१ जुलाई २०१७ से लागू हुए जीएसटी कानून को हमारे देश में अब पाँच वर्ष पुरे हो चुके है ।इन पाँच वर्षों में हमने इसमें  ढेरों उतार -चढ़ाव देखे है । यह कानून सिर्फ एक कर सुधार कानून ना रहकर अब व्यापार सुधार कानून का  रूप ले चूका है ।अब करदाताओं का मानस बदल गया है ।जो करदाता पहले अपने रिटर्न्स या तो नहीं डालते थे या देरी से डालते थे वे अब कर अनुपालना को प्रथम वरीयता देने लगे है । अब वे काफी गंभीर हो चुके है । उनका यह अनुभव पिछले कानून ( जीएसटी  के पहले ) से बिलकुल भिन्न है ।आज सभी करदाता हर महीने की १०  तारीख व २० तारीख जो की रिटर्न भरने की तिथि  है उसपे हर कीमत पर रिटर्न फाइल करना चाहते है । इसका प्रमुख कारण है जीएसटी में वसूली जाने वाली लेट फी एवं क्रेता को रिटर्न देर से भरने पर इनपुट का न मिलना । इससे एक बात तो साफ़ जाहिर है की सरकार ने कहीं न कहीं करदाताओं की सोच में एक बड़ा परिवर्तन लाया है साथ ही कम्प्यूटरीकरण की और अब सभी करदाता अग्रसर हो चुके है  इससे कहीं ना कहीं हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी के डिजिटल इंडिया के सपने को भी बल मिल रहा है । जीएसटी ने भारत में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाकर भारत सरकार की मेक इन इंडिया पहल को एक बड़ा बढ़ावा दिया।

Read this article in English- Journey of Five Years of GST- An Analysis

लेखक ने इस आलेख के माध्यम से जीएसटी के पाँच वर्ष पूर्ण होने पर पाँच सुविधाओं, पाँच समस्याओं और पाँच सुझाओं को सरकार तक पहुँचाने की कोशिश की है ।

जीएसटी में दी गई पाँच मुख्य सुविधाएँ

. कर विभाग के चक्करों  से मुक्ति : आज के पाँच साल पहले यह कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था की कर  विभाग बिना जाये भी व्यापारी व्यापार चला सकता है । हर व्यापारी या उसके अधिकृत कर सलाहकार को कर विभाग में प्राय: देखा जाता था ।कभी परमिट लेने हेतु , कभी टैक्स क्लीयरेंस सर्टिफिकेट हेतु , कभी ‘ सी ‘ फॉर्म हेतु तो कभी ‘ ऍफ़’ फॉर्म लेने हेतु इत्यादी । इसके कारण करदाताओं का बहुमूल्य समय जाहिर तो होता ही था साथ ही खर्च भी बढ़ जाता था ।लेकिन अब जीएसटी कानून लागू होने के पश्चात पूरी तस्वीर बदल चुकी है ।अब घर बैठे ही सारी गतिविधियां ऑनलाइन की जा सकती है ।चाहे इ-इनवॉइस बनाना हो हो,  चाहे इ-वेबिल बनाना हो , चाहे रजिस्ट्रेशन करना हो सिर्फ एक क्लीक की जरुरत है ।

. सम्पूर्ण भारतवर्ष  में एक कर एक दरएक नियम लागू : आज समूचे देश में काश्मीर से कन्याकुमारी तक सिर्फ एक कानून – जीएसटी ही लागू कर दिया गया है । सभी वस्तु एवं सेवाओं पर एक ही दर से कर लिया जाता है ।  इसके फलस्वरूप अब किसी भी करदाता को हर राज्य में रिटर्न भरने हेतु  एवं परमिट निकालने हेतु अलग -अलग कर सलाहकार रखने की आवश्यकता नहीं है ।सारे कर सम्बंधित कार्य एक ही जगह से , एक ही पोर्टल से और लगभग एक ही नियम मानकर निष्पादित किये जा सकते है । अब एक कानून बन जाने से विभिन्न राज्यों के द्वारा संचालित अलग – अलग कानून जैसे की- वैट , एंट्री टैक्स , सीएसटी इत्यादि से भी मुक्ति मिल गई है ।

. सूचना प्रोद्योगिक क्षेत्र में पारंगतता: जीएसटी में हर कार्य कंप्यूटर द्वारा संचालित किया जाता है जिससे की अब करदाताओं को हर पल सूचना प्रद्यौगिक का सहारा लेना पड़ता है । इससे करदाता कहीं न कहीं तकनीक प्रेमी तो हुआ ही है साथ ही उसका कंप्यूटर में ज्ञान भी बढ़ा है ।अतः अब यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी की जीएसटी ने करदाताओं को तकनीकी रूप से भी साक्षर बना दिया है । इसके अलावा हमारे देश के  सुचना प्रद्योगिकी उद्योग को भी इससे बढ़ावा मिला है तथा भारत इस क्षेत्र में एक बेहतरीन सेवा प्रदाता बनकर उभरा है ।

. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमियों को लाभ: सरकार ने जब जीएसटी कानून बनाया तब से ही इस वर्ग का विशेष तौर पर ख्याल रखा था। समय – समय पर इस कानून में बदलाव कर MSME की जरूरतों को भी पूरा किया ।चाहे त्रिमासिक रिटर्न भरने का नियम हो, चाहे सेवा प्रदाता हेतु कम्पोजीशन स्कीम का लाना हो, चाहे लेट फी की माफ़ी हो , चाहे  जीएसटी के वार्षिक रिटर्न से मुक्ति हो , चाहे जीएसटी ऑडिट से मुक्ति हो, चाहे HSN कोड डालने में रियायत हो। सभी जगहों पर सरकार ने MSME को प्राथमिकता दी है । MSME हमारे देश की रीढ़ है और सरकार ने वाकई इस वर्ग के हितों को सुरक्षित रखा है जो की काबिले तारीफ़ है ।

. चैक गेटों का खात्मा एवं माल लागत में कमी : जीएसटी लगने के कुछ महीनो के भीतर ही केंद्र सरकार की योजना अनुसार सभी राज्यों से  चैक गेट उठा दिए । जिसके फलस्वरूप व्यापारियों के माल की बेरोक -टोक आवाजाही होनी शुरू हुई । इससे चैक गेट में रुकने का झंझट खत्म और अतिरिक्त खर्च से भी मुक्ति मिली । आज किसी भी वस्तु का औसत वितरण समय पहले के मुकाबले काफी कम हो चूका है । अब व्यापारियों को अपनी चालू पूंजी व्यापार में स्टॉक के रूप में ज्यादा फ़साने की जरुरत नहीं पड़ती है क्यों की माल की डिलीवरी तुरंत हो जाती है ।इसके साथ – साथ माल बेचने वाले व्यापारियों को सेवा का इन्पुट मिलना आरम्भ हो गया एवं सेवा प्रदाता को वस्तु का इनपुट मिलने लगा । इससे कहीं न कहीं लागत कम हुई है ।

जीएसटी कानून की पाँच मुख्य समस्याएं

. जीएसटी पोर्टल सम्बंधित समस्याएं : जब से जीएसटी कानून लागू हुआ है तब से जीएसटी पोर्टल करदाताओं के लिए एक पहेली व परेशानी का कारण बना हुआ है । कानून में लिखे प्रावधानों और पोर्टल के द्वारा उन प्रावधानों को उपयोग में लाने में सामंजस्य की साफ़ तौर  पर कमी दिखती है । जीएसटी पोर्टल अपने हिसाब से कार्य करता है ।कानून में संसोधन हुए महीनो बीत जातें है उसके बाद पोर्टल पर संशोधन किये जाते है ।साथ ही पोर्टल से होने वाली तकनीकी दिक्कतों का भी भण्डार भरा है । हर समय कुछ ना कुछ परेशानी आती रहती है – चाहे वो GSTR-2B के आंकड़े नहीं दर्शाना , चाहे GSTR-2B के आंकड़े दो बार दर्शाना , चाहे ६% की कर दर का स्लैब उपलब्ध न होना इत्यादि – इत्यादि । कई करदाता तो मजाकिया लहज़े में यह कहने में भी नहीं कतराते की  पांच सालों में तो बच्चा भी चलना सीख जाता है और जीएसटी पोर्टल अभी भी लड़खड़ा रहा है । अतः एक मजबूत, उच्च कोटि एवं त्रुटिरहित पोर्टल समय की माँग है ।

. GSTR-3B रिटर्न में संसोधन की कोई व्यवस्था नहीं : पिछले पांच वर्षों से लगातार हर तबके से यह मांग उठ रही है की GSTR-3B रिटर्न को संशोधित करने की व्यवस्था की जानी चाहिए । हर करदाता का यह एक अधिकार है की अगर उसने रिटर्न भरने में कोई भूल कर दी है तो उसे उस भूल को सुधारने का मौका मिले । दुर्भाग्यवश सरकार ने पाँच वर्ष के पश्चात इसकी सुध ली और ४७ वी जीएसटी कौंसिल की मीटिंग जो की हाल ही में सम्पन्न हुई है सरकार ने  इस सुविधा को लाने की घोषणा की । सरकार का यह कदम सराहनीय है।  साथ ही लेखक का मानना है की GSTR-3B रिटर्न फॉर्म में पिछले महीने /पिछले वर्ष के आंकड़ों के समायोजन हेतु एक अलग से कॉलम भी डाल देना चाहिए  जिससे की GSTR-3B vs. GSTR-1 एवं GSTR-2B vs. GSTR- 3B में कोई मिसमैच ना आवे ।

. जीएसटी नियमों में बारबार बदलाव से परेशानी : सरकार ने अब तक जीएसटी कानून में सैंकड़ों बदलाव किये है । न जाने कितने अध्यादेश , सर्कुलर्स , क्लैरिफिकेशन्स , रिमूवल ऑफ़ डिफीकल्टी ऑर्डर्स , इंस्ट्रक्शंस, प्रेस रिलीज  इत्यादि जारी किये है ।अब कानून की धाराएं इन बदलावों के सामने बोनी होती जा रही है । इससे यह प्रतीत हो रहा है की जीएसटी कानून अभी तक स्थायी नहीं हो पाया है । इस तरह बार – बार बदलावों से व्यापारियों और कर प्रशाशकों को इन्हे याद रखने में कठिनायों का सामना करना पड़ रहा है । हालां की सरकार का कदम कहीं ना कहीं सरलीकरण की दिशा में ही रहता है किन्तु इससे उलझने और बढ़ती जा रही है ।

. प्रभावी शिकायत/ विवाद निवारण तंत्र का होना : जब कोई नया कानून बनाया जाता है तो कानून निर्माता इस बात का विशेष ध्यान रखते है की विवाद / शिकायत निवारण तंत्र भी बनाया जाये जिससे की कानून में आने वाली समस्यायों का अतिशिग्रह निपटारा किया जा सके । आज जीएसटी कानून को बने पाँच वर्ष बीत चुके है फिर भी कोई प्रभावी शिकायत/ विवाद निवारण तंत्र नहीं बन पाया है । आलम यह है की अब छोटे – मोटे मामलों हेतु भी न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है जिससे न्यायपालिका पर दबाव बढ़ता है और मामलों की वृद्धि होती जा रही है ।हालां की वर्ष २०१९ में जीएसटी कौंसिल की ३८वी मीटिंग की सिफारिशों के बाद एक जीएसटी से संबंधित मुद्दों पर करदाताओं की शिकायतों के निवारण के लिए क्षेत्रीय/राज्य स्तर पर शिकायत निवारण समितियों का गठन किया गया था। हमारे क्षेत्र में भी एक ऐसी समिति बनी थी । लेकिन अफसोसजनक बात है की यह समिति शिथिल पड़ी हुई है । अतः एक प्रभावी शिकायत/ विवाद निवारण तंत्र का होना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है ।

. रिफंड के मामलों में अनावश्यक  देरी: अगर किसी करदाता को रिफंड मिलना है तो उसे रिफंड का भुगतान अतिशिग्रह होना चाहिए वह उसका क़ानूनी अधिकार है । लेकिन प्राय: यह देखा गया है की रिफंड का समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा है  जिससे व्यापारी को समस्या आ जाती है । इसलिए सरकार को रिफंड प्रणाली को और दुरुस्त बनाने की आवश्यकता है ।

GST - Journey of Five Years - A Review

जीएसटी को और बेहतर बनाने  हेतु पांच सुझाव

. इन्पुट लेने हेतु नियमों में तुरंत बदलाव की आवश्यकता : वर्तमान में जीएसटी के नियमों के तहत क्रेता को इन्पुट तभी मिलेगा अगर विक्रेता ने अपना GSTR-1 रिटर्न समय पर लगाया है तथा उसमे दर्शाया गया कर सरकार के खाते में जमा किया गया हो एवं क्रेता के GSTR-2B में भी दिखता हो । ऐसे में अगर किसी कारणवश विक्रेता ने अपना रिटर्न दाखिल नहीं किया है तो क्रेता किसी भी हाल में इन्पुट नहीं ले पायेगा ।क्रेता की कोई गलती ना होने के बावजूद उसे इन्पुट नहीं मिल पायेगा ।यह नियम वाकई परेशानी बढ़ा रहा है ।अगर किसी क्रेता ने ईमानदारी से माल ख़रीदा या सेवा ली और उसके पास पुरे सबूत है तथा विक्रेता को पूरा भुगतान भी कर समेत हुआ है तो ऐसी परिस्थिति में महज विक्रेता के रिटर्न न भरने से क्रेता को इन्पुट लेने से रोकना बहुत ही चिंताजनक विषय है। इस प्रकार की प्रणाली करदाताओं के लिए सिरदर्द बन चुकी है। गल्ती करे कोई और भरे कोई, चरितार्थ हो रही है । हाल ही में कई न्यायालयों ने इस बात की गंभीरता को समझा एवं सुनवाई करते हुए निर्णय दिया की ऐसी स्थति में क्रेता को इन्पुट लेने का हकदार है नहीं तो उस पर दोहरी मार पड़ जाएगी ।क्रेता का विक्रेता पर कोई नियंत्रण नहीं रहता एवं जब पूरा भुगतान करके वस्तु एवं सेवा ली गई है तो उस इन्पुट को नकारना गलत हो जाता है । सरकार को इस इन्पुट के नियम में थोड़ा बदलाव कर मिसमैच के प्रावधान को एक बार पुनः जाँचना चाहिए जिससे की निर्दोष करदाता को किसी प्रकार का नुकसान ना हो और सही इन्पुट लिया जा सके ।

इन्पुट हेतु एक बड़ी समस्या और उभर कर सामने जो आ रही है वो यह है की सरकार ने बहुत सी वस्तु एवं सेवाओं के इन्पुट पर रोक लगा रखी है ऐसे में कहीं ना कहीं लागत तो बढ़ ही रही है और साथ में निर्बाध (SEAMLESS) इनपुट की जो कल्पना की गई थी उसका भी पालन नहीं हो पा रहा है । अतः इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए ।

. जीएसटी  विवाद निपटारे हेतु एकमुश्त योजना (ONE TIME AMNESTY SCHEME)  लावे : जीएसटी कानून लगने के शुरुआती दौर में बहुत से करदाताओं ने अनजाने में या भूलवश किसी न किसी प्रकार की गलतियां कर रखी है । चाहे वो GSTR-1 और 3B में मिसमैच हो , चाहे GSTR-3B और 2A में मिसमैच हो ( हालां की यह विवादित है की उस वक़्त  2Aका वजूद था या नहीं ) , चाहे इन्पुट टैक्स धारा १६(४) के नियम के विरुद्ध लिया गया हो , चाहे जमा कर की राशि पर ब्याज का भुगतान न किया हो इत्यादि , इत्यादि। अतः सरकार को एक ऐसी स्वैक्षिक योजना लानी चाहिए जिसमे ऐसे सभी करदाता अपने मामलों का कम समय में बिना अधिक मार पड़े निपटारा कर सके । लेखक का मानना है की ऐसी स्कीम वर्ष २०१७-१८ एवं २०१८-१९ के लिए तो बहुत ही आवश्यक है ।ऐसा करने से सभी लंबित मामले स्वतः  ही खत्म हो जायेंगे और एक निर्धारित समय सीमा में सरकार वसूली भी कर पायेगी । इससे करदाताओं को भी बहुत बड़ी राहत मिलेगी ।

. कर विभाग /कर अधिकारीयों का क्षेत्राधिकार तय हो :  जीएसटी में करदाताओं पर प्रशासन करने हेतु   वर्तमान में चार – चार विभाग सक्रिय है ।अगर असम राज्य की ही बात करें तो यहाँ केंद्रीय जीएसटी कर विभाग, असम राज्य जीएसटी कर विभाग,बीआईईओ और डीजीजीआई पूर्ण रूप से सक्रिय है । ये सभी विभाग अपने -अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर मामलों की छानबीन व करवाई करते है ।अगर जीएसटी कानून की धारा ६ की बात करें तो यह स्पष्ट रूप से बतलाया गया है की किसी भी करदाता  पर सिर्फ वही करअधिकारी क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकेंगे जिनके आधीन करदाता वास्तव में पड़ता है । लेकिन इसके बावजूद करदाता पर इन सभी विभागों द्वारा समवर्ती / सामांतर  (CONCURRENT JURISDICTION) क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जा रहा है ।ऐसे में करदाता पर चौतरफा दबाव पड़ता है और एक ही मामले हेतु विभिन्न विभागों के समक्ष हाजिर होकर जबाब देना पड़ता है । यह कानून के नियमों के विरुद्ध होने के साथ-साथ तर्कसंगत भी नहीं है ।करदाता को वास्तव में असुविधा होती है ।लेकिन बावजूद इसके हॉल ही में संपन्न जीएसटी कौंसिल की बैठक में सरकार ने केंद्र और राज्यों दोनों विभागों को अब यह शक्तियां आधिकारिक तौर पर प्रदान कर दी है की वो अब एक दूसरे के आधीन करदाताओं पर करवाई कर सकते है । बताया गया है की यह फैसला राजस्व हितों को ध्यान में रखकर लिया गया है । आने वाले समय में करदाताओं की मुसीबते बढ़ती नजर आ रही है । कुछ चंद मुठीभर कर चोरों की वजह से निर्दोष करदाताओं को अब दर – दर की ठोकरें खानी पड़ेगी ।

लेखक का जहाँ तक मानना है इस समस्या का मुख्य कारण  सभी विभागों में आपसी सामंजस्य की कमी तथा आज के दिन यह पता लगने का कोई साधन नहीं है की किस विभाग ने किस करदाता पर अपना क्षेत्राधिकार जताया । अतः सरकार अगर जीएसटी पोर्टल पर ही एक ऐसा  तंत्र बना देवे की कोई भी विभाग जब कभी भी किसी करदाता को हाज़िर होने हेतु बुलाता है या कोई अन्य करवाई की जाती है तो उस बाबत जानकारी तुरंत ही जीएसटी पोर्टल पर डाल दी जाये जिससे की दूसरे समान्तर विभागों के कर अधिकारी उस करदाता के जीएसटी नंबर डालने पर उसके विरुद्ध चल रही करवाई का पता लगा सके ।  ऐसे में दोबारा उस करदाता पे करवाई करने से बचा जा सकता है ।

. वर्ष २०१७१८ एवं २०१८१९ की विभागीय ऑडिट असेसमेंट शीघ्र किये जाये : जीएसटी विभाग द्वारा कुछ चुनिंदा करदाताओं की विभागीय ऑडिट का धारा ६५ में प्रावधान है साथ ही विभिन्न प्रकार के असेसमेंट जैसे की -असेसमेंट ऑफ़ नॉन- फाइलर्स , स्क्रूटिनी असेसमेंट इत्यादि , इत्यादि का भी प्रावधान है । कर विभाग यह असेसमेंट वार्षिक रिटर्न दाखिल करने की तिथि से पाँच वर्ष के भीतर तक कर सकता है । लेकिन लेखक का मानना है की अंतिम तिथि का इंतज़ार किये बिना सरकार को कम से कम वर्ष २०१७-१८ और वर्ष २०१८-१९ के सभी मामले खत्म करने हेतु दिशानिर्देश जारी करदेने चाहिए जिससे की कर अदाएगी जल्द की जा सकेगी और करदाताओं का भी असेसमेंट का  काम निपट जायेगा । अब जीएसटी को पाँच वर्ष बीत चुके है ।इसलिए जितना अधिक समय निकलेगा करदाताओं को उतने ही पुराने लेनदेन याद रखने में भी दिक्कत आएगी । अतः एक समय सीमा तय कर सरकार को यह काम खत्म करने हेतु उचित कदम उठाने चाहिए ।

. घोषणाओं के क्रियान्वन में देरी ना हो : हम सब जानते है की जीएसटी में हर निर्णय जीएसटी कौंसिल की बैठक में ही लिए जाते है जिसमे केंद्र और राज्यों की भागेदारी रहती है ।सरकार कौंसिल द्वारा लिए गए निर्णयों की घोषणा कर प्रेस विज्ञप्ति भी जारी कर देती है लेकिन दुर्भाग्यवश उन निर्णयों को लागू होते -होते छह : से आठ माह का वक़्त लग जाता है ।सरकार की अपनी मजबूरी रहती है की पहले तो उन निर्णयों को संसद से पास करवाए फिर हर एक राज्य की विधान सभा से पास करवाए तब कहीं जाकर उनको अमली जामा पहनाया जा सकता है । दूसरी तरफ कर विभाग की नजर में उन घोषणाओं की कोई अहमियत नहीं रहती जब तक की कानून की धारा में बदलाव या संशोधन ना हो ।ऐसी स्थिति में करदाता पशोपेश में पड़ जाता है । अतः सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए की जब भी कोई घोषणा कानून में बदलाव हेतु की जाये तो उसे तुरंत प्रभाव से लागू करने की व्यवस्था भी बनाई जाये ताकि करदाता द्वारा उसका लाभ समय पर लिया जा सके ।

निष्कर्ष: उपरोक्त लेख से एक बात तो साफ़ है की सरकार ने इन पाँच वर्षों में जीएसटी कानून पर काफी काम किया है जिसके फलस्वरूप राजस्व में निरंतर वृद्धि होती जा रही है । इस सफर में कर चोरों ने भी सरकार को चपत लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । जाली बिल व फर्जी इन्पुट सरकार का आज भी सरदर्द बने हुए है ।हालाँ कि इन्पुट लेने हेतु नियमों को बजट २०२२ के तहत काफी सख्त बनाने की कोशिश भी सरकार ने की है । लेकिन चंद बेईमानों के चलते अच्छे करदाता भी इन नियमों की मार झेल रहे है ।

जीएसटी कानून में अगर सबसे बड़े बदलाव की बात करे तो वो है करदाताओं की मानसिकता और उनका कर अनुपालना हेतु नजरिये का बदलना । इस कानून ने करदाताओं के व्यावहारिक पहलु को बदल कर रख दिया है । आज हर कोई सिर्फ ऐसे व्यक्तियों या संस्थाओं से व्यापार करना चाहता है जो की कर अनुपालना समय पर करते हो । सच पूछे तो जीएसटी ने एक अनुशाशन स्थापित कर दिया है भले ही करदाता पेनल्टी के डर से अनुपालना करता हो लेकिन उसने इस बात को भली भांति समझ लिया की अनुपालना करने में ही उसकी जीत है ।

सरकार को इन पाँच वर्षों में अर्जित अनुभव के आधार पर नई दिशा में काम कर जीएसटी को और अधिक मजबूत बनाकर देश की आर्थिक दशा एवं दिशा को बदलना है । अगर हमें पांच ट्रिलियन इकॉनमी तक पहुँचाना है तो उसमे जीएसटी का बहुत बड़ा एवं महत्वपूर्ण योगदान रहने वाला है । लेखक जानते है की भारत सरकार इस कार्य हेतु वचनबद्द,  कटिबद्ध , और प्रयतनशील है और जीएसटी को एक ऐसी कर प्रणाली बनाएगी जिसका सम्पूर्ण विश्व में एक उदाहरण पेश होगा । जय हिन्द !

नोट: लेखक पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट है और अपने पेशे के दौरान तजुर्बे से एवं व्यापारियों एवं करदाताओ से मिली जानकारी के आधार पर ये लेख तैयार किया गया है। इसमे दिए गए सभी विचार निजी है तथा दूसरों के विचार भिन्न भी हो सकते है जिसका लेखक सम्मान करते है।

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