CA Sudhir Halakhandi

CA Sudhir Halakhandiलघु एवं मध्यम व्यापार और जी.एस.टी. :- समस्याएं

आइये बात करें क्या है इस देश में पिछले कुछ वर्षों से चर्चा का विषय बना हुआ यह नया अप्रत्यक्ष कर जिसे एक भारतीय अर्थ –व्यवस्था में बहुत बड़ी क्रांती के रूप प्रचारित किया जा रहा है और यह भी देखेंगे क्या कोई कर प्रणाली देश में ऐसा कोई परिवर्तन भी ला सकती है जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है .

जी.एस.टी. एक सरल कर प्रणाली है जिसके तहत भारत के उद्योग एवं व्यापार को सभी अप्रतक्ष करों से मुक्त होकर केवल एक ही कर का भुगतान करना पडेगा , यह प्रक्रियात्मक रूप से बिलकुल सरल होगा एवं इस कर प्राणाली के माध्यम से सरकार को कर एवं राजस्व भी अधिक प्राप्त होगा एवं उपभोक्ताओं को वस्तुए एवं सेवाए सस्ती मिलेंगी . यह प्रणाली पूरी तरह से “कर पर कर” के दोष जिसे कास्केडिंग इफ़ेक्ट कहते है से पूरी तरह से मुक्त होगी . जी.एस.टी. भारतीय अर्थव्यवस्था में एक क्रांतीकारी कदम होगा जो कि इसके स्वरुप को ही परिवर्तित कर देगा.

यह सब तो हुए जी.एस.टी. लागू किये जाने के आधिकारिक एवं कानून निर्माताओं के द्वारा लगातार बताये जा रहे जी.एस.टी. के गुण जिन पर इसलिए हम चर्चा यहाँ नहीं करेंगे क्यों कि पिछले 10 वर्ष से जी.एस.टी. के ये लाभ लगातार गिनाये जा रहे है और जब भी जी.एस.टी. की राह में कोई अड़चन आती है तो इन लाभों के साथ यही कहा जाता है कि देश की अर्थव्यवस्था की राह फिर से रोक दी गई है .

यहाँ हम लघु एवं मध्यम उद्योगों एवं व्यापार का जी.एस.टी. को लेकर पक्ष प्रस्तुत करने के पहले दो मुद्दे पर बात कर लें. पहला यह कि क्या ये जी.एस.टी. को लेकर गिनाये जा रहे लाभ अवास्तविक है ? तो मेरा यह कहना है कि ऐसा नहीं है लेकिन ये सभी लाभ ना तो अवास्तविक है ना ही अतिप्रचारित है लेकिन एक बात ध्यान रखे ये सभी या अधिकांश लाभ जी.एस.टी. के “आदर्श एकल स्वरुप” से जुड़े है जिसकी चर्चा मै आगे करने वाला हूँ . ये सभी लाभ सन 2006 से गिनाये जा रहें है लेकिन भारत में लगने वाला जी.एस.टी. वह नहीं है जिसकी चर्चा सन 2006 में की गई थी . इसके बाद राज्यों और केंद्र के जी.एस.टी. को लेकर जो विवाद थे उसके कारण जी.एस.टी. के आदर्श स्वरूप के साथ कई समझोते किये गए जिसके कारण भारत में लगने वाला जी.एस.टी. एक दोहरा कर है लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि इसके बताये गए गुणों एवं लाभों की सूची में जी.एस.टी. के आदर्श स्वरुप ले साथ इतने समझोते होने के बाद भी कोई कटौती नहीं की गई है .

दूसरा मुद्दा यह है कि किसी भी अर्थयवस्था के विकास के लिए कई पक्ष जिम्मेदार होते है जैसे निर्माण एवं वितरण की व्यवस्था में सुधार , निर्माण की नै प्रणालियों का विकास , निर्यात में वृद्धी , निर्माण की लागत में कमी, उपभोक्ता की क्रय क्षमता में वृद्धी इत्यादि और देश में इन क्षेत्रों में भी काम हो रहा होगा लेकिन एक विशेष वर्ग द्वारा इसके लिए केवल जी.एस.टी. का इन्तजार किया जा रहा है जो बहुत ही आश्चर्य जनक है और वह भी उस प्रणाली का जिसके द्वारा सरकार पहले ही राजस्व वृद्धी का अनुमान लगा चुकी है . मात्र एक कर प्रणाली ने किसी देश की अर्थव्यवस्था पर इतना सकारात्मक प्रभाव डाला हो इसका अभी तक कोई उदाहरण नहीं है .

आइये अब लघु एवं मध्यम स्तर के व्यापार एवं उद्योग का पक्ष देंखे जी.एस.टी. को लेकर ,यह ध्यान में रखते हुए कि आपकी संख्या भारत वर्ष के वित्तीय और अर्थ क्षेत्र में सबसे अधिक है और भारतीय अर्थ यवस्था में इस वर्ग का सहयोग हमेशा ही अनुकरणीय रहा है .

देखिये वर्ष 2006 में सबसे पहले जी.एस.टी. की चर्चा भारतीय संसद में उस वक्त से वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में की थी और उस समय इस कर को इस प्रकार से वर्णित किया गया था कि यह एक “राष्ट्रीय एकल कर होगा” जिसमे केन्द्रीय सरकार कर एकत्र करेगी और इसे केंद्र और राज्यों के बीच में आपस में इसे बांटा जाएगा . यह एक बहुत अच्छी प्रणाली हो सकती थी क्यों कि ऐसे में वेट और केन्द्रीय उत्पाद शुल्क सहित राज्य और केंद्र स्तर के सभी अप्रत्यक्ष करों की जगह केवल एक ही कर जी.एस.टी. का भुगतान व्यापार एवं उद्योग को करना होता और यह बहुत ही आदर्श स्तिथी हो सकती थी और अगर ऐसा होता तो यह देश के कर कानूनों में यह परिवर्तन बहुत ही बड़ा क्रांतीकारी कदम होता.

देखिये लगातार पिछले कई वर्षो से जी.एस.टी. सरल एवं आसान कर प्रणाली होने के जो लाभ एवं गुण आपको गिनाये जा रहे है वे इसी आदर्श जी.एस.टी. के है लेकिन अब हम देंखे कि क्या यही आदर्श जी.एस.टी. हमारे देश में लगाया जा रहा है या फिर हमारे यहाँ जो जी.एस.टी. लगाया जा रहा है वह जी.एस.टी. की आदर्श स्तिथी नहीं है . यदि हमारे यहाँ जी.एस.टी. आदर्श स्तिथी में नहीं लगाया जा रहा है और फिर भी इसके गिनाये जा रहे एवं प्रचारित किये जा रहे लाभ और गुणों में कोई कमी करके नहीं दिखाया जा रहा है तो फिर हम देंखेगे कि क्या हमारे देश में जी.एस.टी. का जो गुणात्मक प्रचार किया जा रहा है उसमे सच्चाई भी है या नहीं .

सबसे पहले तो हम यह देख लें कि हमारे देश में शासन का एक संघीय ढांचा है और इसके तहत राज्यों को भी अप्रत्यक्ष कर लगाने का अधिकार है जिसके तहत वे मुख्य रूप से अपना कर “वेट” के रूप में एकत्र करते है और राज्य अपना यह अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं है क्यों कि टैक्स “स्वयं लगाना और उसे वसूल करना” और दूसरी और “केंद्र के द्वारा वसूल किये गये कर में हिस्सा बंटाना” दोनों अलग –अलग बातें है और राज्य कभी भी यह स्वीकार नहीं कर सकते कि उनसे कर लगाने का अधिकार लेकर इस पर केंद्र सरकार का एकाधिकार स्थापित कर दिया जाए . इसलिए भारत में जी.एस.टी. को “एकल कर” के रूप में लागू नहीं किया जा सकता था और इसीलिये भारत में जी.एस.टी. एक दोहरे कर के रूप में लागू किया जाने वाला है जिस पर राज्य और केंद्र बिक्री एवं सेवा के एक ही व्यवहार पर एक साथ अलग –अलग कर वसूल करेंगे. इस प्रकार भारत में लगने वाला जी.एस.टी. आदर्श एकल कर नहीं है . यह एक “दोहरा कर” है जी.एस.टी. की आदर्श स्तिथी के साथ एक समझोता है .

अब इस दोहरे कर के कारण यह होगा कि जो डीलर्स केन्द्रीय उत्पाद शुल्क का भुगतान कर रहें है उनके लिए तो दोहरा कर कोई नयी बात नहीं है लेकिन सोचिये क्या यह उन डीलर्स के लिए नई प्रक्रिया नहीं होगी जो अभी तक केवल “वेट” का ही भुगतान करते है और केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के दायरे से बाहर है और ऐसे डीलर्स करोड़ों की संख्या में है जिन्हें इस नई प्रक्रिया के तहत लिया जाएगा तो फिर यह नया कर सरलीकरण की तरफ कोई कदम जैसे है ? सरकार की करों के सरलीकरण की नीति का पूर्ण रूप से इस जी.एस.टी. में पालन नहीं हो रहा है .

आइये अब देंखे जी.एस.टी. का एक और महत्वपूर्ण पक्ष . हमें यह बताया जा रहा है कि जी.एस.टी. के तहत राजस्व में वृद्धी होगी और उपभोक्ताओं को भी वस्तुए भी सस्ती मिलेंगी. यहाँ यह ध्यान रखें कि जी.एस.टी. एक अप्रत्यक्ष कर है और इसका आख़िरी भार उपभोक्ता पर ही पड़ना है तो फिर ये दोनों स्थितियां एक साथ कैसे संभव है कि उपभोक्ता से कर भी अधिक वसुल लिया जाए और उन्हें वस्तुए भी सस्ती मिल जाए .

आइये अब जी.एस.टी. की दर की बात करें. हमारे कानून निर्माताओं का दावा है कि जी.एस.टी. से राजस्व बढेगा तो यह कैसे बढेगा यह भी देख लें . अभी जो समाचार आ रहें है उसके अनुसार राज्य का जी.एस.टी. 12 प्रतिशत और केंद्र का जी.एस.टी. 14 प्रतिशत लगना है और इसके अतिरिक्त सरकार 1 प्रतिशत केन्द्रीय बिक्री कर भी लगाना चाहती है तो यह दर होती है 27 प्रतिशत होती है तो इतनी ऊँची कर की दर लगा कर ही राजस्व में वृद्धी करनी तो फिर यह भी सोचना होगा कि क्या भारतीय उपभोक्ता इस ऊँची दर को सहन भी कर पाएंगे. तो यहाँ सवाल यह है कि यदि इस ऊँची दर को उपभोक्ता सहन करने में काबिल नहीं रहे तो इसका प्रभाव इस कर प्रणाली की सफलता पर पडेगा और यदि यह कर प्रणाली सफलता पूर्वक नहीं लागू हो पाई या लगने के बाद असफल हो गई तो इसका विपरीत असर भारत के व्यापारिक एवं औद्योगिक प्रगती पर भी नकारात्मक रूप से पडेगा. जी.एस.टी. असफल भी हो सकता है इस बारे में तो अभी कोई सोचने को भी तैयार नहीं है .

यहाँ यह ध्यान में रखे कि बहुत सी वस्तुए ऐसी है जिनपर केवल 5 प्रतिशत वेट लगता है और उनपर केन्द्रीय उत्पाद शुल्क या तो इसलिए नहीं लगता है कि वे या तो केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के दायरे से बाहर है या फिर उन लघु एवं मध्यम उत्पादकों के द्वारा निर्मित की जाती है . कृषी उत्पाद भी या तो कर मुक्त है या सभी राज्यों में 5 प्रतिशत की दर से करयोग्य है . अब सरकार इन्हें किस तरह 27 प्रतिशत कर के दायरे में लायेगी यह भी देखने वाले बात है?

कर की दर की बात करें तो यहाँ यह मै स्पष्ट कर दूँ कि भारत सरकार के वित्तमंत्री माननीय अरुण जेटली जी भी कह चुके हैं कि यह दर ज्यादा है और इसके लिए कुछ सोचना होगा लेकिन सबसे प्रमुख बात यह है कि राज्य सभा कि वह समिती जिसे जी.एस.टी. संविधान संशोधन विधेयक विचार के लिए दिया गया था उसने भी इस कर की दर को 20 प्रतिशत करने का अपना एक अलग से सुझाव दिया है . हम , भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के साथ प्रारम्भ से ही कर की दर के उंचा होने का मामला उठाते रहे है जिसकी परिणिती इस यह हुई है कि अब आधिकारिक स्तर पर भी कर की दर पर आपत्ती दर्ज होने लगी है तो सबसे अधिक देखने वाली बात यह होगी कि अंतिम रूप से सरकार कर की दर में क्या रख पाती है क्यों कि कर की ऊँची दर 27 प्रतिशत पर भी राजस्व की उस वसूली की कोई गारंटी नहीं है जिसकी उम्मीद लगाईं जा रही है फिर 27 प्रतिशत और 20 प्रतिशत में तो जमीन आसमान कार फर्क है . यों हमारे देश की प्रतिव्यक्ती आय 1500 डौलर प्रतिवर्ष को देखते हुए 20 प्रतिशत कर की दर भी बहुत अधिक है क्यों कि विश्व स्तर पर जी.एस.टी. के कर की दर का औसत 16 से 17 प्रतिशत है और जिन कुछ देशों में यह 20 प्रतिशत या उससे अधिक है वहां की प्रतिव्यक्ती आय भारत की प्रतिव्यक्ती आय से लगभग 30 गुना अधिक है .

तो मित्रों कर की दर जी.एस.टी. की सफलता का सूत्र तो है ही लेकिन मेरा अनुमान है कि जी.एस.टी. भारत में अंतिम रूप से सफलतापूर्वक लग भी पायेगा या नहीं यह भी इस कर की दर के मुद्दे पर ही निर्भर करेगा. यदि कर की दर पर विवाद जारी रहा और इसे 20 प्रतिशत या उसके आसपास लाने की मांग और भी अधिक पक्षों की और से हुई तो मेरा अनुमान यह है कि सरकार जी.एस.टी. को “इस या उस कारण” का हवाला देते हुए टाल देगी और यह जी.एस.टी. सिर्फ किताबों में चर्चा का विषय ही रह जाएगा.

जी.एस.टी. से ही जुड़ा एक और मुद्दा है वह है यह पूरा कर ही सूचना प्रद्योगिकी की बिना नहीं चल सकता है या हम कहे तो यह पूरी तरह से सूचना प्रद्योगिकी पर निर्भर कर होगा . हमारे यहाँ इन्टरनेट की उपलब्धता , उसकी क्षमता एवं गति अर्थात स्पीड के बारे में हमेशा एक शंका रहती है . आइये देंखे यह समस्या क्या है – देखए लगभग सभी राज्यों में वेट की प्रक्रियाओं को पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया है लेकिन वेट साईट की क्षमता एवं स्पीड एवं नेट की उपलब्धता को लेकर डीलर्स हमेशा परेशान ही रहते है और सम्बंधित विभाग उसका हल तारीख आगे बढ़ा कर निकालता है . यही समस्या जी.एस.टी. में भी रहने वाली है तो राष्ट्र्री स्तर पर इस समस्या का पहले हल निकाले बिना जी.एस.टी. लागू हो गया तो डीलर्स फिर से इसी परेशानी को झेलेंगे.

इसके अतिरिक्त 1 प्रतिशत केन्द्रीय बिक्री कर को पहले दो साल तक जारी रखना , पेट्रोलियम पदार्थो को जी.एस.टी. से बाहर रखने का मुद्दा , राज्यों की और से अभी भी जी.एस.टी. को लेकर उठ रही शंकाए इत्यादि का समाधान भी जी.एस.टी. अंतिम रूप से लगने के पहले हो जाए यशी उचित होगा.

मित्रों मैंने आपका काफी समय लिया है लेकिन जो मुद्दे मैंने यहाँ आपके समक्ष उठाये है वे सभी आपके मन में जी.एस.टी. को लेकर शंकाए अवश्य पैदा करेंगे जो कि स्वाभाविक है आप अब इन मुद्दों पर भी विचार करे और यदि आपको उचित लगे तो इन मुद्दों को अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार तक पहुंचाए ताकि जब भी यह जी.एस.टी. कर अंतिम रूप से लगे तो सरकार इससे जुडी समस्याओं पर पहले ध्यान दे और उनका समाधान करके ही इस कर के सम्बन्ध में बड़ा कदम उठाये .

(Author may be contacted at [email protected] or on 9198280 67256)

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0 Comments

  1. Noah Vanlinden says:

    Most of them don’t register themselves with the tax authorities to avoid paying tax or expending effort on paying taxes, but also become ineligible to claim tax set-offs. And the wait for a tax system like the GST, which equalises imbalances and reduces the significance of taxation in a business decision, is hurting them.

  2. Avinash Rajopadhye says:

    GST will only facilitate collection of taxes.In substance it is for administrative convenience. It does not have any impact on economic growth.Consumer interest is totally ignored so far as post GST regime is concerned. At present no one is visualizing impact on ultimate consumer. They should sit and make calculations of taxes paid now and taxes that will be paid in GST regime. No government on the planet earth will loose taxes they collect in the past. I wonder why the government is so insistent to merge taxes on tangible[goods] with intangible[services]. Better option is to subsume all taxes related to goods as Goods Tax and keep tax on service as Service Tax. It will reduce lot of confusions. The objective of collecting taxes will be served.

  3. CA SUDHIR HALAKHANDI says:

    Dear sir,

    1. The 27% rate is too high considering the fact that Small and medium trade and industry are dealing in goods which are not covered by the central excise and generally agricultural goods and basic foods items are taxable at 5% without Central Excise.

    2. At present the discussed threshold is Rs.10 Only for CGST. we are writing this again and again to get some relief.

  4. Kuldeep Kulkarni says:

    Sir
    It is good that you have raised some concerns.
    It is definitely true that the present proposed GST is a compromise against the original proposal. It is also true that the benefits are being exaggerated. This being the majour change, the Govt. should be cautious about this. It can also be said that implementation of GST will not bring about any reduction in prices of goods and services. Because, the total tax collection is going to be the same as earlier, if not more. As rightly said in the article, this being indirect tax, teh burden will fall on consumers. Further, generally any indirect tax is by nature regressive, so the burden falls relatively heavily on the poorer sections. Regarding some concerns raised in the article, it seems there are answers to these concerns:

    1. High rate of 27% : Today most products suffer excise duty 12.5% and VAT 12.5% which goes to 27% approx. Some products enjoy exemption / concessional rates in excise and VAT (like 5% vat). In GST regime also, there will definitely be product based exemptions.

    2. Dealers being required to comply with both taxes: In GST regime, only bigger dealers (say with turnover > Rs. 1.50 Cr) will be required to pay & comply with CGST, others will only pay SGST

    3. Internet system : This being the backbone, the Govt. has given a lot of attention to GSTN. It is already working in full swing and is committed to give dependable service.

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