लागू होती है, उसका रास्ता ही नहीं रोकती।
यह कोई छोटा-मोटा नतीजा नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि देश की लगभग हर संसदीय या राज्य विधानसभा अधिनियम से बनी संस्था — चाहे उसमें सरकार का कोई नियंत्रण हो या न हो — “Governmental Authority” के दायरे में आ सकती है, और नोटिफिकेशन 12/2017 की तमाम छूटों की हकदार बन सकती है। दिलचस्प बात यह है कि विभाग ने खुद शापूरजी पालोनजी के मुकदमे में यह आशंका जताई थी — TRAI, AAI, सरकारी बैंकों तक का हवाला देकर — कि इस व्याख्या से छूट का दायरा बेलगाम हो जाएगा। अदालत ने इस चिंता को सुना ज़रूर, पर माना नहीं — यह कहते हुए कि छूट का दायरा बड़ा हो जाना, अपने आप में अस्पष्टता का सबूत नहीं है।
VII. “Governmental Authority” और “Government Entity” की आपसी रस्साकशी
अब जरा एक और पेच देखिए। क्लॉज़ (zfa)(i) — “Government Entity” की परिभाषा — भी लगभग वैसे ही शब्दों में लिखी है: “संसद या राज्य विधानसभा के अधिनियम से बनी।” यानी शापूरजी पालोनजी वाला तर्क लगाते ही, वही एक संस्था एक साथ (zf)(i) की “Governmental Authority” भी बन जाती है और (zfa)(i) की “Government Entity” भी — क्योंकि दोनों जगह sub-clause (i) को 90% की शर्त से आज़ाद रखा गया माना जा रहा है। कानून यह कहीं नहीं बताता कि दोनों में टकराव हो तो कौन जीतेगा — जबकि इन दोनों वर्गीकरणों के टैक्स नतीजे (forward charge बनाम reverse charge सहित) एकदम अलग-अलग हैं। यह ऐसा ही है जैसे एक ही व्यक्ति को दो अलग-अलग पहचान-पत्र थमा दिए जाएँ और कहा जाए — जो मर्जी हो इस्तेमाल कर लो।
VIII. धारा 51 की समानांतर कहानी — नोटिफिकेशन 50/2018
यही ढाँचा 13 सितंबर 2018 के नोटिफिकेशन सं. 50/2018-केंद्रीय कर में भी दोहराया गया है, जिसने धारा 51 के तहत टीडीएस कटौती की बाध्यता लागू की:
“(a) an authority or a board or any other body, —
(i) set up by an Act of Parliament or a State Legislature; or
(ii) established by any Government,
with fifty-one per cent. or more participation by way of equity or control, to carry out any function.”
वही सेमीकोलन, वही “or”, वही कोमा, बस इस बार आंकड़ा 90% की जगह 51% है। शापूरजी पालोनजी वाला तर्क लगाएँ, तो संसद या राज्य विधानसभा के अधिनियम से बनी कोई भी संस्था — चाहे उसमें सरकार की एक फ़ीसदी भी हिस्सेदारी न हो — धारा 51 के तहत टीडीएस काटने के लिए बाध्य हो जाती है। 51% वाली शर्त का इससे कोई लेना-देना ही नहीं रह जाता।
IX. सीबीआईसी का सर्कुलर — यानी अपने ही घर में उल्टी बात
अब इस कहानी का सबसे मज़ेदार, और साथ ही सबसे परेशान करने वाला मोड़ आता है। जब यही सवाल विभाग के सामने रखा गया, तो सीबीआईसी ने सर्कुलर सं. 76/50/2018-जीएसटी, दिनांक 31 दिसंबर 2018 में — इश्यू नं. 3 के जवाब में — ठीक उल्टी बात कह दी:
“It is clarified that the long line written in clause (a) in notification No. 50/2018-Central Tax dated 13.09.2018 is applicable to both the items (i) and (ii) of clause (a) of the said notification. Thus, an authority or a board or any other body whether set up by an Act of Parliament or a State Legislature or established by any Government with fifty-one per cent. or more participation by way of equity or control, to carry out any function would only be liable to deduct tax at source.”
यानी सीबीआईसी ने साफ कह दिया — लॉन्ग लाइन (i) और (ii) दोनों पर लागू होगी। जो शर्त सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ (ii) पर सीमित कर दी, ठीक वही शर्त सीबीआईसी अपने सर्कुलर में दोनों sub-clauses पर लाद चुका है — और वह भी उसी विराम-चिह्न संरचना वाले प्रावधान पर। सर्कुलर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से करीब पाँच साल पुराना है, इसलिए उसे इस निर्णय का फायदा नहीं मिल पाया — लेकिन सवाल फिर भी बना रहता है: क्या यह सर्कुलर अब भी टिक सकता है, जब लगभग हूबहू उसी भाषा पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपनी मुहर लगा चुका है, बस उलटी दिशा में?
तो नतीजा यह निकला — बाईं जेब में सुप्रीम कोर्ट का “सिर्फ (ii)” वाला तर्क, दाईं जेब में सीबीआईसी का “(i) और (ii) दोनों” वाला सर्कुलर, और बीच में खड़ा है बेचारा करदाता, यह तय नहीं कर पा रहा कि टीडीएस काटे या न काटे, छूट ले या न ले।
X. व्यावहारिक स्तर पर इसका क्या मतलब है
- सिर्फसर्कुलर सं. 76/50/2018-जीएसटी के भरोसे किसी संस्था का “टीडीएस डिडक्टर” होना तय मत कीजिए — शापूरजी पालोनजी वाला तर्क इसके ठीक उलट भी साबित हो सकता है। “सर्कुलर, अधिसूचना की तुलना में स्वभावतः कम शक्ति वाला होता ही है.
- जोसंस्थाएँ महज़ संसद/विधानसभा के अधिनियम से बनी हैं, पर सरकार की 90% हिस्सेदारी नहीं रखतीं, उनके नोटिफिकेशन 12/2017 वाले छूट-दावों की नए सिरे से समीक्षा की जरूरत है।
- (zf) और(zfa) के बीच का यह अनसुलझा टकराव, किसी भी स्टेच्युटरी बॉडी को सलाह देते समय स्पष्ट रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए।
- लंबितस्क्रूटनी, एससीएन या अपीलों में — जहाँ किसी स्टेच्युटरी अथॉरिटी की टीडीएस देयता या छूट-पात्रता का सवाल हो — शापूरजी पालोनजी को रिकॉर्ड पर लाना फायदेमंद हो सकता है, चाहे यह करदाता के पक्ष में जाए या विभाग के।
XI. उपसंहार — विराम–चिह्नों के हवाले देश की टैक्स–नीति
कुल मिलाकर कहानी यह है कि एक सेमीकोलन और एक कोमा के बीच का फासला, करोड़ों रुपये की टैक्स देयता और छूट तय कर सकता है — और दो महत्वपूर्ण अंग, अदालत और बोर्ड, इस पर आपस में सहमत नहीं हैं। जब तक जीएसटी काउंसिल या सीबीआईसी इस भाषा को साफ नहीं करते, या शापूरजी पालोनजी के फैसले को ध्यान में रखते हुए एक नया, संगत सर्कुलर नहीं लाते, तब तक विभाग और करदाता दोनों इसी अनिश्चितता में झूलते रहेंगे — एक तरफ व्याकरण की अदालत, दूसरी तरफ प्रशासन की सुविधा, और बीच में लटका हुआ है टैक्स कानून, ठीक उस लॉन्ग लाइन की तरह जिसका कोई नहीं जानता कि वह किस पर लागू होती है।
फिलहाल के लिए सबसे सुरक्षित सलाह यही है — हर राय, हर अपील, हर एससीएन के जवाब में इस विरोधाभास को खुलकर, तर्कसंगत ढंग से दर्ज कीजिए। क्योंकि जब कानून खुद तय नहीं कर पाया कि “or” का मतलब क्या है, तो कम-से-कम रिकॉर्ड पर यह जरूर रहना चाहिए कि आपने यह सवाल उठाया था।






